गुरुवार, 31 अगस्त 2017

ये ज़िन्दगी (ग़ज़ल)

अधूरी सी ख़्वाहिश है ये ज़िन्दगी
बच्चों की फ़रमाईश है ये ज़िन्दगी

जीने में तो यूँ आसान भी नहीं है ये
कहीं ज़ोर आजमाईश है ये ज़िन्दगी

मुझसे अक्सर ये रूठ क्यों जाती है
यूँ ताक़त की नुमाइश है ये ज़िन्दगी

खुद को मिटा कर भी मिलती नहीं है
तक़लीफ़ों की पैदाइश है ये ज़िन्दगी

सब कुछ पाकर भी कम ही लगती है
थोड़े और की गुंजाईश है ये ज़िन्दगी

सोमवार, 28 अगस्त 2017

मुक्ति गीत

हिमालय पर चढ़ जाओगे
या काशी काबा जाओगे
आखिरी वक्त जब आएगा
तो मुक्ति कैसे तुम पाओगे

हिसाब करोगे क्या तुम
जमीन जायदाद दौलत का
या पल कोई याद करोगे
पहली सच्ची मुहब्बत का
या अपनों की आंखों में
थोड़ा सा प्यार चाहोगे
या तन्हा ही कहीं तुम
चुपचाप से मर जाओगे
क्या तड़प तड़प कर तुम
मौत का इंतज़ार करोगे
या हंसते मुस्कुराते हुए
चैन की नींद सो जाओगे
आखिरी वक्त जब आएगा
तो मुक्ति कैसे तुम पाओगे

माला के मनकों में जो तुम
राम नाम को ही पुकारोगे
पाँचों वक़्त नमाज़ी होकर
खुदा की राह को निहारोगे
कुछ लम्हों की ज़िंदगी का
फिर से उधार मांगोगे क्या
या जितना तुम जी चुके हो
उसका कर्ज़ उतारोगे क्या
ख्वाहिश जन्नत की करोगे
या जहन्नुम से घबराओगे
हँसते हँसते जाओगे तुम
या अपना दर्द दिखाओगे
आखिरी वक्त जब आएगा
तो मुक्ति कैसे तुम पाओगे

क्या तब भी कोई ख्वाब
तुम्हारी आँखों में होगा
या सुकून का आफताब
तुम्हारी साँसों में होगा
ज़िन्दगी बीत गयी जब
शिकवे और शिकायतों में
क्या कर लोगे तब तुम
टूटती धड़कन की आहटों में
अपने लोगों से जुदाई का
क्या तुमको भी गम होगा
या दुनियादारी का तमाशा
उस वक़्त थोड़ा कम होगा
भय होगा चेहरे पर या फिर
खुशी होगी दर्द से राहत की
या तुम भी तब रो दोगे
कि किससे कितनी चाहत की

मेरी बात गर सुनना चाहो
इक बात तुमको बताऊँगा
मेरा वक़्त जब आयेगा जब
मौत को भी मैं जी जाऊँगा
क्या पता है उसके बाद
कैसा आलम कैसी दुनिया
क्या फर्क फिर मुझे पड़ेगा
जो मुझे याद करे दुनिया
बेहतर है कि खामोशी से
थोड़ा शोर मचा जाऊँगा
आख़िरी वक़्त जो मेरा होगा
आख़िरी गीत मैं सुना जाऊँगा
फिर सोऊँगा मैं सुकून के साथ
याद आऊँगा उसी गीत के साथ
जिसमें मैं फिर से तुमको
चार बातें कह जाऊँगा
और लफ़्ज़ों में ही अक्सर
तुमको नज़र आ जाऊँगा
मेरे गीत ही हैं जो मुझको
मेरे बाद भी ज़िंदा रखेंगे
और जो मुझसे रूठे हैं
उनको भी शर्मिंदा रखेंगे
मेरा आखिरी गीत वो
सभी लोगों को मेरा प्यार है
मुक्ति गीत जिसे मैं कहता हूँ
वो मेरे जीवन का आधार है
ज़िन्दगी में साथ होती है प्रीत
आखिरी वक्त साथ मुक्ति गीत
आखिरी वक्त साथ मुक्ति गीत

शनिवार, 26 अगस्त 2017

क्योंकि हम हिंसक हैं

जरा सी बात से
धर्म खतरे में आ जाता है
और शहर जल जाता है
क्योंकि हम हिंसक हैं

मर्यादा की बात
हम करते हैं अमर्यादित
और दंगा हो जाता है
क्योंकि हम हिंसक हैं

फिर जुम्मन मियाँ की
झोपड़ी जलाकर हम
अपने घर में सोते हैं
क्योंकि हम हिंसक हैं

फिर दलित की पिटाई
हम करके खुश होते हैं हैं
चैन से खाते पीते हैं
क्योंकि हम हिंसक हैं

