मंगलवार, 4 अगस्त 2020

लोकतंत्र बचाओ

देश बदलना बहुत मुश्किल लगता है न? लेकिन बिल्कुल भी मुश्किल नहीं है। अगर आप चाहेंगे तो बहुत कुछ अच्छा हो सकता है। उसके लिए किसी का खून नहीं बहाना है। न ही दंगे करने हैं। न ही किसी तरह के तमाशे। बस हमें लोकतंत्र को ताकतवर बनाना होगा। 

अब आपका सवाल होगा कि लोकतंत्र को कैसे ताकतवर बनाएंगे? बहुत आसान है इसका जवाब। लोकतंत्र ताकतवर बनता है सवाल पूछ कर। चाहे सरपंच हो या प्रधानमंत्री। सब से सवाल पूछिये। उनको टोकिये। गलत करने पर रोकिए। पुरजोर आवाज़ उठाइए। सवाल ही लोकतंत्र को मजबूती देते हैं। जैसे आप घर के किसी सदस्य से पैसे का हिसाब या काम का हिसाब लेते हैं वैसे ही इन नेताओं से भी लीजिये। देखना फिर बहुत कुछ बदल जायेगा। 

एक काम और करना होगा आपको। जनप्रतिनिधियों पर एक कानून बनाने के लिए दबाव डालना होगा। वो कानून आपके लिए नहीं बल्कि जनप्रतिनिधियों के लिए ज़रूरी होगा। उस कानून में निम्न प्रावधान सुनिश्चित होने चाहिए :- 

1. सरपंच, पार्षद, विधायक, सांसद, मंत्री, मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री सभी का इलाज सरकारी अस्पतालों में होना चाहिए। उनके परिवारों का इलाज भी सरकारी अस्पतालों में होना चाहिए। ये सरकारी अस्पताल उनके क्षेत्र के होने चाहिए। स्थिति गंभीर होने पर ही अपने ही राज्य के बड़े सरकारी अस्पतालों में उन्हें रैफर किया जाए। 

2. सरपंच से लेकर प्रधानमंत्री तक के सभी जनप्रतिनिधियों के लिये सख़्त नियम होना चाहिए कि वो अपने बच्चों को सरकारी स्कूल अथवा कॉलेज में ही शिक्षा प्रदान करें। सरकारी कॉलेज न होने की स्थिति में मैरिट के आधार पर प्राइवेट कॉलेज में सीट अलॉट की जाए। 

3. दलबदल करने पर अगले 5 वर्षों तक किसी भी तरह का चुनाव लड़ने पर पाबंदी लगनी चाहिए। साथ ही दूसरे दल में किसी भी पद पर उनकी पदस्थापना पर सख्त रोक लगनी चाहिए। अगले 5 वर्षों तक वो एक साधारण कार्यकर्ता की तरह दूसरे दल में काम करें। 

4. जनप्रतिनिधियों को उनके मूल व्यवसाय से इस्तीफा देकर ही जनप्रतिनिधि के रूप में कार्य को मान्य किया जाए। यदि मूल व्यवसाय नहीं छोड़ें तो उन्हें हमेशा के लिए अयोग्य माना जाए। क्योंकि जनप्रतिनिधियों को सरकारी तनख्वाह एवं अन्य खर्च मिलते हैं। 

5. कोई भी केस साबित होने पर उनके चुनाव लड़ने पर रोक लगे। जनप्रतिनिधियों के जेल में रहते हुए चुनाव लड़ने पर भी रोक लगे। एक आम आदमी जेल में रहते हुए वोट नहीं डाल सकता फिर कोई जेल में रहकर चुनाव कैसे लड़ सकता है। 

6. सरकारी पद पर आसीन कोई भी अधिकारी अथवा कर्मचारी अपने पद से इस्तीफा देकर 5 वर्ष बाद ही चुनाव लड़े। इससे भ्रष्टाचार पर लगाम लगाई जा सकेगी। 

7. जनप्रतिनिधियों की आमदनी का प्रत्येक 6 माह में ऑडिट किया जाए। साथ ही उनके परिवारीजनों की आय का भी ऑडिट किया जाए। जिसके ऑडिट में तारतम्य न हो उसे नोटिस देकर जवाब मांगा जाए। जवाब में धन का स्त्रोत न मिलने पर सदस्यता रद्द की जाए। 

8. किसी भी तरह का चंदा पूर्णरूपेण पारदर्शी बनाया जाए। चंदा देने वालों के नाम सार्वजनिक किए जाएँ। 

9. सरकार में कैबिनेट की होने वाली प्रत्येक मीटिंग (सुरक्षा को छोड़ कर) लाइव की जाए। कुछ भी छुपा हुआ एजेंडा न रहे। 

10. जनप्रतिनिधियों के साथ रहने और घूमने वाले समर्थकों एवं राजनीतिक दल में पदाधिकारियों का पुलिस वेरिफिकेशन किया जाए और उनकी आय का भी ऑडिट किया जाए। 

11. जाति अथवा धर्म के आधार पर बने सारे संगठन एवं राजनीतिक दलों की मान्यता खत्म कर ऐसे दलों पर बैन लगाया जाए। 

12. धार्मिक नफरत फैलाने वाले बयान देने वालों की सदस्यता रद्द की जाए एवं उनको राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत मुकदमा चला कर सख्त सजा दी जाए। 

13. चुनाव पूर्व किये गए प्रत्येक वादे को पूर्ण करने का सख्त कानून बनाया जाए और इस प्रत्येक वर्ष जनता को हिसाब दिया जाए। यदि 70% वादे पूर्ण न हों तो उस सरकार में शामिल सभी मंत्रियों को 5 वर्ष किसी भी तरह के पद से विमुख रखा जाए। 

मुझे लगता है कि यदि इतना हो गया तो भारत को विश्व का सबसे शक्तिशाली और समृद्ध देश बनने से कोई नहीं रोक सकता। आप का क्या कहना है?

