शुक्रवार, 28 जुलाई 2017

आओ चाँद देख कर आते हैं

आओ चाँद देख कर आते हैं
ये छोटी सी रातें जब लंबी हो जाती हैं
और लंबी रातों में जब नींद नहीं आती है
कुछ ऐसी रातों में जब बच्चे उठ जाते हैं
भूख के मारे पेट पकड़ कर जब रोते जाते हैं
उनको चाँद दिखा कर रोटी के ख्वाब दिखाते हैं
और उनसे कहते हैं आओ लोरी तुम्हें सुनाते हैं
या कहते हैं हाथ पकड़ कर,
आओ चाँद देख कर आते हैं।

जब सर्दी की ठंडी रातों में नंगा जिस्म तड़पता है
जब सड़क पर पड़ा गरीब ठंड की कारण मरता है
जब ऊँचे महलों में कुछ लोग मौसम को झुठलाते हैं
और झोपड़ी में हरिया जैसे हर मौसम में घबराते हैं
जब गंगा जमुना का पानी देहरियों पर चढ़ता है
तब मज़हब की तलवारों का रंग उतरता दिखता है
तब नेता हेलीकाप्टर में आकर सब्ज़बाग़ दिखलाते हैं
और उनसे कहते हैं, आओ लोरी तुम्हें सुनाते हैं
या कहते हैं हाथ पकड़ कर,
आओ चाँद देख कर आते हैं।

द्रोपदी की साड़ी अब भी सरे राह उतरती है
कोई कृष्ण जैसी उम्मीद अब क्यों नही जगती है
जाने कितनी सीताओं को रावण हर ले जाता है
फिर इन जूठे मर्दों का सम्मान कहाँ खो जाता है
कोई दुर्योधन को मारने अब भीम नही आते हैं
या नुमाइश के लिए ही जिम में पसीना बहाते हैं
ऐसे नक़ली मर्द ही तो अब नामर्द कहलाते हैं
रक्षा करने के वक़्त ही ये अपनी पीठ दिखाते हैं
और उनसे कहते हैं, आओ लोरी तुम्हें सुनाते हैं
या कहते हैं हाथ पकड़ कर,
आओ चाँद देख कर आते हैं।

गुरुवार, 27 जुलाई 2017

ऐ ज़िन्दगी

ऐ ज़िन्दगी

तू क्या समझती है खुद को। तू मुश्किलें खड़ी करेगी और हम डर जायेंगे। अगर ऐसे हम डरने लगे तो हमारा क्या होगा!! ये ज़माना है ना वो तुझसे भी बुरा है। तू ज्यादा से ज्यादा रूठ कर हमको एक बार में मार देगी। लेकिन ये ज़माना हमको रोज मारता है। हम इससे नहीं डरते तो तुझसे क्या ख़ाक डरेंगे।
जानती है हर रोज सुबह जमाना हम सभी से हमारी औकात पूछता है। किसी को अलग मज़हब के नाम पर सताता है तो किसी को रंग के नाम पर। किसी को अमीर होने पर तकलीफ देता है तो किसी को गरीब होने पर। महिलाओं को हर जगह महिला होने की सजा देता है ये ज़माना। घर बाहर आफिस स्कूल कॉलेज यहाँ तक कि न्याय और सुरक्षा जहाँ मिलती है वहाँ भी सताया जाता है औरत को। तुझे क्या लगता है कि पुरुषों को छोड़ देता है ज़माना? कहीं अफसर, बाबू, जमींदार, नेता और मंत्री लोगों को पल पल मरने पर मजबूर करते हैं तो कहीं लोग ही ईमानदार अफसर, बाबू, जमींदार, नेता और मंत्री को परेशान करते हैं। सच कहूँ तो ये ज़माना जो खुद को विकसित और सभ्य कहता है वो उतना ही पिछड़ा और लालची है। गंवार है ये ज़माना।
लेकिन ज़िन्दगी मुझे ये बता तू इस ज़माने को क्यों नहीं सता पाती है। इसको भी कभी रुला। बहुत से मजलूमों की दुआएँ लगेंगी तुझे। या फिर तू भी डरती है ज़माने से।
तुझे डरना है तो डर। लेकिन हम नहीं डरेंगे। हर बार हम लड़ने को खड़े होंगे। कभी भगत सिंह बनकर तो कभी गाँधी बनकर। कभी राजा राम मोहन राय बन कर तो कभी सुभाष बन कर। कभी लक्ष्मी बाई बनेंगे तो कभी अब्दुल कलाम बन कर खड़े हो जायेंगे। तू जितना रोड़े डालेगी हमारी राह में हम उतने ही मजबूत बन जायेंगे।
क्योंकि हम तुझसे नहीं डरते ज़िन्दगी और न ही डरते हैं ज़माने से। जो करना है कर ले जा पूरी आजादी है तुझे।
                                                    - हिमांशु