भगवानों की पूजा में
ठेकेदारों को भगवान बनाते हैं
उन लोगों से ही खुद लुट जाते हैं
क्योंकि हम हिंसक हैं

जाति धर्म में बाँट कर देश
खुद को देशभक्त कहलाते हैं
नहीं देखते भूखे बच्चे रोते जाते हैं
क्योंकि हम हिंसक हैं

अहिंसा का पाठ पढ़ाते दुनिया को
खेतों में बारूद बच्चों को हथियार
खुद ही तो थमाते हैं
क्योंकि हम हिंसक हैं

इक दिन खुद की ही कब्रें हम खोदेंगे
खुद अपने हाथों से अपना गला काटेंगे
खुश होंगे फिर खुद को लहूलुहान देख कर
क्योंकि हम हिंसक हैं

सोमवार, 21 अगस्त 2017

दिल

                 "दिल"

जल जल के आज धुआँ हो रहा है दिल
देख लो जाने क्या क्या हो रहा है दिल

कल रात चाँदनी में जो भीग कर गया
आज धूप में ठंडी हवा हो रहा है दिल

उतार कर रख दिये नक़ाब भी चेहरे से
आँखों में लेकिन हया हो रहा है दिल

हम लाख मनाने की कोशिश किया करें
मानकर भी ख़फ़ा ख़फ़ा हो रहा है दिल

इक उम्र ही गुज़ार दी जिसके इंतज़ार में
पहली मुहब्बत में वफ़ा हो रहा है दिल

इसकी हरकतों के भी शिकवे क्या कहें
बा-ख़ुदा अब तो खुदा हो रहा है दिल

शनिवार, 12 अगस्त 2017

बच्चे

उठिए जनाब
उठ भी जाइये
बच्चों के साथ
खुशियाँ मनाइये
आज़ादी का पर्व है
तिरंगा लहराइये
अखबार मत पढ़िए
समाचार मत सुनिये
कुछ बच्चों की करुण
पुकार गूंज रही है
अगर आपने सुनी
तो दिल संभाल नहीं पाएंगे
अपने बच्चों में
वो बच्चे नज़र आएंगे
रहने दीजिये साहब
अपनी राष्ट्रवाद की
कसौटी कसिये
आज फिर कुछ लोगों
को तौलना है
उचित अवसर देख कर
बोलना है
जो मर गए वो बच्चे ही थे
राष्ट्रवाद से अनजान
न हिन्दू न मुसलमान
वो क्या फायदा करवाएंगे
आज साठ मरे
कल छह सौ मर जायेंगे
सबको चढ़ा जापानी बुखार था
अस्पताल में हर बच्चा बीमार था
सबके बुखार एक साथ उतर गए
ऑक्सीजन की कमी से सब मर गए
आप बड़े ज्ञानी लोग हैं
बड़ी बातें बताते हैं
आपने ही बताया कि
अगस्त में बच्चे मर जाते हैं
जनता भोली है
कुछ आँसू बहायेगी
अपनी छाती पीटकर
खुद ही चुप हो जायेगी
शुक्र मनाइये हालात अच्छे थे
किसी नेता या अफसर के नहीं
वो सब गरीबों के बच्चे थे
चलिये आपको तो झंडा फहराना है
कुछ बातें सुनाकर भूल जाना है
फिर चुनाव की तैयारियाँ भी करनी है
विपक्षी नेताओं की खरीदारी भी करनी है
जिन पैसों से ऑक्सीजन नहीं खरीद पाते हैं
उन पैसों में नेता आसानी से बिक जाते हैं
क्या हुआ जो खून की खुशबू आयेगी
इसी से तो राजनीति रंग लायेगी
भूल जाएगा देश बच्चों की लाशों को
कब तक याद रखेगा टूटती साँसों को
लोग बस गायों की रक्षा करेंगे
बच्चे ऐसे ही तड़प कर मरेंगे
लेकिन माँ बस रोती रहेगी
भारत माँ भी रोती रहेगी
क्योंकि आप लोग बस राजनीति ज़िंदा रखते हैं
जिसमें कुचलकर रोज हज़ारों बच्चे मरते हैं
लेकिन याद रखना जब जनता गुस्से में आएगी
तो यही अगस्त में अगस्त क्रांति लाएगी
भूल जाएगी धर्म मजहब जाति पात को
फिर याद रखेगी आपकी हर इक बात को
फिर बच्चों की जान कोई अगस्त नहीं ले पायेगा
ऐसा लोकतंत्र आएगा कि नेता ही मारा जायेगा