- हिमांशु श्रीवास्तव

शनिवार, 1 अगस्त 2020

नयनों से जब नयन मिलेंगे

नयनों से जब नयन मिलेंगे
तब दिल की बातें कह देना
प्रेम में आँखों अश्रु बहेंगे
तब दिल की बातें कह देना

तुमसे ही मेरे घर आँगन
तुमसे ही है सारा जीवन
एक तुम ही हो साँसें मेरी
तुमसे चलती दिल की धड़कन
तुम न हो तो उजाला मुझको
कभी भी अच्छा नहीं लगता
दुनिया का हो कोई भी सच
मुझे तो सच्चा नहीं लगता
सच्ची सारी बात करेंगे
तब दिल की बातें कह देना
नयनों से जब नयन मिलेंगे
तब दिल की बातें कह देना

यूँ तो तुम्हारे अधरों पर
जग का सारा मीठापन है
ये तुम्हारी सुंदर आँखें
जैसे एक सच्चा दर्पण है
तुम्हारे गेसू में छिप कर
सूरज अंधेरा करता है
तुम्हारी मुस्कानों से ही
पुष्प इस धरा पर खिलता है
प्रेम पुष्प जब कहीं खिलेंगे
तब दिल की बातें कह देना
नयनों से जब नयन मिलेंगे
तब दिल की बातें कह देना

चाँद सितारे साक्षी बन कर
प्रेम हमारा महकाएँगे
हमारे हृदय के भावों को
गीत बना कर सब गाएँगे
सूरज की गरमी में तप कर
सब कुछ सोना हो जायेगा
जमाने का अब भय नहीं है
जो हो होना हो जायेगा
हाथ पकड़ कर साथ चलेंगे
तब दिल की बातें कह देना
नयनों से जब नयन मिलेंगे
तब दिल की बातें कह देना

- हिमांशु श्रीवास्तव 

मंगलवार, 21 जुलाई 2020

बह जाने दो

न रोको मुझे, जाने दो
पानी सा बह जाने दो
तुम्हारी यादों में कहीं
तुम मुझे रह जाने दो

हूँ वक़्त का कोई पल
पल में गुज़र जाऊँगा
ढूँढोगे तुम जो मुझको
मैं न कहीं नजर आऊँगा
ज़रा बात सुन लो मेरी
मुझको कह जाने दो
न रोको मुझे, जाने दो
पानी सा, बह जाने दो

वक़्त था तो वक़्त का 
क्यों करें हम गिला
जो भी मिला था हमें
अच्छा रहा सो मिला
ख़्वाहिशों की चादरें
अब तो उड़ जाने दो
न रोको मुझे, जाने दो
पानी सा, बह जाने दो





बुधवार, 24 जून 2020

"गधों का राज आया"


गधों ने गधों को ही गीत देकर
गधों ने गधों का संगीत देकर
गधों ने गधों को है राजा बनाया
देख लो गधों का है राज आया

गधों की ये बातें गधे ही सुनेंगे
गधे ही गधों के लिए ख़्वाब बुनेंगे
गधों ने गधों को है ढेंचूँ सुनाया
देख लो गधों का है राज आया

की है गधों ने लड़ने की तैयारी
गधे पड़ रहे अब घोड़ों पे भारी
गधों ने दुलत्ती को हथियार बनाया
देख लो गधों का है राज आया

गधों ने कभी की नहीं है पढ़ाई
गधों की समझ में कोई बात न आई
गधे देख कर ही गधा मुस्कुराया
देख लो गधों का है राज आया

इतिहास बदल है गधों की ज़रूरत
विज्ञान से गधों को नहीं है मुहब्बत
फाड़ किताबें गधों को भी ताव आया
देख लो गधों का है राज आया

रहना है ज़िंदा तो गधा बनना होगा
गधों के सुर में ही ढेंचूँ कहना होगा
गधों को है घोड़ा नहीं रास आया
देख लो गधों का है राज आया

गधों को नशा है गधों को मज़ा है
गधा जो नहीं है उसे बस सजा है
गधों को अब गधा होना है भाया
देख लो गधों का है राज आया

गधे जो कहें वो ही बात सही है
घोड़ों को अब आज़ादी नहीं है
घोड़ों ने है गधों का बोझ उठाया
देख लो गधों का है राज आया

गधों के ही लिए है घास सुनलो
तुम गधे नहीं दूसरा मुल्क़ चुनलो
गधों ने है अब ये कानून बनाया
देख लो गधों का है राज आया

गधों से सवाल पूछना है गद्दारी
गधों में ही देशभक्ति भरी है सारी
गधों ने ही गधों को भगवान बनाया
देख लो गधों का है राज आया

गधों को दुनिया में गधे ही दिखते
गधों के बाजार में गधे ही बिकते
गधों ने गधों का दाम ऊँचा लगाया
देख लो गधों का है राज आया

- हिमांशु श्रीवास्तव

रविवार, 17 मई 2020

तख़्त का मज़ेदार तमाशा



तख्तों की ऊँचाई इतनी ज़्यादा हो गयी है कि सड़क पर चलते आम लोग तख़्त पर बैठे हुए लोगों को नज़र नहीं आते। अगर वो थोड़ा झुक कर देखते भी हैं तो उन्हें लगता है कि कीड़े मकौड़े हैं जिनको तख़्त के पाए के नीचे कुचल कर खुद ही मर जाना है। 

उनकी कोशिश बस इतनी होती है कि तख़्त के पायों में किसी भी तरह दीमक न लग पाए। दीमक वो लोग होते हैं जो गरीब, मजदूरों के हक़ की बात करते हैं। अन्याय और अत्याचार के विरोध में खड़े होते हैं और वो लोग भी जो तख़्त को झुक कर सलाम नहीं करते। 

तख़्त के नीचे मुलायम गद्दी लगी होती है जो चापलूसी से बनी होती है। तख़्त में मौकापरस्ती की कीलें लगाई जाती हैं मजबूती देने के लिए। तख़्त की पीठ सीधी रखी जाती है जिससे कि तख़्त पर बैठने वाला किसी के सामने नहीं झुके। वो तना रहे तख़्त की कठोर पीठ की तरह। 

तख़्त में सोना चाँदी हीरे जवाहरात जड़े होते हैं। जिसकी कीमत चुकाते हैं आम किसान, मजदूर, व्यापारी, बेरोजगार और सैनिक भी। सैनिक तो तख़्त की सुरक्षा में भी लगे रहते हैं। तख़्त को कोई ख़तरा नहीं होना चाहिए। जब भी किसी से तख़्त को ख़तरा होता है तो सैनिक उस ख़तरे को ख़त्म कर देते हैं। 

तख़्त रखे जाते हैं ऊँचे और आलीशान महलों में। जिनको बनाते हैं गरीब मजदूर। लेकिन बनने के बाद सबसे ज़्यादा दूर किया जाता है मजदूरों को ही। कहीं अगर उन्होंने महल में प्रवेश किया और तख़्त के पास जा पहुँचे तो तख़्त को ख़तरा हो जायेगा। एक तख़्त के लिए पूरी प्रजा को क़ुर्बान किया जा सकता है। लेकिन तख़्त कभी प्रजा के लिए क़ुर्बान नहीं किया जाता। 

