क्या तुमने देखा था, वो भूख से तड़पता बच्चा
इस चिलचिलाती गर्मी में
सड़क पर खुले आसमान के नीचे
जहाँ लोग खड़े होना भी नहीं चाहते
वहाँ वो बच्चा खड़ा था, शायद हम सब से बड़ा था!
इक रोटी की उम्मीद
हसीन ख्वाब से बड़ी हो जाती है
और ये कमबख्त भूख भी
इंसानों की तरह मजहब नहीं देखती
कम से कम अमीर गरीब का फ़र्क़ देखे
तो कितनी छोटी छोटी आँखों में
रोटी की जगह हसीन ज़िन्दगी के ख्वाब झिलमिलायेंगे
धूप की जगह वो भी परीलोक की कहानियों का आनंद लेंगें!
लेकिन अफसोस है साहब भूख भेदभाव नहीं करती
नेताओं की तरह आश्वासन नहीं दिया करती
लेकिन जब भूख की आग जला देती है अंतर्मन
तो वो ही बच्चा क्रांतिकारी बन जाता है
या फिर अपराध की दुनिया में खो जाता है
और बड़े साहब लोग कहते हैं अखबार पढ़ते हुए कि
आज कल जमाना खराब है
इंसानियत तो ज़िंदा ही नही रही।
तब उस बच्चे की भूख चिल्लाकर बोलना चाहती है कि
इंसानियत तो उसी वक़्त मर चुकी थी जब साहब लोग
अपनी एयर कंडीशंड गाड़ी में बिना शीशे खोले उस भूखे
धूप में खड़े बच्चे को देख कर बोले थे कि भिखारी बहुत ज्यादा हैं
सरकार कुछ करती क्यों नहीं
देश की बड़ी बदनामी होती है इनसे!
सही ही तो कहा था आपने
देश की बदनामी इनकी भूख और इनकी लाचारी से ही होती है
देश की बदनामी आप जैसे लोगों की
नाकारी से नहीं होती, आपकी बेशर्मी से नहीं होती।
क्योंकि ये देश उनका नहीं सिर्फ आप लोगों का है!
उनकी तो सिर्फ भूख है
और भूख भेदभाव नहीं करती!!!
- हिमांशु "इश्क़"
बुधवार, 31 मई 2017
भूख भेदभाव नहीं करती
मर जाऊँगा
जितना मुझको तुम चाहोगे
उतना मैं जी पाउँगा
जितना मुझसे तुम रूठोगे
उतना मैं मर जाऊँगा
कह न सकूँ मैं कितना बैचेन
दिल रहता है तुम्हारे बिना
इक इक लम्हा अब तो है
कटना मुश्किल तुम्हारे बिना
साँसें भी तो आती नहीं
और जान भी जाती नहीं
तुम्हारी मोहब्बत में क्या क्या
अब मैं कर जाऊँगा
जितना मुझसे तुम रूठोगे
उतना मैं मर जाऊँगा
मेरी चाहत मेरी राहत और
तुम ही तो हो मेरा सुकून
मेरे लिए ये दुनिया क्या है
तुम ही तो हो मेरा जुनून
कह भी न पाऊँ
रह भी न पाऊँ
तुम जो मुझसे दूर हुए तो
मैं यूँ बिखर जाऊँगा
जितना मुझसे तुम रूठोगे
उतना मैं मर जाऊँगा
जितना मुझको तुम चाहोगे
उतना मैं जी पाउँगा
जितना मुझसे तुम रूठोगे
उतना मैं मर जाऊँगा
मंगलवार, 30 मई 2017
श्वेत पत्र
यत्र तत्र और सर्वत्र है
ये राजनीति का प्रपत्र है
अघोषित अनुबंध है
भाषाई अपभ्रंश है
जिव्हा चीनी से मीठी
और छुपा विषदंत है
नैतिकता की बात है
और अनैतिक रात है
अहिंसा की राह में
लिए हाथ में शस्त्र है
यत्र तत्र और सर्वत्र है
