शनिवार, 3 दिसंबर 2016

फ़ासला

फासलों के शहर में ज़रा हिफाज़त रखना
अपने हाथ में दुनिया की क़यामत रखना

दुरंगे चेहरों से अच्छा है बचकर निकलना
मतलबी लोगों से दूर की ही आदत रखना

वैसे ज़माने के दस्तूर भी निराले लगते हैं
कभी ख़फ़ा होना कभी शिकायत रखना

अंदाज़े बयाँ लोगों के अजब अजब से हैं
जो अपने हैं उनसे तमाम अदावत रखना

सच और झूठ का फैसला खुदा पर छोड़
बेहतर है हमारा आँखों में शरारत रखना

हमारा क्या है बेहद सादे ख्वाब हैं अपने
उस एक के लिए संभाल मुहब्बत रखना

नोटबंदी

लोग मुल्क के दिख रहे हैं आजकल कतारों में
देश भी तो चल रहा यूँ अब खातों में उधारों में

जिसको समझते थे अपने हाथ का मैल कभी
अब तड़प रहे हैं ये लोग उसके ही विचारों में

ये हुक्म ए निज़ाम है अब सवाल कौन पूछेगा
हथियार दिख रहे हैं उनके सिपहसालारों में

गरीब की औकात तो बस दो रोटी की बात है
अक्सर दिखता नहीं है वो भीड़ के किनारों में

कल तक जो घूमते थे मंदिर और मस्जिदों में
उनको भगवान दिख रहे हैं अब साहूकारों में

तड़प रहे हैं लोग अब तो दवा रोटी पानी को
नया अत्याचार है ये साहब के अत्याचारों में

नोट बंदी करके थपथपा रहे जो पीठ अपनी
बदल रहे हैं नोट हज़ार का अब दो हज़ारों में

काली कमाई ग़र ढूंढ़ना हो तो तुमको बताऊँ
सारे चोर तो शामिल हैं आपके वफादारों में
         

आहिस्ता आहिस्ता

गुज़र रही है शाम आहिस्ता आहिस्ता
फिर उस के नाम आहिस्ता आहिस्ता

कभी शिकन जो माथे पर आयी नहीं
कभी किस्मत में थी ऐसे जुदाई नहीं
छुपाना ज़ख्मों को यूँ आसान नही था
किसने कहा कि दिल परेशान नही था
मयख़ाने में भी ख़ामोशी मयस्सर नही
छलक रहे हैं जाम आहिस्ता आहिस्ता
गुज़र रही है शाम आहिस्ता आहिस्ता

उत्सवों के इस शहर में तुम चले आओ
तमन्नाएँ परे रख कर जरा मुस्कुराओ
अंधेरों ये हटा कर उजाले सजाओ तुम
चिरागों से क्या होगा सूरज उगाओ तुम
ज़िन्दगी भर ज़िन्दगी का इंतज़ार किया
हो रही उम्र तमाम आहिस्ता आहिस्ता
गुज़र रही है शाम आहिस्ता आहिस्ता
फिर उस के नाम आहिस्ता आहिस्ता


ख्याल

मेरा ख्याल है तू
तेरा ख्याल हूँ मैं
मेरा जवाब है तू
तेरा सवाल हूँ मैं
लाख खतायें तेरी मेरी
मैं भी भुला दूँ
तू भी भुला दे
अपनी मुहब्बत को सजदा
मैं भी बना लूँ
तू भी बना ले
ग़र बेमिसाल है तू
कोई कमाल हूँ मैं
मेरा जवाब है तू
तेरा सवाल हूँ मैं
मेरा ख्याल है तू
तेरा ख्याल हूँ मैं
थोड़ा पागलपन तुझ में है
थोड़ा पागल तो मैं भी हूँ
तेरी नज़र का तीर लगा तो
थोड़ा घायल तो मैं भी हूँ
जो रंग गुलाब है तू
तो रंग गुलाल हूँ मैं
मेरा जवाब है तू
तेरा सवाल हूँ मैं
मेरा ख्याल है तू
तेरा ख्याल हूँ मैं

गुरुवार, 1 दिसंबर 2016

कुछ भी नहीं

तू इबादत मेरी
तू ही चाहत मेरी
मैं हूँ तुझसे ही
तू मेरी ज़िन्दगी
तेरे बिन कुछ भी नहीं
कुछ भी नहीं
कुछ भी नहीं
तेरे बिन कुछ भी नहीं
तू मेरी ज़िन्दगी
तेरे बिन कुछ भी नहीं
ख़ामोशी सी है ये मुहब्बत
इसको आ लफ़्ज़ों से सजा दें
बेमौसम बारिश की बूँदें
लाकर हम इसको भिगा दें
आसमान में चाँद से आगे
अपनी मुहब्बत हम पहुँचा दें
कोई हद ना रहे
ना रहे ये जमीं
कुछ भी नहीं
कुछ भी नहीं
तेरे बिन कुछ भी नहीं
तू मेरी ज़िन्दगी
तेरे बिन कुछ भी नहीं
जब मैं सोचूँ ज़िन्दगी क्या है
दिल में इक तेरा चेहरा है
अब मेरा मुझमेँ क्या है बाकी
रूह है तू ये दिल भी तेरा है
चाँद सितारे और रंग सारे
देखूँ जब तू मुझको दिखता है
कोई लम्हा ना हो
कोई पल भी नहीं
कुछ भी नहीं
कुछ भी नहीं
तेरे बिन कुछ भी नहीं
तू मेरी ज़िन्दगी
तेरे बिन कुछ भी नहीं