तख़्त में लगा लाल रंग लहू से बनाया गया है। हज़ारों लाखों लोगों के लहू से तख़्त को सजाया गया। जितना ज़्यादा लहू उतना ही गहरा रंग तख़्त का। इस लहू के लिए जनता पर अत्याचार किये जाते हैं, बड़े बड़े युद्ध रचे जाते हैं। यह लगातार चलने वाली प्रक्रिया है क्योंकि समय समय पर तख़्त के लाल रंग को और गहरा करने की ज़रूरत होती है। 

तख़्त के इर्दगिर्द जमावड़ा होता है कुछ लोगों का। ये लोग होते हैं बड़े पूँजीपति, अपराधी, बड़े व्यापारी, हत्यारे, और कुछ शैतान। बाकी लोग तख़्त पर बैठने वाले के खास होते हैं। पूँजीपति जनता से पूँजी चूसते हैं और फिर आधी पूँजी तख़्त को समर्पित कर आधी खुद रखते हैं। अपराधी तख़्त के सामने जनता में खौफ़ बनाये रखते हैं जिससे कि कोई सर न उठा सके विरोध में। बड़े व्यापारी तख़्त के साथ कारोबारी रिश्ते बना कर मुनाफा वसूली में लगे रहते हैं जिनका काम होता है नफा सरकार के हिस्से करना और नुकसान जनता के सिर मढ़ देना। हत्यारे तख़्त के आदेश पर विरोधियों की हत्याएँ करते हैं। शैतान का काम होता है तख़्त पर बैठे हुए को शैतान के साथ शामिल करना और उससे जनता के दिल में शैतान की हुक़ूमत को मनवाना। 

बाकी खास लोग वो होते हैं जिनको लगता है कि बाद में ये तख़्त उनको मिलेगा इसलिए हर बुरे काम को वो अपना समर्थन देते हैं और ये उम्मीद रखते हैं कि वो खुद भी तख्तनशीं हो जाएंगे कभी न कभी। 

तख़्त की बादशाहत को कायम रखने के लिए तरह तरह के छल प्रपंच रचे जाते हैं। जनता कहीं एक साथ विद्रोह न कर दे इसलिए उन्हें छोटे छोटे टुकड़ों में बाँटा जाता है। फिर उनको आपस में लड़वाया जाता है। कुछ जगहों पर सैनिकों को छूट दी जाती है कि विरोधियों के साथ मनमानी कर सकें। कानून के नाम पर लोगों को कई वर्षों तक बिना किसी गुनाह के जेल भेज दिया जाता है। दंगे करवाये जाते हैं। काफ़िले लुटवाये जाते हैं। शहरों को जलाया जाता है। 

फिर भी अगर कोई ख़तरा उत्पन्न होता है तो एक दुश्मन देश की काल्पनिक कहानी जनता के सामने रखी जाती है। फिर उसी दुश्मन देश के नाम पर जनता को एक होने का पाठ पढ़ाया जाता है। राष्ट्रवाद के नाम पर किसी भी तरह के विरोध को दबा दिया जाता है। 

हथियारों की प्रदर्शनी लगाई जाती है। जनता को बरगलाया जाता है कि चाकू खंजर या तलवारें उठा ले और आपस में मारकाट शुरू कर दे। फिर जनता आपस में उलझ कर रह जाती है और तख़्त पर आया ख़तरा टल जाता है। 

तख़्त की सुरक्षा के लिए आम जनता को धर्म और जाति का नशा चढ़ाया जाता है। धर्म के नाम पर जनता आपस में मरने मारने को तैयार हो जाती है और लहू बहाती है। ये सब तख़्त को मजबूती देते हैं। ये लहू तख़्त की चमक बढ़ाता है। लहू हमेशा से ही तख़्त को ताक़त देता है। तख़्त की कहानियाँ हमेशा से ही लहू के बिना पूरी नहीं होती। धर्म हमेशा से तख़्त के लिए हथियार रहा है। तख़्त के एक हाथ में तलवार होती है दूसरे हाथ में धर्म। जबकि काम दोनों का एक ही होता है।

किसी बीमारी अथवा महामारी के काल में जब आम जनता मर रही होती है तब जनता को समाजसेवा का पाठ पढ़ाया जाता है और उनसे अधिक कर वसूले जाते हैं। जनता को लगता है कि अधिक कर देकर वह अपने जैसे लोगों की मदद कर रही है जबकि वो सारा पैसा तख़्त के खजाने और उसकी देखरेख में चला जाता है। 

असल में ये एक पूरी व्यवस्था बनाई गई है जो पहले राजशाही में थी और अब इसी का नाम बदल कर लोकतंत्र कर दिया गया। नाम बदल गए लेकिन व्यवस्था नहीं बदली। 

तख़्त आज भी कायम है। तख़्त की सत्ता आज भी चल रही है। तख़्त के भारी पाए तले आम जनता कुचल कर मारी जा रही है। तख़्त के आसपास मौजूद लोग ताली बजा रहे हैं और तमाशा मज़ेदार होता जा रहा है। 

- हिमांशु श्रीवास्तव

मंगलवार, 5 मई 2020

चवन्नी

तुम्हारे बस हाथ चवन्नी है
तुम्हारी औकात चवन्नी है
जितने चाहे भाषण दे दो
तुम्हारी हर बात चवन्नी है

चार आने की बातों से 
तुम तमाशे दिखाते हो
लेकिन सच सामने आए
तो पीछे छुप जाते हो
तुम्हारे दिन हैं दो कौड़ी
तुम्हारी रात चवन्नी है
जितने चाहे भाषण दे दो
तुम्हारी हर बात चवन्नी है

लूट खसोट और गुंडागर्दी
ये सब काम तुम्हारे हैं
हिटलर, चंगेज तानाशाह
ये सारे नाम तुम्हारे हैं
तुम खोटे सिक्के बाजारू
तुमसे मुलाकात चवन्नी है
जितने चाहे भाषण दे दो
तुम्हारी हर बात चवन्नी है

जनता को तुम आपस में
धर्म जात पर लड़वाओगे
तुम हो नए दौर के रावण
नए रूप में वापस आओगे
तुम नेताओं की राजनीति में
शह और मात चवन्नी है
जितने चाहे भाषण दे दो
तुम्हारी हर बात चवन्नी है

