शनिवार, 25 नवंबर 2017

लिख दूँ


क्या इश्क़ का सैलाब लिख दूँ मैं
या फिर कोई इंक़लाब लिख दूँ मैं

तमाम नफरतों को कर के रुसवा
मुहब्बत की इक किताब लिख दूँ मैं

बड़ा मुश्किल है यादों को संभालना
पन्नों में छिपा के गुलाब लिख दूँ मैं

दरिया में उतरता और चढ़ता रहा
मेरे इन अश्क़ों को आब लिख दूँ मैं

ज़िन्दगी गुलज़ार हो गयी तुझ से
तेरे चेहरे को आफ़ताब लिख दूँ मैं

जब भी देखूँ नशे में डूब जाता हूँ
तेरी आँखों को शराब लिख दूँ मैं

रोज तुझे पाने की नयी जद्दोज़हद
मुहब्बत में ये हिसाब लिख दूँ मैं

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें