क्या इश्क़ का सैलाब लिख दूँ मैं
या फिर कोई इंक़लाब लिख दूँ मैं
तमाम नफरतों को कर के रुसवा
मुहब्बत की इक किताब लिख दूँ मैं
बड़ा मुश्किल है यादों को संभालना
पन्नों में छिपा के गुलाब लिख दूँ मैं
दरिया में उतरता और चढ़ता रहा
मेरे इन अश्क़ों को आब लिख दूँ मैं
ज़िन्दगी गुलज़ार हो गयी तुझ से
तेरे चेहरे को आफ़ताब लिख दूँ मैं
जब भी देखूँ नशे में डूब जाता हूँ
तेरी आँखों को शराब लिख दूँ मैं
रोज तुझे पाने की नयी जद्दोज़हद
मुहब्बत में ये हिसाब लिख दूँ मैं
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