शुक्रवार, 1 मई 2020

न आया

गिरते रहे संभलना न आया
ज़िन्दगी हमें ठहरना न आया

निगाहों से अश्क न संभला
बहता रहा संभलना न आया

सहा बहुत कुछ कहा नहीं
दिल को मेरे कहना न आया

टूट कर बिखरे हम काँच से
तमाशों से बहलना न आया

मसरूफ़ रहे खुद में ही हम
ज़माने को समझना न आया

ज़िन्दगी हमको रास न आयी
मौत में हमको मरना न आया

ख़ामोशी से

रुख़ बदल रहे हैं ख़ामोशी से
दर्द निकल रहे हैं खामोशी से

उम्र भर परेशान रहे जिनसे
ज़ख्म पल रहे हैं खामोशी से

इस क़दर नहीं आसाँ मुहब्बत
ख़्वाब बहल रहे हैं ख़ामोशी से

एक से नहीं रहते हालात कभी
आज संभल रहे हैं ख़ामोशी से

अँधेरा यूँ ही नहीं मिटा होगा
चराग जल रहे हैं ख़ामोशी से

उनसे कहो कभी मिलें हमसे
हम पिघल रहे हैं खामोशी से


रविवार, 26 अप्रैल 2020

रंगभेद

एक लाश पड़ी थी बीच में जिसके चारों तरफ मजमा लगा था अलग अलग रंगों का। सभी रंग अपने अपने रंग के अनुसार उस लाश पर अपना हक़ जमा रहे थे। लेकिन जब तफ़सील से लाश के बारे में बताने की बात आती तो सब कन्नी काट जाते थे।

असल में सभी रंग मौका ढूँढ़ रहे थे कि लाश उनकी कौम की मालूम हो जाये तो दूसरे रंग वालों पर इल्ज़ाम लगा सकें और फिर उनकी बस्ती में जाकर अपनी ताक़त की ज़ोर आज़माइश कर सकें।

कानून अपनी आँख पर हमेशा की तरह पट्टी बाँध कर लाश के मुर्दा ज़िस्म का मुआयना कर रहा था। लेकिन उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था। तब तक कानून लिखने और संभालने वाले एक खास रंग को इस लाश का मालिक बनाने के लिए कुछ नए तरीके लिखने लगे।

तभी कानून को मुर्दा ज़िस्म में एक पर्ची मिली जिस पर लाश की पहचान के लिए नाम लिखा था। सिर्फ एक लफ्ज़। "इंसान।"

अब इंसान को किस रंग की तरफ माना जाए। मजमे की सारी बहस इस तरफ मुड़ गयी। अफ़सोसनाक ये था कि लाश जो अब इंसान की थी उस पर कोई रंग भी नहीं दिख रहा था। अब कैसे उस पर रंग चढ़ाया जाए अपने हिसाब का? ये सभी रंगों के लीडर सोचने लगे थे।

ये बिना रंग की लाश उनको तख़्त के पास ले जा सकती थी। जिस पर बैठ कर वो एक अपने रंग की तरफदारी खुल कर कर सकते थे और दूसरे रंगों को डरा धमका या मार कर ख़ामोश करवा सकते थे। लेकिन सवाल वही कि इस मुर्दा इंसान पर रंग चढ़ाएं तो चढ़ाएं कैसे?

तमाम लीडरान को धीरे धीरे ये समझ आ रहा था कि उनको इंसान की नहीं बल्कि मुर्दा ज़िस्म की ज़रूरत थी। एक लाश की ज़रूरत थी। इंसान तो उनके किसी काम का नहीं था। लाश के ऊपर वो सियासत बखूबी कर सकते हैं। दूसरे रंगों को दुश्मन बता कर उनके खात्मे की बात कर सकते हैं। उनके लिए दुनिया की खूबसूरती सिर्फ उनके अपने रंग से थी। उनके हिसाब से बाकी कोई रंग होना ही नहीं चाहिए था।

खैर! वो सब लीडरान समझ गए कि सियासत कैसे करनी है जब रंग नहीं दिख रहा हो। इसलिए वो सभी अपने अपने रंगों को भड़काने में लग गए। आग लगाने की तैयारी शुरू हो गयी थी जिसमें दुश्मन रंगों को जलाकर ख़ाक करना था। सभी रंगों ने एक दूसरे के खिलाफ मोर्चा खोल लिया था। हथियार गोला बारूद जमा किये जाने लगे। कानून अब भी अपनी आँख पर पट्टी बाँध कर उस लाश के पास तसल्लीबख्श बैठा हुआ था।

लाश में कोई ज़ुम्बिश नहीं हो सकती थी। कानून भी अपने हाथ पैर खुद नहीं हिला सकता था। कानून की देखभाल करने वाले अब रंगों में होने वाली लड़ाई के कायदे तय करने में जुट गए। असल में वो भी अपने पसंदीदा रंग को जिताने के लिए उसके मुताबिक़ कायदे बना रहे थे जिससे कि कुछ भी गैरकानूनी न लगे।

इंसान की गैर रंग की लाश अब भी पड़ी थी। वहीं कोई खड़ा हुआ था जो इस माहौल को देख कर खुश था। वो सबके साथ था सिवाय इंसान की लाश के। सभी रंगों का हौसला बढ़ा रहा था वो। सभी रंग उसको अपना मसीहा मानने लगे थे कि वो हमारे साथ है वो हमारे साथ है।

चेहरा बदसूरत था और हाथ खूँ में रंगे हुए थे। अचानक उसकी पॉकेट से एक पर्ची गिरी। जिस पर लिखा हुआ था "शैतान!"

इंसान की बेरंगी लाश अब सड़ने लगी थी। रंग आपस में लड़ना शुरू कर चुके थे। मौतें होना शुरू हो चुकी थी। सब से पहले उन इंसानों को मारा जाने लगा जिन पर या तो कोई रंग नहीं चढ़ा था या फिर जिन पर सभी रंग बराबर चढ़े थे। कानून ख़ामोश बैठा हुआ था। लेकिन धीरे धीरे आपस में लड़ते हुए सभी रंग खत्म होने लगे थे। दुनिया बदरंग होने लगी थी और शैतान....शैतान बस मुस्कुरा रहा था।

शुक्रवार, 27 मार्च 2020

Dream



घर की सीढियाँ जल्दी जल्दी चढ़ रहा था। टेंशन उसके चेहरे पर दिख रही थी। पसीना पसीना हो रहा था। ऊपर से फ्लैट भी 5 मंजिल ऊपर था। थक हार कर फ्लैट के दरवाजे पर पहुँच गया आख़िर। अब अपने बैग की चेन खोल कर चाभियाँ ढूँढ़ने लगा। 

"रखी तो थी ऑफिस से निकलते टाइम। कहाँ गईं। उफ़्फ़। जब टेंशन हो तो चारों तरफ से मुसीबत एक साथ आ जाती है। अभी ही इन चाभियों को गायब होने था।" बैग में हाथ डाल कर टटोलता हुआ बड़बड़ाता भी जा रहा था। 