रविवार, 23 जुलाई 2017

चेहरा

कौन कहता है कि भीड़ का चेहरा नहीं होता?

सच तो ये है कि हर भीड़ का चेहरा है।
कभी वो चेहरा धर्म बन जाता है जो अलग दिखने वाले चेहरे को मिटाना चाहता है।
कभी जाति का चेहरा लग जाता है जो अपने से छोटे चेहरे को दबाना चाहता है।
कभी भाषा चेहरे का रूप ले लेती है।
कभी अफवाहों की धूप में चेहरा लाल दिखने लगता है।
कभी उसे आदमी कहा जाता है जो अपने जैसे ही औरत के चेहरे की आज़ादी सहन नहीं कर पाता।
कभी चेहरा रंग, भाषा या प्रान्त का रूप ले लेता है। लेकिन नफरत ही दिखाई देती है इन चेहरों पर।
कभी बलात्कारी तो कभी दंगाई और कभी हत्यारा दिखता है चेहरा।
कभी परायों में अपना तो कभी अपनों में पराया दिख जाता है चेहरा।
राजनीति में सभी चेहरे एक ही दिखाई देते हैं, दूसरे शब्दों में कहूँ तो हर चेहरे में राजनीति दिखती है।
जाने कितनी तरह के चेहरे अब दिखते हैं!
सच कहूँ तो,
हर चेहरे के पीछे कुछ लोग ही तो रहते हैं।
वो लोग कभी जिनका सिर्फ एक चेहरा "मुल्क" हुआ करता था अब नफरतों के हज़ार चेहरे लगा कर घूमते हैं।
कभी तिरंगे के रंग में नज़र आने वाले चेहरे आज खुद को भगवा या हरे रंग में बाँट कर नफरत की सूली चढ़े जा रहे हैं। लेकिन इन तमाम चेहरों की वजह से एक चेहरे को बहुत तकलीफ होती है और वो चेहरा है "हिंदुस्तान" का।

मंगलवार, 18 जुलाई 2017

परिवार

आज मेरी यहाँ जरूरत क्या रह गयी है। सिर्फ नाम के लिए ही आप लोगों ने मुझे इस परिवार का हिस्सा बना रखा है। क्या कभी आप में से किसी ने मुझसे बात की। मेरे कुछ अच्छा करने पर उत्साह वर्धन किया? अकेला होने पर मेरा साथ दिया?
साथ तो दूर की बात है किसी ने मुझसे ये भी पूछा है क्या कि कैसा हूँ मैं? ठीक हूँ या नहीं?
माफ करना लेकिन परिवार में सभी को महत्त्व दिया जाता है लेकिन यहाँ सिर्फ उनको ही महत्त्व मिलता है जो समाज में ऊँची हैसियत रखते हैं या धनवान हैं।
अगर इसे परिवार कहते हैं तो नहीं चाहिए मुझे ऐसा परिवार जो समाजवाद की अवधारणा से कोसों दूर हो।
अपने हिस्से की ज़िन्दगी मैं अपने ग़मों के साथ गुज़ार लूँगा।
आप लोगों ने क्या किया है?
गरीब समझ कर खाना खिला दिया।
कभी थोड़े बहुत पैसों से मदद कर दी।
और काम न करने पर ताने भी दे दिए।
साथ ही कुछ लोगों ने मेरा मज़ाक भी उड़ाया।
आप में से किसी ने मुझे समझा ही नहीं।
इसीलिए मुझे रिश्तों से नफरत है।
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इतना कह कर कमल आज फिर पैर पटकता हुआ घर से निकल गया। उसके द्वारा धकेले गए किवाड़ अब उसके गुस्से का प्रतिरूप बनकर बजते रह गये। इतने बड़े परिवार में कोई भी उससे बात करने की हालत में नहीं था। अवाक रह गए थे सभी आज उसकी कही बातों से। सच ही था, कमल महत्त्वहीन हो कर रह गया था इस परिवार में।
और कमल रोज की तरह आज फिर देसी शराब के ठेके की तरफ बढ़ चला था जहाँ सारी रात वो शराब को अपना समझ कर जाने कितनी बातें करता। और उसी नशे की बाहों में अपनापन जान कर कहीं भी फूटपाथ पर सो जाता।
यही रह गयी थी अब उसकी ज़िन्दगी और शराब ही था अब उसका परिवार जो उसे खुद से दूर नहीं होने देता था।
                                                       - हिमांशु

सोमवार, 17 जुलाई 2017

भैया जी

राजनीति के खेल में
भैया जी पहुँचे जेल में
कुछ लोग मर गए दंगों में
कुछ जल गए थे रेल में

सैल्यूट ठोक रहे देखो
थानेदार और संतरी भी
भैया जी के चरणों में
लोटे माननीय मंत्री भी
गहरी यारी छन रही है
सत्ता अपराध के मेल में
राजनीति के खेल में
भैया जी पहुँचे जेल में

दानव सी तो देह है इनकी
और वहशी आँखें भी पावन है
गुटखा चबाते मुख से देखो
गालियों का बरसता सावन है
नाम मात्र ही क़त्ल किये लोग
हँसी मजाक पेलमपेल में
राजनीति के खेल में
भैया जी पहुँचे जेल में

बड़ा सुनहरा भविष्य है
इनको मंत्री भी बन जाना है
चुनाव नाम मात्र का होगा
वोट बंदूक पर ही डलवाना है
ईमानदार इतने कहलायेंगे
जितनी पूरी मिलेगी भेल में
राजनीति के खेल में
भैया जी पहुँचे जेल में

ऐसे भैया जी के पीछे
चलती जनता सारी है
इनके आगे ही दिखती
कानून की देवी बेचारी है
संसद भी तो देखो मौन है
फिर थानेदार होता कौन है
सत्ता कोई भी आएगी
भैया जी की कहलाएगी
संसद, विधानसभाओं में भैया जी
चारों ओर ही दिख जायेंगे
जो चाकू बंदूक चला रहे आज
वो कल देश भी चलाएंगे
ऐसे निर्बाध निरंतर करेंगे विजय
भैया जी कहते "लोकतंत्र की जय"
             

शुक्रवार, 14 जुलाई 2017

दुनिया

ये तेरी दुनिया मेरी दुनिया
किस मोड़ पे ठहरी दुनिया

दिखती तो है अच्छी खासी
अंधी दुनिया बहरी दुनिया

कितने रंग छुपाए है फिरती
ऊपर से है सुनहरी दुनिया

कभी ये मातम गीत सुनाए
कभी लगे रंग लहरी दुनिया

वक़्त से तो है रूठी रूठी
वैसे है आठ पहरी दुनिया

इसे समझना जो चाहो तो
समंदर से है गहरी दुनिया

ऊपर से है ये हट्टी कट्टी
अंदर से है छरहरी दुनिया

कहीं सुबह का भोलापन है
कभी है तेज़ दुपहरी दुनिया

कभी लगे है गाँव सी मीठी
या नमक सी शहरी दुनिया

कहीं तो इफ़्तार की दावत
कहीं हुई है सहरी दुनिया


ग़ज़ल-ए-मुहब्बत

जो जमाने भर से रूठे हैं
वो जमाने भर को रोयेंगे
वो कभी कुछ न हो सके
वो इश्क़ भी क्या होयेंगे

जो आपके नाम से चले वो धड़कन मेरे यार है
आप में हम जो हैं देखते कुछ नहीं वो प्यार है

बेताब दिल की आरज़ू आज यूँ पूरी हो गयी
वो सामने जो आ गये महक गया इंतज़ार है

हमारी ख्वाहिशों को जमीं कभी मिल जाएगी
बारिश के बाद आ रही ये खुशबू ए बहार है

ज़माना जिसको ढूंढता मिला नहीं सुकून वो
जो आप हमको मिल गये आ गया क़रार है

मिट भी जायें दौलतें मिट भी जायें शोहरतें
आँखों को जो चाहिए वो उनका ही दीदार है

फ़ासला अब कुछ भी हो हमें कोई न फर्क है
दिल से दिल तक जा रही दिल की पुकार है

इक अजीब सा दर्द जो हमारे दिल में आज है
इसे और कुछ न जानिए ये इश्क़ का खुमार है

न रहेगा ज़िस्म ये जो वक़्त ए क़ज़ा आएगा
मुहब्बत बचेगी बाद भी बस यही ऐतबार है








ज़िन्दगी


ज़िन्दगी क्या है?

