ऐ खुदा आज फिर सुला मुझे पीपल की छाँव में
आख़िरी वक़्त है ले जा मुझे मेरे गाँव में
जहाँ हर दिन मैने मिट्टी संग गुज़ारा
जहाँ शाम ढले हर रोज माँ ने पुकारा
बापू के कांधे ने ऊँचाइयों से मिलाया
दादी की कहानी ने बड़े प्यार से सुलाया
जाने कितनी सर्दी गुज़ारी मैने अलाव में
आख़िरी वक़्त है ले जा मुझे मेरे गाँव में
इक दिन कुछ ख्वाब अधूरे छोड़े थे
जब मैने ये पाँव शहर को मोड़े थे
खेत खलिहान तब सारा दिन रोए थे
पनघट झूले ये सब भी गुमसुम होए थे
सारी उमर मैं बस पैसा कमाता रहा
अपनी मिट्टी को खुद से ही भुलाता रहा
शहरी ज़िंदगी निकली खुशी के अभाव में
आख़िरी वक़्त है ले जा मुझे मेरे गाँव में
-इश्क़