ये राजनीति का प्रपत्र है
अदभुत संत समागम है
राजनीति का भाषण है
भ्रष्टाचार से चलता देखो
साहब के घर का राशन है
धर्म के नाम पर देखो तो
हो रहा आज अधर्म है
शब्दों की शल्य क्रिया से
होता अर्थ का अनर्थ है
यत्र तत्र और सर्वत्र है
ये राजनीति का प्रपत्र है
जिसके पास धन बाहुबल
उसके पास ही सत्ता है
निर्धन आज ले रिक्त उदर
ऊँचे महलों को तकता है
चुनाव पंच वर्षीय योजना है
प्रश्न पूछना राजनीतिज्ञों से
जनता की राष्ट्र आलोचना है
ऐसा किस्सा कहाँ अन्यत्र है
ये राजनीति का श्वेत पत्र है
यत्र तत्र और सर्वत्र है
ये राजनीति का प्रपत्र है
- हिमांशु "इश्क़"
सोमवार, 29 मई 2017
ख्वाब लिखें
आँखों आँखों में शराब लिखें
चल आज कोई ख्वाब लिखें
लम्हा लम्हा हम लिख डालें
या पल पल का हिसाब लिखें
आँखों आँखों में शराब लिखें
चलो आज कोई ख्वाब लिखें
कहीं तुम मुझको लिख दो
अपने दिल के सवालों में
कभी मैं तुमको भी लिख दूँ
यूँ ही दिल के उजालों में
क़तरा क़तरा बह जाना तुम
आकर मेरी इन बाहों में
मेरी ज़िंदगी भी रख लेना
तुम अपनी ही पनाहों में
मुहब्बत को हम दोनों ही
आज हसीन गुलाब लिखें
आँखों आँखों में शराब लिखें
चलो आज कोई ख्वाब लिखें
दिल की जो भी बातें हैं
वो बस आँखों से कहना
एक पल जो दूर जाओ
तो अश्क़ों को है बहना
कैसे हम ये जज्बात कहें
तुमसे ये दूरी कैसे सहें
तुमको मै ज़िन्दगी कहूँ
तुम्हारे बिन न ज़िंदा रहूँ
हमारी रूह तुम बन जाओ
जुदाई को अब खराब लिखें
आँखों आँखों में शराब लिखें
चलो आज कोई ख्वाब लिखें
- हिमांशु "इश्क़"
तुम
वक़्त मांगेगा तो क्या हिसाब दोगे तुम
फिर झूठ को सच का खिताब दोगे तुम
कहकहे लग रहे आज तुम्हारी बात पर
जब हर सवाल का एक जवाब दोगे तुम
यकीन नहीं तुम पर तुम हकीम बुरे हो
जब भी दवा मांगेंगे तो शराब दोगे तुम
कौन से अंधेरे मिटाने की बात कहते हो
क्या सूरज मिटाकर आफताब दोगे तुम
मुल्क खामोश है ये तुम्हारी किस्मत है
आखिर कब तक़ वक़्त खराब दोगे तुम
कभी तो बाजी हमारे हाथ भी आएगी
तब मांगेंगे तुमसे तो किताब दोगे तुम
- हिमांशु "इश्क़"
सच
लचर है कानून और जंग लगी तलवार है
आज बुराई से लड़ने को ऐसा हथियार है
खुद कोई काम ठीक से करते नहीं हैं वो
यूँ कहते हैं कि आजकल वक़्त बेकार है
तुम यूँ ही अपनी महफिलें सजाए रहना
और दरवाजे पर खड़ा दुश्मन तैयार है
रोटियों की बात अब तो बेमानी सी हुई
मजहब के नाम क्यों मर रहा परिवार है
बह रहा है लहू अब हर गली हर शहर में
और चैन से सो रही मुल्क़ की सरकार है
- हिमांशु "इश्क़"
खौफ के साये
ये खौफ के जितने साये हैं
सब गली गली लहराए हैं