जवाब :-

किसी की याद जो आपको रूह तक सुकून देती है।

थोड़ा हँसना थोड़ा रोना जिसमें हम खो जाते हैं।

बचपन जिसे बड़े होकर हम फिर से जीना चाहते हैं।

कोई अपना जो दूर होकर भी इक पल दूर नहीं होता।

वो सावन की बारिश जिसमें भीगना अच्छा लगता है।

एक ख्वाब जिसे देखना भी चाहते हैं और तोड़ना भी चाहते हैं।

कोई ग़ज़ल जिसे सुनना चाहते हैं लेकिन मिसरे याद नहीं आते।

एक ऐसा खेल जिसे खेलते हुए वक़्त का होश ही नहीं रहता।

एक पुरानी हसीन याद जिसे कभी भूल नहीं पाते।

एक आसमान जिसमें हम बेखौफ उड़ना चाहते हैं।

इश्क़ जिससे डरते भी हैं और जिसे पाना भी चाहते हैं।

एक घर जिसे कभी छोड़ कर जाना नहीं चाहते फिर भी जाना पड़ता है।

और जो चले जाते हैं वो फिर लौट कर नहीं आते। हम उन्हें सिर्फ ढूंढते रह जाते हैं।







मंगलवार, 11 जुलाई 2017

ग़ज़ल

जो काँच जैसे लोग थे वो आईने में बदल गये
लोमड़ी से लोग फिर पतली गली निकल गये

हमने सहे थे सभी दर्द मिले थे जो ज़ख्म से
पहले जले दूध से फिर छाछ से भी जल गये

कोई किस्सा इश्क़ का ऐसे कहाँ खतम हुआ
मुहब्बत के जख्म थे कलेजे लग के पल गये

आँखें भी रात भर बादल की तरह बरस गयीं
बादल बरसने आये तो अश्क़ देख बदल गये

उनसे मिलने के वक़्त शिकवे हज़ार थे मगर
उनको टूटा देखा तो हम ही खुद संभल गये

और एक ज़िन्दगी जो उनके साथ नसीब हो
वरना लगेगा हमें कि मौत से हम छल गये

लोग

अपनी शराफ़त को इस तरह दिखाते हैं लोग
महफ़िल में आईने से खुद को बचाते हैं लोग

मुसीबत में देख दूसरों को मुस्कुराते हैं लोग
इस ज़माने में अपने नए रंग दिखाते हैं लोग

कहने को तो हमेशा हमारे ही ये हुआ करते हैं
वक़्त आने पर हम को यूँ ही दफनाते हैं लोग

मशविरा देते हैं ज़िन्दगी जीने का वो हमको
और खुद रूठ कर हमसे चले जाते हैं लोग

अश्क़ किसी के लोगों से साफ़ होते नहीं हैं
और खुद को ज़माने का खुदा बताते हैं लोग

कर लूँ (ग़ज़ल)