अचानक चेहरे पर चमक आ गयी। हाथ को चाभी मिली और चेहरे पर सुकून दिखने लगा। चाभी निकाल कर लॉक के छेद में डाली और चाभी घुमाई। लेकिन ये क्या! चाभी तो घूम ही नहीं रही। चाभी फिर निकाल कर दुबारा डाली लेकिन लॉक खुल ही नहीं रहा। चिढ़ कर उसने दरवाजे पर नीचे गुस्से से लात मारी। लेकिन उसके पैर में ही लगी। पैर वापस खींच कर आह निकाली मुँह से और फिर चाभी लॉक में डाली लेकिन लॉक नहीं खुला। फिर गुस्से में चाभी ज़ोर ज़ोर से घुमाने लगा लेकिन कुछ नहीं हो रहा था। चिढ़ और गुस्सा उसके चेहरे पर साफ दिख रहा था। 

गुस्से में उसने चाभी लॉक में ही छोड़ी और फोन निकाल कर कुछ सर्च करने लगा। अचानक उसे लगा कि लॉक खुल गया। वो चाभी को छू कर घुमाने ही वाला था कि अचानक लॉक खुल गया। लॉक खुलते ही दरवाज़ा भी अपने आप खुल गया। वो चौंक गया क्योंकि अंदर तो कोई था ही नहीं जो अंदर से खोलता। लेकिन उसने ध्यान न देकर जल्दी से दरवाजा खोला। फिर जल्दी से अंदर आकर दरवाजा बंद किया और पीछे मुड़ा। सामने टेबल पर उसने जल्दी से बैग रखा और दूसरे रूम की तरफ भागा। दूसरे रूम में जाकर सीधे एक दरवाजा खोला और अंदर चला गया। वो बाथरूम था। अब वो बाथरूम के अंदर था और उसकी सुकून में डूबी आह की आवाज़ आई जैसे कि कितनी देर से प्रेशर होल्ड करके रखा था उसने।

कुछ देर में वो बाहर आया। सामने वॉल पर टॉविल टंगी थी जिससे उसने अपने गीले हाथ साफ किये और वापस पहले रूम में आकर सोफे पर बैठ गया।

अचानक उसने देखा कि छत पर लगा पंखा चल रहा है। वो बोला कि, "अरे ये मैंने क़ब चालू किया?" सोचते हुए खुद ही बोल पड़ा कि शायद जल्दी में कर दिया होगा। इतनी दूर से प्रेशर में था कुछ समझ ही नहीं आ रहा था। खैर चलो अब थोड़ा आराम कर लूँ। कह कर वो सोफे पर ही पैर फैला कर लेट गया। 

अभी लेटा ही था कि उसे लगा कि कोई उसके आसपास चल रहा है। वो साफ सुन पा रहा था चलने की आवाज़। लेकिन वो तो अकेला था घर में। वो डरने लगा। उसे डर लग रहा था लेकिन फिर भी वो देखना चाहता था कि कौन घूम रहा है। आवाज़ बिल्कुल उसके करीब थी। वो साफ सुन सकता था लेकिन आँख नहीं खोल पा रहा था डर की वजह से। फिर उसे अपना मेन डोर खुलने की आवाज़ आयी जो अभी थोड़ी देर पहले बहुत मुश्किल से खुला था। डोर खुल कर आवाज़ कर रहा था हिलने की। वहीं चहलकदमी की आवाज़ उसके बहुत करीब आ गयी थी।

अब उससे रहा नहीं गया और एक झटके से उसने आँखें खोल दी। आँखें खुलते ही उसके सामने कोई नहीं था। उसने कमरे में चारों तरफ नज़रें दौड़ाई। एक एक कोने में निगाह मारी लेकिन कहीं कुछ नहीं था। फिर उसने अपने सामने लगे दरवाजे को देख जिसके खुलने की आवाज़ आयी थी लेकिन वो भी बंद था। 

वो चौंक गया। खुद से ही बोल पड़ा कि ये सब क्या था। अभी तो आवाज़ आ रही थी। पता नहीं शायद वहम होगा मेरा। आफिस का प्रेशर इतना है कि क्या क्या सोचने लगा हूँ मैं। यह बोलते बोलते उसने मोबाइल उठा कर टाइम देखा। 9 बज कर 15 मिनट हो रहे थे। ओह्ह आज लेट हो गया कॉल करने में। माँ वेट कर रही होगी मेरे फ़ोन का। कह कर उसने अपने फोन में नंबर डायल कर दिया। 

"हाँ माँ। कैसी हो?" फोन पर वो कहने लगा।
बातें कर रहा था वो अब फ़ोन पर अपनी माँ से -
"नहीं माँ, टाइम पर आ गया था लेकिन लेट गया और झपकी लग गयी। 
हाँ अभी खाऊँगा। थोड़ा सा काम भी है ऑफिस का तो वो करके सो जाऊँगा।"
आपने अपनी दवा ली? घर आऊँगा अगले हफ़्ते। 
अच्छा मैं रखता हूँ फ़ोन। आप भी ख्याल रखना अपना। आई लव यू माँ। गुड नाईट।"

फोन रख कर वो किचन की तरफ गया। वहाँ खाना बनाने लगा। खाना बनाते बनाते वो फोन में वीडियो भी देखने लगा पास में रख कर। न्यूज़ देख रहा था फोन में। साथ ही खाना बना रहा था। थोड़ी देर में खाना बना कर वो प्लेट में निकाल कर वापस बाहर वाले रूम में आकर बैठ गया और खाना खाने लगा। 

खाना ख़त्म किया उसने और प्लेट वापस किचन में जाकर सिंक में रख आया। आकर उसने एक ग्लास में कोल्ड ड्रिंक ली और अपने बेडरूम में चला गया। अचानक वहाँ से आया और लैपटॉप भी ले गया। बैडरूम में उसने लैपटॉप निकाला और चार्जिंग केबल सॉकेट में कनेक्ट कर अपने लैपटॉप को चार्ज कर ओपन कर लिया। सामने दीवार पर टीवी लगी थी जिसे उसने ऑन कर दिया। 

काश कहीं पर हॉरर मूवी आ रही हो। कह कर वो चैनल सर्च करने लगा। ओह्ह मिल गयी। एक हॉरर मूवी चल रही थी।

उफ़्फ़ कितनी बार एक ही मूवी दिखाएंगे। डर लगता नहीं ऐसे। कितनी बार तो देख चुका हूँ। कह कर उसने टीवी बंद कर दी। और अपना लैपटॉप खोल कर एक सॉन्ग चलाया और साथ में ऑफिस का काम करने लगा। 

अचानक उसका फोन बजा। देखा तो उसकी गर्लफ्रैंड का कॉल था। उसने फ़ोन उठाते ही बोला, "कितनी लंबी उमर है तुम्हारी। जस्ट तुमको ही कॉल करने वाला था।"