नेताओं की क्या कहें अब
आज शर्म बेच कर खाये हैं
गांधी तेरे मुल्क में हमको
बंदूक तलवारें नहीं चाहिए
जाति पात और मजहब की
अब ये दीवारें नहीं चाहिए
किसी लाश पर बनने वाली
कोई मीनारें नहीं चाहिए
कर सको तो इतना कर दो
मुहब्बत उन दिलों में भर दो
जहाँ नफरत भर के आये हैं
हिंदुस्तानी को मार के आप
कैसी देशभक्ति सिखलाये हैं
ये खौफ के जितने साये हैं
सब गली गली लहराए हैं
भीड़ कातिलों की जमा है
गलियों और चौबारों पर
लहू दिख रहा है अब तो
इनके सब हथियारों पर
गांधारी की पट्टी पड़ी हुई
क्या मुल्क की सरकारों पर
जाने कैसी खामोशी उनकी
जैसे जाकर के बैठे गए वो
सूरज चाँद और सितारों पर
धर्म अधर्म की बातें छोड़ो
यहाँ इंसान मरता जाए है
ये खौफ के जितने साये हैं
सब गली गली लहराए हैं
रविवार, 28 मई 2017
दरख़्वास्त
जिस बच्चे के हाथ थमाईं कलम एक किताबें दो
उस बच्चे को आज तुम न मज़हब की दीवारें दो
रास्ता उसका मंज़िल उसकी पंख भी उसी के हैं
आज उसको आसमान में आज़ाद हो उड़ जाने दो
वो डोर मुहब्बत वाली जिसने दुनिया को बांधा है
उस डोर को काट सकेंगी जो ऐसी न तलवारें दो
दो रोटी की ख्वाहिश है और नहीं है कोई उम्मीद
दो रोटी के साथ ही सजती ख्वाब की मीनारें दो
है यकीन हमको आज कि मौसम फिर से बदलेगा
अपने खेतों में भी आयेंगी फिर से वो ही बहारें दो
कल का सूरज आसमान में नई उम्मीद भी लाएगा
सो जाओ तुम रख के ख्वाब तकिये के सिरहाने दो
शनिवार, 27 मई 2017
यारों
ऐसे रूठ कर मयखाने से तो न जाओ यारों
अभी होश बाकी है मुझे और पिलाओ यारों
हज़ार ज़ख्म खाये हैं यूँ तो नादान दिल पर
अभी जान बाकी है नए ज़ख्म लगाओ यारों
क़तरा क़तरा लौ अभी जल रही चिरागों में
हवा से नहीं बुझेगी कोई तूफान लाओ यारों
ये वो शमा है जहाँ लाखों परवाने फना हुए
कुछ इज़्ज़त करो फूँक से न बुझाओ यारों
मुहब्बत एक जश्न है तेरी मेरी ज़िंदगी का
आज जश्न में खूब हँसो नाचो गाओ यारों
थक कर ज़िन्दगी से यूँ मैं सोने चल पड़ा हूँ
चैन से तो सोने दो मुझको न जगाओ यारों
मेरा क्या आखिर में तो मिट्टी हो जाना है
कूचा ए इश्क़ में ही मेरी मिट्टी बहाओ यारों
- हिमांशु "इश्क़"
शुक्रवार, 26 मई 2017
सनम
जितना तुम्हें चाहूँ सनम
कोई किसी को न चाहे
मंज़िल मेरी तुमसे ही है
तुमसे ही अब मेरी राहें
कि तुम ही तो हो ज़िन्दगी
तुम ही तो हो मेरी खुशी
ए मेरे सनम ए मेरे सनम
दिलोजान भी तुम
ए मेरे सनम
देखो तो मेरी आँखों में
इक तुम्हारा ही चेहरा बसा
मेरे दिल की दीवारों पर
इक तुम्हारा ही नाम लिखा
धड़कन मेरी तुमसे ही है
तुमसे चलें मेरी साँसें
कि तुम ही तो हो ज़िन्दगी