लो आज मैं भी तो इक़रार कर लूँ
इकतरफा सही तुमसे प्यार कर लूँ

दबा रखना ये ख्वाहिश अच्छा नहीं
बैचेन दिल को और बेक़रार कर लूँ

दिल आदी हो चुका है बेवफाई का
कैसे आज दिल का ऐतबार कर लूँ

वो तेरी यादें और याद के किस्से
आखिरी वक्त को यूँ यादगार कर लूँ

अब तो झूठों को बड़ी क़दर साहब
खुद को मैं भी ऐसा फनकार कर लूँ

जो तुमको हो क़बूल तो इक़रार करो
कोई शक़ रहे तो मैं ही इनकार कर लूँ

क्या भरोसा आज कल मुहब्बत का
फालतू में ख़त मैं कोई तैयार कर लूँ

भीग लूँगा अब तो मैं भी बारिश में
वक़्त है तो सावन का इंतज़ार कर लूँ

सोमवार, 10 जुलाई 2017

राष्ट्र पुकार

रुंधे गले से आ रही ये आज चीत्कार है
मौन जो मौन था अब मौन न स्वीकार है

स्वाभिमानी बन अभी और ये प्रण भी ले
साथ गरजेंगे सभी पास जो हथियार हैं

आज वीरता दिखाने का अवसर आ गया
तू एक के बदले दस गिरा राष्ट्र की पुकार है

हो खड़ा दे वचन तू वापस तब ही आएगा
शत्रु रक्त से धुली जब तेरी हर तलवार है

तेरी सेना जो गरजती है उनसे भी कह ज़रा
जिसको वो धमका रहे वो महज़ कलाकार है

शत्रु मुहाने पर खड़ा तू अब क्या है सोचता
इस रण विजय के लिए राष्ट्र आज तैयार है

तेरा ये जो मौन है वो आज राष्ट्र पर कलंक है
बड़ी सेना है तेरी लेकिन गीदड़ों की सरकार है

रोना चाहता हूँ

हाँ आज मैं रोना चाहता हूँ
आज मैं खुद खोना चाहता हूँ
तन्हा होकर जो सीखा मैंने
उन यादों को पिरोना चाहता हूँ
हाँ आज मैं रोना चाहता हूँ

जाने क्यों रूठे हैं सब मुझसे
जाने क्यों कुछ कहते नहीं हैं
जो मैं सहता हूँ दर्द हर रोज़
वो ऐसा क्यों सहते नहीं हैं
मैं भी उनके जैसा होना चाहता हूँ
हाँ आज मैं रोना चाहता हूँ

अब कोई मुझे मनाने नहीं आता
वो साथ हैं ये बताने नहीं आता
क्या खता मैंने की ज़माने भर से
क्यों मुझको समझाने नहीं आता
मैं मौत की बाँहों में सोना चाहता हूँ
हाँ आज मैं रोना चाहता हूँ

चौकीदार

चारों ओर मचा है हाहा कार
ठप्प हुए हैं अब तो कारोबार
आया चौकीदार देखो
ये आया चौकीदार

जिसका मन हो वो लूट रहा
देश का ताना बाना टूट रहा
लेकर नाम धर्म का अब तो
कर रहा अत्याचार
आया चौकीदार देखो
ये आया चौकीदार

छप्पन इंच की छाती थी
बाँतें कितनी ही हाँकी थी
साम दाम दंड भेद से
अब बना रहा सरकार
आया चौकीदार देखो
ये आया चौकीदार

जुमलों को बाज़ार में बेचा
झूठा तीर ज़ुबान से फैंका
काले धन की बात छोड़ो
सारे कर्म किये बेकार
आया चौकीदार देखो
ये आया चौकीदार

बेटियों का मान बढ़ाना
बेटी बचाना बेटी पढ़ाना
भूल के नेता उसके
करते हैं बलात्कार
आया चौकीदार देखो
ये आया चौकीदार

दस लाख का सूट पहनकर
गरीब का जो मजाक उड़ाया
जबरदस्ती गले पड़ पड़ कर
कैमरे से करता ऑंखें चार
आया चौकीदार देखो
ये आया चौकीदार

चौकीदारी करने वो आया
गाय के नाम इंसान मरवाया
अपनी मर्ज़ी करके उसने
कर दी संविधान की हार
आया चौकीदार देखो
ये आया चौकीदार

काली रातें

काली काली रातों के पीछे उजले सबेरे हैं
सारे दर्द ख़्वाबों के आके यहीं पे ठहरे हैं

सारा दिन ज़ख्मो से हम परेशान रहते हैं
हँसी चुका के पाए जो हमने पल सुनहरे हैं

कोई बात सुनी नही इश्क़ की रात बाकी है
मयख़ाने में पूँछें लोग कितने जाम ठहरे हैं

हर पल में रुसवाई जाने कैसी किस्मत है
कैसे ज़िंदा इश्क़ रहा उस पर इतने पहरे हैं


मैं

कभी मुश्किल तो कभी आसान हुआ हूँ मैं
हर बार नए आगाज़ से परेशान हुआ हूँ मैं

कभी इठलाया हूँ मैं ख़्वाबों में ख्यालों में
कभी इस ज़िन्दगी से इतना हैरान हुआ मैं