"अरे सच में, अभी माँ से ही बात कर रहा था। सोच रहा था कि माँ फोन रखें तो तुमको कॉल करूँ। जैसे ही रखा माँ ने फ़ोन, तुम्हारा कॉल आ गया।" कहते हुए खुद ही अपने झूठ पर मुस्कुरा गया।

"हाँ खाना खा लिया है। तुम यहाँ होते तो कुछ और भी खा लेता लेकिन क्या करूँ। तुम इतनी दूर जो हो। यहाँ ट्रांसफर ले लो तो साथ ही रहा करेंगे।"

"हाँ अब ऑफिस का काम करूँगा और सो जाऊँगा। नहीं यार। कोई अच्छी हॉरर मूवी नहीं आ रही। सब घिसी पिटी फिल्में ही आ रही हैं। अब डर तो दूर की बात देखने का भी दिल नहीं कर रहा। इनसे अच्छी हॉरर मूवी तो मैं बना दूँ।"

"क्या कहा? भूत! हाहाहाहा। कितनी बार कहा है कि भूत वूत जैसी कोई चीज नहीं होती। सिर्फ हमारा वहम होता है ये। अनपढ़ लोगों ने अपने वहम को भूत का नाम दे दिया है। तुम तो इतनी पढ़ी लिखी हो तुम ऐसी बात कर रही हो।"

"अगर कोई भूत मिले तो मेरे पास भेज देना। बेचारा मुझसे डर कर भाग जाएगा।" हँसते हुए कहता है। "चलो बाद में बात करते हैं। तुम भी सो जाओ। मैं भी सो जाऊँगा थोड़ी देर बाद।" कह कर वो फोन डिसकनेक्ट करता है। गहरी साँस लेकर आरामदायक मुद्रा में पीछे सरक कर अपनी पीठ बेड के कार्नर पर टिका देता है और कुछ सोचने लगता है। और सोचते सोचते आँखें बंद कर लेता है।

बहुत जोर की हवा चल रही है। दरवाजा हवा के कारण खुल रहा है और बंद हो रहा है जिसके कारण बहुत जोरों से आवाज़ हो रही है। पेपर्स भी उड़ कर नीचे गिर गए हैं। हवा तेज़ होती जा रही है और हवा की आवाज़ भी। अचानक इन आवाज़ों से वो अपनी आँख खोलता है। तो वहाँ देखता है कि कोई हवा नहीं है। दरवाज़ा भी बंद है। पेपर्स अपनी जगह हैं। लैपटॉप ऑन है और साथ ही वो गाना जो उसने प्ले किया था वो बार बार बज रहा है। मोबाइल में टाइम देखता है तो पता चलता है कि 12 बज चुके हैं। वो उठता है और लैपटॉप शटडाउन करके लैपटॉप बैग में रख देता है। पेपर्स को भी देख कर बैग में रख देता है। अब मोबाइल और उसका चार्जर उठा कर अंदर जाने लगता है अचानक पलट कर वो दरवाज़ा चैक करता है कि कहीं खुला तो नहीं। लेकिन दरवाज़ा बंद था। फिर वो उस कमरे की लाइट ऑफ करता है और फैन भी ऑफ करता है। फिर किचन में जाकर एक ग्लास पानी पीता है और फ्रिज में से एक पानी की बॉटल निकाल कर एक हाथ में बगल में दबा कर दूसरे हाथ में मोबाइल और चार्जर पकड़ कर बेडरूम में चला जाता है। 

बेडरूम में जाकर वो पहले फ़ोन बेड पर रखता है और पास में ही चार्जिंग सॉकेट में चार्जर लगा कर उसे फ़ोन में कनेक्ट कर स्विच ऑन कर देता है। फोन अब चार्ज होने लगता है। उसमें 3% ही बैटरी दिखा रहा था। वो सुकून की साँस लेता है। फिर एक कार्नर में लगी कबर्ड की तरफ बढ़ता है। उसमें से अपने घर के कपड़े निकालता है और कपड़े बदल लेता है। जो कपड़े ऑफिस पहन कर गया था उन्हें एक कार्नर में रखे कपड़ों के ढेर में रख देता है। फिर परफ्यूम उठा कर खुद पर स्प्रे करता है जैसे कि कहीं बाहर जाने के लिए तैयार हो रहा हो। आईने में देख कर बाल ठीक करता है। फिर खुद को देख कर मुस्कुराता है और पलट कर वापस बेड पर आकर लेट जाता है। 

लेकिन अचानक से फिर उठ जाता है। पानी की बॉटल लाया था लेकिन कहीं दिखाई नहीं दे रही थी। पूरे कमरे में नज़र दौड़ाता है लेकिन इसे कहीं दिखाई नहीं दे रही थी। वो उठ कर याद करता है फिर कबर्ड खोल कर देखता है। उसे वहाँ नहीं दिखती। वो परेशान हो जाता है। खुद से ही बोलता है, "लाया तो था यार। कहाँ रख दी। आजकल कुछ याद ही नहीं रहता।" अचानक बेड पर नज़र पड़ती है तो चौंक जाता है। 

जहाँ वो लेटा था जाकर अब वहाँ पानी की बॉटल पड़ी हुई थी। ऐसे जैसे कि लेटी हुई हो। वो बेड पर जाता है। बॉटल को गौर से देखता है। अचानक वो देखता हुआ खो सा जाता है। बिना पलक झपकाए वो उसे देख रहा था। पत्थर सा बना हुआ। 

अचानक वो होश में आता है। वो बेड पर लेटा हुआ था। अपने बेड पर देखता है उठ कर कि पानी की बोतल कहाँ गयी। अचानक उसे दिखाई देता है कि पानी की बोतल पास में ही रखी टेबल पर है। वो चौंक जाता है। उसकी आँखें फटी रह जाती हैं। सोचता हुआ पानी की बोतल उठा कर पानी ग्लास में डालता है। बोतल का ढक्कन बंद कर वो बोतल वहीं रख देता है। ग्लास उठा कर पानी पीता है और ग्लास वहाँ टेबल पर ही रख देता है। फोन में उठ कर टाइम देखता है तो 2 बज रहे थे। उठ कर बाहर निकलता है कमरे से। वहाँ से सीधा बाथरूम में जाता है। फिर बाहर निकलता है और अपने रूम में आता है और दरवाज़ा बंद कर देता है। फिर से आईने के सामने जाता है तो चौंक जाता है। वो ऑफिस के कपड़ों में ही था अभी तक। लेकिन कपड़े तो उसने बदल दिए थे। 

अपने कपड़ों को छू कर देखता है। चिकोटी काटता है खुद को। आह की आवाज़ निकालता है चिकोटी काटने से खुद ही। परेशानी उसके चेहरे पर दिखाई देने लगती है। वो कबर्ड खोलता है। देखता है कि जो कपड़े थोड़ी देर पहले ही उसने बदले थे वो वापस कबर्ड में थे। 