तुम ही तो हो मेरी खुशी
ए मेरे सनम ए मेरे सनम
दिलोजान भी तुम
ए मेरे सनम
दुनिया से क्या मतलब
मेरा दिल तो बस तुम्हारा है
रात और दिन हर इक पल
मेरी साँसों ने तुम्हें पुकारा है
तुम्हारी बाहों के घेरे में
हो बंद मेरी ये आँखें
कि तुम ही तो हो ज़िन्दगी
तुम ही तो हो मेरी खुशी
ए मेरे सनम ए मेरे सनम
दिलोजान भी तुम
ए मेरे सनम
- हिमांशु "इश्क़"
बुधवार, 24 मई 2017
मेहरबान
मेरे दिन और रातें भी
तुझसे करनी बातें भी
तुझसे मेरी चाहत भी
तू ही मेरी राहत भी
तू मेरा जुनून है
दिल का सुकून है
मेहरबान मेहरबान
तू ही दिल तू ही जान
जब जब तुझको देखूँ मैं
तुझको ही सोचूँ चाहूँ मैं
वादे तुझसे जितने किये
खुद को लुटा निभाऊं मैं
आँख खुले तुझको देखूँ
बंद आँखों में भी पाऊँ मैं
तू मेरी खुशी है
मेरी आशिक़ी है
मेहरबान मेहरबान
तू ही दिल तू ही जान
रब से दुआ बस माँगू ये
तुझसे अलग ना होना है
तेरी बाहों में ही जीना है
तेरी बाहों में ही सोना है
दुनिया से मतलब क्या
मुझे बस तेरा ही होना है
दिल में मूरत तेरी है
सांवली सूरत तेरी है
मेहरबान मेहरबान
तू ही दिल तू ही जान
- हिमांशु "इश्क़"
बुधवार, 17 मई 2017
हालात
ये क्या तमाशा हो रहा है आज भरे बाजार में
दिख रहा है लहू आज कातिल की तलवार में
जरा गौर से देखो तो नज़र आएगा दुश्मन भी
जाने कबसे छुपा बैठा है वो लिबास ए यार में
तारीखों की हिफाज़त किसके हाथ सौंप दी
इक चोर ही नज़र आता है आपके थानेदार में
गरीबों को तो एक निवाला भी मयस्सर नहीं
दौलत लुटा रहा है मुल्क़ सौदा ए हथियार में
जिनसे बचाने को लड़ी जंग ए आज़ादी कभी
वो लुटेरे दिख रहे हैं आज घर के पहरेदार में
शनिवार, 13 मई 2017
माँ
तेरे आँचल में दुबक जाता हूँ जब अँधेरा होता है
तेरा हाथ जो सर पर आता है तब सबेरा होता है
खौफ से कांप जाता हूँ तो तू बनती है हिम्मत मेरी
तू जहाँ रहती है वहां खुशियों का बसेरा होता है
अपने निवालों से तू भूख मेरी मिटा देती है अक्सर
आज भी यहाँ रोटियों में लिखा नाम तेरा होता है
पिता की नाराज़गी को भी अपने सर ले लेती है तू
कौन सा दोस्त ऐसा ज़माने में अब मेरा होता है
माँ तेरे ही हाथों में तक़दीर मेरी बन जाया करती है
मैं रहता हूँ खुश कहीं भी ना कोई गम घनेरा होता है
ना दुकान ना मकान और ना मुझे कोई दौलत चाहिए
तू जहाँ हंस देती है वो ही आँगन अब से मेरा होता है
माँ तेरे होने से ही मुझपे कोई मुसीबत नहीं आ सकती
मेरी हर आह पर तेरी आयतों का ही तो पहरा होता है
जितना भी कहूँ तेरे लिए वो कम लगता है अब मुझको
माँ मैं जैसा भी हूँ लेकिन मुझमें तेरा ही बसेरा होता है
एक सदके में ले लेती हैं मेरी सारी बलाएँ मुझसे