अपनों ने जब से पहचानना छोड़ दिया है
अपने ही घर में कोई मेहमान हुआ हूँ मैं

कल तलक़ जो दिन और रात मेरे साथ थे
उन्हीं रिश्तों में कोई बोझ अंजान हुआ मैं

ज़रा सलीके से कहते तो उफ़ भी ना करूँ
उजड़ी हुई कोई बस्ती का मकान हुआ हूँ मैं

भूल गए हैं जब से वो अपनी मुहब्बत को
गुजरे हुए वक़्त का आज निशान हुआ हूँ मैं

लोगों ने भी खूब बातें बनाई मेरी कहानी की
कुछ नहीं बस मुहब्बत से अनजान हुआ हूँ मैं

मेरे दर्द का वजूद तुमको क्या समझाऊँ अब
ज़िंदा भी हूँ और खुद ही शमशान हुआ हूँ मैं

रविवार, 9 जुलाई 2017

दिल मतवाले रखना (ग़ज़ल)

जो तुमको मंजूर है यूँ नफरत को पाले रखना
तो तुम ही अपने पास सुबह के उजाले रखना

रात के अंधियारे को आज बुरा कहते है लोग
कैसी ज़िन्दगी है साथ दिलों को काले रखना

हमें अपनी मुहब्बत का तो सरेआम नाज़ रहेगा
ये नफरतों के साए तुम अपने ही हवाले रखना

महफ़िल में जो आगए तो नक़ाब उतरेंगे जरूर
ये कैसे मुमकिन है शराफत को संभाले रखना

सच कहने को जरुरी नहीं पसंद करें सब लोग
कभी सच कहना तो अपने दिल मतवाले रखना

किया जो मैंने इश्क़

क्या क्या सोचा
क्या क्या चाहा
थोड़ा सा था जो
आज बेपनाह हो गया
किया जो मैंने इश्क़
गुनाह हो गया

मुझको उसने बड़ा रुलाया
लेकिन मैं ये समझ न पाया
नादानी थी जो इश्क़ किया
इश्क़ को मैंने इश्क़ जिया
इश्क़ में मरना था
इश्क़ में जी गया
किया जो मैंने इश्क़
गुनाह हो गया

जान मेरी अब तो जाए
मुझमें मेरा कुछ बचा न हाये
ज़िन्दगी मेरी पल भर की है
उनको देखूँ तब ये जाये
इश्क़ ने मारा इश्क़ बचाये
जाने कब बेपनाह हो गया
किया जो मैंने इश्क़
गुनाह हो गया

पावन सी मुहब्बत

तन्हा खुद से लड़ना झगड़ना
जैसे लहरों का चढ़ना उतरना
कागज़ की नावों का ठहरना
जैसे भावों का दिल में बहकना
यादों के जैसे तूफान से लड़ना
रोते हुए फिर मोम सा पिघलना
उम्मीद का बिजली सा चमकना
ठंडी हवा सा वो तेरा ख्याल
भीगे हुस्न सी निगाहें लरजना
बचपन के जैसे बारिश के मौसम
मुहब्बत अब भी हुई है न मद्धम
पानी की बूँदों में जिस्म नहाया

ऐसा हसीन मुहब्बत का साया
मेरे चेहरे पर तेरे गेसुओं की छाँव
बारिश के पानी में कागज़ की नाव

चाहे दौलत मिले दुनिया की मुझे
लेकिन बारिश की मुझे जरूरत है
जिसे अब भी ढूंढ़ता फिर रहा हूँ
वो तेरी सावन सी मुहब्बत है
वो तेरी पावन सी मुहब्बत है

चले गए (ग़ज़ल)