वो उनको बाहर निकालता है और फिर कपड़े बदलने लगता है। जैसे ही ऑफिस के पहने कपड़े बदलता है उसे अजीब सी बदबू आती है। वो सूँघता है कपड़ों को और खुद ही नाक सिकोड़ कर कपड़े उसी कपड़े के ढेर में डाल देता है। घर के कपड़े पहन वो वापस अपने बेड पर आता है। फिर लेट जाता है। अचानक से उसे ऐसा लगता है कि पानी की बोतल उसके नीचे आ गयी है। वो चौंक कर उठता है और अपने नीचे बेड पर देखता है। बेड पर कुछ नहीं था। फिर वो टेबल पर देखता है। बोतल टेबल पर ही थी। वो सुकून महसूस करता है। वो लेट जाता है। लेटते ही वो आँख बंद कर लेता है।

अचानक उसकी आँखें बंद होते हुए भी चौंधियाने लगती हैं। ऐसा लगता है जैसे कि बहुत लाइट उसकी आँखों में पड़ रही हो। वो आँखें सिकोड़ता है। लेकिन रोशनी बढ़ती ही जा रही थी। वो आँख खोल देता है। वहाँ कुछ नहीं था। सिर्फ रूम का बल्ब जल रहा था लेकिन रोज की तरह। वो उठता है। अपने माथे पर पसीना महसूस करके उसे साफ करता है। फिर कमरे का ac ऑन करता है। फिर कुछ सोचता हुआ सा उठता है और कमरे का बल्ब बंद कर देता है। अब कमरे में बिल्कुल अंधेरा हो जाता है। 

वो धीरे धीरे कदम बढ़ाता हुआ वापस बेड पर आ जाता है। लेट कर अपनी आँखों को बंद कर लेता है। कुछ ही समय में वो नींद में चला जाता है। 

अचानक कमरे में ठंडक बढ़ने लगती है। वो सोते में ही ठंड से ठिठुरने लगता है। ठंड इतनी बढ़ने लगती है कि उसे सहन करना मुश्किल होता है। Ac में टेम्प्रेचर 18 तक आ जाता है। अब वो एक झटके से उठता है। ac का रिमोट उठाता है तो देखता है कि ac तो 25 पर है। अचानक उसका ठिठुरना बंद हो जाता है। गर्मी सी महसूस होती है। वो ac को 2 पॉइंट कम करता है और वापस आँख बंद कर लेट जाता है। 

"टन्न" अचानक से बड़ी जोर से आवाज़ होती है। जैसे कि ग्लास गिर गया हो। वो उठता है। अंधेरे की वजह से कुछ दिखाई नहीं देता। वो देखने की कोशिश करता है लेकिन कुछ नहीं देख पाता। कमरे में बिल्कुल शांति थी। वो बेड से उतर कर दरवाजे की तरफ बढ़ता है। जहाँ लाइट का स्विच है। वो अंदाज़ से एक जगह खड़ा होकर हाथ से टटोलने की कोशिश करता है दीवार पर लेकिन उसे स्विच नहीं मिलता। काफी देर तक वो इधर उधर हाथ चलाता है लेकिन उसे कोई स्विच नहीं मिलता। 

"उफ़्फ़ दरवाज़ा कहाँ गया।" कह कर वो दरवाज़ा ढूँढ़ने की कोशिश करता है। हाथ से टटोलता है कि कहीं दरवाज़ा मिल जाये लेकिन वहाँ सिर्फ दीवार थी। वो दूसरी तरफ ढूँढ़ने की कोशिश करता है लेकिन वहाँ भी दरवाज़ा नहीं था। वो हड़बड़ाने लगता है। दीवार पर हाथ सरकाता हुआ वो पूरे कमरे का चक्कर लगा लेता है लेकिन उसे दरवाज़ा नहीं मिलता। 

"उफ़्फ़, मोबाइल क्यों इस्तेमाल नहीं किया।" कह कर वो अंदाज़ से अपने बेड की तरफ़ बढ़ता है। लेकिन अब उसे बेड नहीं मिलता। वो परेशान होकर जल्दी जल्दी चलता है लेकिन उसे बेड नहीं मिल रहा। वो परेशान होता है। अचानक कमरा ठंडा होने लगता है। उसे सर्दी लगने लगती है। वो कमरे में धीरे धीरे चलता हुआ ठिठुरने लगता है। उसे कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। अब वो दीवार से पीछे हटता है और बीच में चलना शुरू कर देता है लेकिन वो चलता जा रहा है उसे बेड नहीं मिलता। वो ज़ोर ज़ोर से चलना शुरू करता है लेकिन कुछ फायदा नहीं।

"ये क्या हो रहा है?" वो घबराने लगता है। कौन है? अचानक उसे ऐसा लगता है कि वहाँ कोई और भी है। जैसे कोई उसके पास है। वो पूछता है फिर से। कौन है? जवाब दो। बोलते क्यों नही। उसे बिल्कुल साफ महसूस होता है कि कोई है उसके बिल्कुल सामने। वो हल्की सी झलक महसूस कर पा रहा था उस अंधेरे में। वो बार बार पूछता है। "कौन है? बोलो कौन है?" कोई जवाब नहीं मिलता। वो हाथ आगे बढ़ाता है। हाथ से छूकर देखने की कोशिश करता है। लेकिन कुछ कदम चलने के बाद भी उसे कुछ नहीं मिलता। वो आगे बढ़ता जाता है उस अंधेरे कमरे में। अचानक उसका हाथ किसी के हाथ से टकराता है। वो ज़ोर से चीखता है। और डर कर जमीन में आ गिरता है जैसे किसी ने उसे धक्का दिया हो। 

वो दीवार के सहारे टेक लगा कर खड़ा होता है। अचानक उसे कुछ महसूस होता है दीवार पर उसकी पीठ के पीछे। वो जल्दी से पलट कर बटन दबा देता है और कमरे में उजाला छा जाता है। 

वो डर से काँप रहा था। सामने देख रहा था। सामने आईना था। आईना बड़ा था तो वो खुद को सिर से पैर तक देख सकता था। थोड़ा आगे बढ़ा धीरे और आईने के करीब पहुँचा। उसने हाथ बढ़ाया। आईने में उसका अक्स भी हाथ बढ़ा रहा था। ऐसा लग रहा था कि दो अलग अलग लोग हाथ बढ़ा रहे हैं। वो डर से काँप भी रहा था लेकिन हाथ भी आगे बढ़ाता जा रहा था। अचानक उसका हाथ उस हाथ से टकराया। वो ज़ोर से काँपा। फिर रिलैक्स हो गया। उसका हाथ आईने की सतह पर जा लगा था। अपने ही अक्स को देख रहा था। फिर हँस गया। आईने का अक्स भी हँस दिया। वो वापस मुड़ा। लाइट बंद करने को उसने हाथ बढ़ाया लेकिन कुछ पल सोचते हुए हाथ वापस खींच लिया। 

