रविवार, 27 नवंबर 2016

उत्सव

देश तो उत्सव मना रहा है
नयी क्रांति भी ला रहा है
किसी गरीब को भी देखो
वो भूखे बच्चे सुला रहा है

तड़प रहा है आज तक जो
क़तार में खड़ा है आदमी
अत्याचार तमाम सहकर
मज़बूरी में पड़ा है आदमी
देशभक्ति की बयार में यूँ
हँसकर मुल्क बना रहा है
देश तो उत्सव मना रहा है
नयी क्रांति भी ला रहा है

आओ इस उत्सव में हम
अपने प्राणों की आहुति दें
आज़ादी की लड़ाई की वो
फिर दिल को अनुभूति दें
लेकिन देखा जो ताज़ा हाल
लोन ले कोई उड़ा जा रहा है
देश तो उत्सव मना रहा है
नयी क्रांति भी ला रहा है

कोई क्रांति ऐसी भी आये
जिसमें गरीब भी मुस्कुराये
ना रहे भूख रोटी की चिंता
नेता भी जनता से घबराये
मेरे दिल का क्या कहूँ मैं
कैसे ख्वाब ये सजा रहा है
देश तो उत्सव मना रहा है
नयी क्रांति भी ला रहा है
                           


रविवार, 20 नवंबर 2016

इंडिया मस्त है

इंडिया तो आज मस्त है
भारत ही अस्त व्यस्त है
अमीर कर रहे मौज यहाँ
गरीब सब जगह त्रस्त है

चारों ओर जिधर भी देखो
बस नोटों की मारामारी है
आज यहाँ सवाल पूछना
आजकल देश से गद्दारी है
लोग मर रहे लाइन में अब
लेकिन लाईन तो लाचारी है
बाकी सारे देशद्रोही लगते
सरकार बस वतन परस्त है
अमीर कर रहे मौज यहाँ
गरीब सब जगह त्रस्त है

पाँच सौ हज़ार अब बंद हुए
नया नोट आया दो हज़ारी है
दूध राशन सब्जी कैसे लायें
गायब हुई अब रेजगारी है
ललित विजय तो जीत मनाएं
नेताओं की भी तो अब मौज है
गरीब किसान के पीछे पड़ती
साहब जी की ही ये फौज है
जिसने हिंदुस्तान को थामा था
हिल रहे अब सारे दरख़्त है
अमीर कर रहे मौज यहाँ
गरीब सब जगह त्रस्त हैं

सैनिक मर रहे हैं सीमा पर
लोग मर रहे नोटों के खेल में
बाकी जो लोग बच जाते हैं
वो भी मर जाते हैं अब रेल में
पेट्रोल दुनिया में सस्ता हुआ
यहाँ तो आग लगी है तेल में
राष्ट्रवादी तो हँस रहे हैं देखो
हालत जनता की पस्त है
अमीर कर रहे हैं मौज यहाँ
गरीब सब जगह त्रस्त है
                                     

फ़ासले

हज़ारों फ़ासले देखे
हज़ारों गम पाए हैं
तमाम लोग ज़माने में
हमने आजमाए हैं

मुक़म्मल आरज़ू जैसी
कोई चीज नहीं होती
बिना हौंसले के यारों
तक़दीर भी नहीं होती
जो रिश्तों में यकीं नहीं
तो ज़िन्दगी सताये है
तमाम लोग ज़माने में
हमने आजमाए हैं

उनकी बातें जैसे साँसे
मेरे जीने की जरुरत है
उनको मैं समझाऊँ कैसे
कितनी उनसे मुहब्बत है
उनकी मुस्कानों में हमने
कितने ग़म भुलाये हैं
तमाम लोग ज़माने में
हमने आजमाए हैं

यूँ हक़ीक़त का फ़साना
आसान तो नहीं होता
ग़र मिल जाता यूँ ही से
तो वो चाँद नहीं होता
लोगों ने जिसको देख के
कई ख्वाब सजाये हैं
तमाम लोग ज़माने में
हमने आजमाए हैं
     

चाँद दीवाना

देखो पिया तुम भूल ना जाना
खिड़की पे बैठा चाँद दीवाना
अच्छा नहीं है मुझे तड़पाना
आजाना तुम घर जल्दी आना

मेरे पिया मैं तेरी राह निहारूँ
साँझ सकेरे तेरा नाम पुकारूँ
जिस रस्ते से तुमको है आना
उस रस्ते को मैं झाड़ू बुहारूँ
मेरी अरज भी तो सुनते जाना
आजाना तुम घर जल्दी आना
देखो पिया तुम भूल ना जाना
खिड़की पे बैठा चाँद दीवाना
अच्छा नहीं है मुझे तड़पाना
आजाना तुम घर जल्दी आना

बावरी कह मुझे लोग चिड़ायें
मेरा दरद वो समझ नहीं पाएँ
कैसे बिरह की पीड़ा बताऊँ
अखियन में बस राम समाये
प्रेम अगन में मोहे जलते जाना
आजाना तुम घर जल्दी आना
देखो पिया तुम भूल ना जाना
खिड़की पे बैठा चाँद दीवाना
अच्छा नहीं है मुझे तड़पाना
आजाना तुम घर जल्दी आना
             

रविवार, 6 नवंबर 2016

खिड़कियां

दिल के दरवाजे खोल दो सारे
बंद खिड़कियां भी खोल दो
अब तो मुहब्बत का मौसम है
ज़माने से आज ये बोल दो

लाख नफ़रतें बाँध रखी जो
ऐसी जंज़ीरें भी तोड़ दो
इंसान को इंसान से आज
इंसान बनाकर जोड़ दो
कह दो हुक्मरानों से ये भी
कि मज़हब की न दीवार है
हम हिंदुस्तानी हैं सभी
हमें इंसानियत से प्यार है
आज वफाओं का फिर से तुम
जान से भी ज्यादा मोल दो
दिल के दरवाजे खोल दो सारे
बंद खिड़कियां भी खोल दो

राम के भजन भी होएंगे अब
और अज़ान भी तो आएगी
दुःख का अँधियारा छट जायेगा
मानवता गीत बसंत गायेगी
मेरा कहना तुम मान जो लोगे
सारे कष्ट भी मिट जायेंगे
प्रेम की इस पावन भूमि में
फिर दुश्मनी नहीं पाएंगे
मेरा तेरा सब करना छोड़ के
हम से रिश्ता जोड़ लो
दिल के दरवाजे खोल दो सारे
बंद खिड़कियां भी खोल दो