वो पीने पिलाने के भी बहाने चले गए
वो बारिशों के मौसम पुराने चले गए

जहाँ दौड़ लगाते थे वो बच्चे झूम कर
मैदान वो किसी के नज़राने चले गए

बेटीयाँ पूजते थे कंचकों में हम कभी
बेटियों को आज वो दफनाने चले गए

घर की रोटियों में वो स्वाद खास था
आज दावतों की बात सुनाने चले गए

नफ़रतें जो कहानियों का हिस्सा थीं
रिश्तों में उनको ही आजमाने चले गए

कहते थे जो हमारा मुल्क ही ईमान है
ख़ुशी ख़ुशी वो मुल्क बेगाने चले गए

जाने क्या सोच कर उनको खुदा कहा
जरुरत पर वो औकात दिखाने चले गए

जानते थे कि वफ़ा उनके बस में नहीं
फिर भी हम उनको आजमाने चले गए
                   

ग़ज़ल

चलो आज फिर दर्द को पुकारा जाए
इस बहाने सही नशा तो उतारा जाए

हो कहीं वजूद मुहब्बत का ज़रा देखें
अपनी तन्हाई को थोड़ा संवारा जाए

अभी शिद्दत अधूरी सी है मुहब्बत में
आँसुओं से धोकर इसे निखारा जाए

रोज रोज जीतना भी मज़ा नहीं देता
आज इक बार अपनों से हारा जाए

बड़ा नाजुक है दिल सँभाल के रखना
मुहब्बत में कहीं बेमौत न मारा जाए

बैठे हैं (ग़ज़ल)

जो भी चेहरे थे सामने आ ही गए
सब के सब बारिश में धुले बैठे हैं

अब कभी जो बूँद पड़ेगी दिल पर
मिट जायें गम दिल में घुले बैठे हैं

मुझे वफ़ा की बात सिखाते हैं वो
खुद मुहब्बत को जो भूले बैठे हैं

खुशी की बात कोई करता ही नहीं
लगता है लोग पहले से जले बैठे हैं

मेरे हक़ में तो सजा ही मुक़र्रर होगी
रूठे हैं वो अदालत में पहले बैठे हैं

जितना जी चाहे आज चेहरा देखो
कल न कहना हम इसे बदले बैठे हैं

आये हैं आज तो आजमा लें खुद को
दरिया में कश्ती हम जलजले बैठे हैं

शनिवार, 8 जुलाई 2017

मन


मन जानत नाहीं चैन
मन जानत नाहीं चैन
तुम बिन बन बावरा
फिरत रहत दिन रैन
मन जानत नाहीं चैन

मन जाने है पीर मन की
हम तुम जान न पाए
मन सुलगाये प्रेम अगन
मन ही फिर नीर बहाए
हालत अब कैसे सुनाए
कौन है कितना बेचैन
मन जानत नाहीं चैन

विरह का ये दर्द समाये
अँखियन राह तकता जाए
कैसी पहेली है ये मन भी
जो भी जाने खुद ही बुझाये
पिय मिलन को पल पल तरसे
आस भरे हैं जो नैन
मन जानत नाहीं चैन
मन जानत नाहीं चैन
तुम बिन बन बावरा
फिरत रहत दिन रैन






क्या उसका मज़हब होता है

चाँद जो नभ में उगता है
क्या उसका मजहब होता है
फूल चमन में खिलता है
क्या उसका मजहब होता है

आकाश में जो उड़ते फिरते हैं
रंग बिरंगे से ये पक्षी
उनको रोक सके सरहद कोई
ऐसी तो नहीं दिखती
बादल भी आकर बारिश में
सारी दुनिया भिगोता है
मुझको कोई तो ये समझा दो
क्या इनका मजहब होता है
चाँद जो नभ में उगता है
क्या उसका मजहब होता है

तलवार बंदूकें लहू में अक्सर
लोग जो आकर धोते हैं
नफरत के बीज लोग यहाँ
जाने क्यों ही बोते हैं
भूख जब लगती है ज़ोरों से
तो हर एक बच्चा रोता है
कोई उसको तब बतलायेगा
क्या उसका मजहब होता है
चाँद जो नभ में उगता है
क्या उसका मजहब होता है

शांति की है कुटिया पावन
नफरत वाली मीनारों से
राजपाठ ही हाँक रहे हैं नेता
रोज नए हथियारों से
धर्म के नाम जो क़त्ल हो रहे
देख अल्लाह ईश्वर रोता है
कोई अब तो बतला दो ये
क्या प्रेम का मजहब होता है
चाँद जो नभ में उगता है
क्या उसका मजहब होता है