शायद खुदा ही दूसरा नाम यहाँ सिर्फ तेरा होता है
शनिवार, 6 मई 2017
वक़्त
वक़्त के हाथ में इतनी सी कहानी होगी
दर्द की बात अब आँखों से सुनानी होगी
तड़प कभी ये दिल की कम हो नहीं पाती
मुहब्बत जो है वो ना कभी पुरानी होगी
ज़ख्मों को भरने में तो बड़ा वक़्त लगता है
फिर चोट पर मरहम भी तो लगानी होगी
किसको हाल सुनाएँ कौन सुनेगा हमारी
ज़माने की ज़ुबाँ पर उनकी कहानी होगी
चाहे मुहब्बत को आज मंजूर न करना तुम
इक दौर आएगा जब नफरत मिटानी होगी
जो लोग मशरूफ़ हैं आपस में ही लड़ने में
क्या करेंगे जब ये दुश्मनी दफनानी होगी
मज़हब बना जिसने भी इंसान जुदा किये
इन सबसे उठ के इंसानियत बसानी होगी
दर्द वो होता है जो लगे दिल और रूह पर
बाकी सारी तकलीफें महज़ जिस्मानी होंगी
यूँ आसां नहीं है मेरा तुझसे जुदा हो जाना
मुझे मेरी ज़िन्दगी की लकीर मिटानी होगी
तेरी ख़ुशी के लिए क़ुर्बान होने का वादा था
खुद मिट के ही मुझे मुहब्बत निभानी होगी
- हिमांशु "इश्क़"
बुधवार, 3 मई 2017
मुझे बस इतना कहना है
मुझे बस इतना कहना है
मुझे बस इतना कहना है
तेरे आँसू में रोना है
तेरी हँसी में हंसना है
मुझे बस इतना कहना है
मुझे बस इतना कहना है
दुनिया को मैं इतना जानूँ
तुझको ही तो दुनिया मानूँ
तुझसे मिला तो ज़िन्दगी है
तू ही तो मेरी अब बंदगी है
जितनी भी खुशियाँ मिलीं
सब मैने तुझको ही दी है
तेरी बाहों में ही मुझको
अब तो ज़िंदा रहना है
बिना तेरे जो कभी हो पल
मुझे उस पल में मरना है
मुझे बस इतना कहना है
मुझे बस इतना कहना है
ये चाहत का जो दरिया है
डूब कर ही पार जाना है
यूँ तेरे सिवा है क्या मेरा
ना जीने का कोई बहाना है
मिले जो साथ तेरा मुझको
दुनिया से मैं लड़ जाऊँ
मुझको इतना तू कह दे
तेरे बिन मैं कहाँ जाऊँ
तेरे नाम से ही मेरी
साँसों को अब चलना है
मुझे बस इतना कहना है
मुझे बस इतना कहना है
- हिमांशु "इश्क़"
एक मैं हूँ यहाँ
एक मैं हूँ यहाँ
एक तू है यहाँ
आज पूरा चाँद
पूरा है आसमाँ
एक मैं हूँ यहाँ
एक तू है यहाँ
रात की तन्हाई
यूँ ही सताती है
ये तेरी याद भी
अक्सर आती है
तुझको देखूँ मैं
तुझको सोचूँ मैं
चुप चुप के ही
तुझको चाहूँ मैं
ऐसी मुहब्बत
यूँ मिलेगी कहाँ
यूँ मिलेगी कहाँ
आज पूरा चाँद
पूरा है आसमाँ
सच कर दूँ मैं
तेरे ख्वाबों को
ढूंढ लाऊँगा मैं
सब जवाबों को
तेरा ही तो हूँ मैं
ये वादा करता हूँ
तेरे संग जीता हूँ
तुझ बिन मरता हूँ
तू मेरा रास्ता
तू मेरी मंज़िल
तुझ बिन मुश्किल
मैं जाऊँ कहाँ
मैं जाऊँ कहाँ
आज पूरा चाँद
पूरा है आसमाँ
एक मैं हूँ यहाँ
एक तू है यहाँ
- हिमांशु "इश्क़"