उसने दरवाज़ा भी खोल दिया पूरी तरह। फिर बाहर धीरे से झाँका। बाहर सब नार्मल था। उसने गर्दन बाहर निकाल कर देखा। फिर वापस अंदर हुआ। दरवाज़ा खुला छोड़ दिया और लाइट बिना बंद किये वो बेड पर आ गया। फिर से लेट गया वो। आँखें कुछ ही पलों में बंद हो गईं।

अचानक कमरे में किसी की आवाज़ आने लगती है। ऐसा लगने लगता है कि कोई बात कर रहा है। बहुत धीमी आवाज़ जैसे कोई फुसफुसा रहा हो। अस्पष्ट आवाज़ थी। आवाज़ धीरे धीरे तेज़ होने लगती है। बहुत तेज़। अब ऐसा लगता है जैसे कोई चीख चीख कर बात कर रहा हो। 

उसकी नींद खुल जाती है लेकिन वो आँख नहीं खोलता। डर से काँपने लगता है। आवाज़ उसके पीछे से आ रही थी। वो करवट पलटने की हिम्मत नहीं करता। आवाज़ धीरे धीरे तेज़ हो रही थी। ये क्या? ये तो उसकी ही आवाज़ थी। वो ध्यान से सुनने की कोशिश करता है। वो खुद की ही आवाज़ सुन रहा था।  अपनी माँ से बात कर रहा था। वो ही बातें जो सोने से पहले उसने की थी। वो बातें फिर से हो रही थी। ऐसा लग रहा था जैसे समय फिर से चलने लगा उसी जगह से। वो डरने लगता है। आवाज़ तेज़ होती जाती हैं। अब आवाज़ें उसके करीब आती जाती हैं। बहुत करीब आ जाती हैं। अब ऐसा लगता है कि जैसे कोई उसके कानों के पास आकर बोल रहा है। वो अपनी आँखें कस कर बंद कर लेता है जैसे कि खोल कर देखना ही नहीं चाहता। आवाज़ें बढ़ती जाती हैं। वो दोनों हाथों से अपने कान बंद करता है लेकिन आवाज़ें तेज़ होती जाती हैं। वो परेशान हो उठता है। अचानक से आँखें खोल देता है। वहाँ कुछ नहीं था। बिल्कुल शांति थी। कहीं कोई आवाज़ नहीं थी। 

वो तेज़ तेज़ साँसें ले रहा था। पसीना उसके पूरे चेहरे पर था। काँप रहा था डर से। अचानक उसकी नज़र सामने टेबल पर रखी पानी की बॉटल पर पड़ती है। उसमें पानी भरा देख कर उसे प्यास महसूस होती है। वो ग्लास उठाता है और बॉटल उठाता है। बॉटल से ग्लास में पानी डालता है तो देखता है कि बॉटल तो खाली है। 

वो चौंकता है। बॉटल तो भर के लाया था। सिर्फ़ एक ग्लास पानी ही तो पिया था उसने सोने से पहले। वो सोचता है। बॉटल देखता है फिर से तो देखता रह जाता है। पहले जैसे खो जाता है। देखता रहता है। अचानक से बहुत जोर से ग्लास गिरने की आवाज़ होती है। वो आवाज़ से डर जाता है। देखता है कि ग्लास बेड से बहुत दूर गिरा हुआ था। ग्लास आईने के करीब गिरा पड़ा था। चौंक जाता है वो। उठता है डरते हुए। धीरे धीरे वो ग्लास के पास पहुँचता है। आईने के सामने था तो आईने में उसका डरा हुआ अक्स दिखाई दे रहा था। वो नीचे झुकता है ग्लास उठाने को। अचानक उसे किसी की हँसी की आवाज़ आती है पीछे से। वो डर के मारे वहीं गिर जाता है। पीछे पलटता है तो वहाँ कोई नहीं था। 

वो डरता है। अचानक उसे सामने दीवार पर कोई परछाई बाहर जाती हुई महसूस होती है। वो बहुत डरने लगता है। लेकिन उसको देखते हुए बाहर निकलता है बैडरूम से। जैसे ही बाहर निकलता है तो बेडरूम का दरवाजा बहुत जोर से बंद होता है। धड़ाम की आवाज़ होती है जैसे किसी ने दरवाज़ा गुस्से में बंद किया हो। वो डर जाता है। सामने उस परछाई को देखता है। अचानक उसे महसूस होता है कि ये तो उसी की परछाई है। वो हाथ हिलाकर फिर पैर हिलाकर फिर गर्दन हिलाकर देखता है। लेकिन ये उस की ही परछाई थी। वो सुकून भरी साँस लेता है। 

तभी कुत्तों के भौंकने और रोने की आवाज़ आती है। पहले एक कुत्ते की होती है। फिर बहुत सारे कुत्तों की आवाज़ें आने लगती हैं। वो अपने कमरे की तरफ जा रहा होता है लेकिन तभी पलटता है। और बालकनी का दरवाजा खोल कर बाहर जाता है। बालकनी से नीचे झाँक कर देखता है तो रात का अंधेरा था। लेकिन पूरे एरिया के कुत्ते लगातार भौंक रहे थे और रो भी रहे थे। वो दूर तक देखने की कोशिश करता है लेकिन उसे कोई दिखाई नहीं देता। वो गुस्से वाला फेस बनाकर अंदर आता है और दरवाज़ा बंद कर देता है। वापस अपने कमरे में जाने के लिए मुड़ता है। अचानक उसे ऐसा लगता है जैसे कि बाहर के रूम में मैन डोर कोई खोलने की कोशिश कर रहा है। वो उस कमरे की तरफ बढ़ता है। 

बाहर वाले रूम आकर मेन डोर देखता है तो उसे दिखाई देता है कि लॉक हिल रहा है जैसे कोई हिला रहा हो या चाभी घुमा कर खोलने की कोशिश कर रहा हो। वो धीरे से पूछता है, "कौन है? कौन है वहाँ?"

उसे कोई जवाब नहीं मिलता। वो डरता है और कुछ सोचता है। अचानक वो दरवाज़ा खोल देता है। वो सामने देख कर जड़ होकर रह जाता है। 

सामने खुद को देखता है ऑफिस से वापस आया हुआ। जो दरवाज़ा खोलने की कोशिश कर रहा था। अचानक वो डर से पीछे हटता है। तो ऑफिस से  आया हुआ वो अंदर आता है। और दरवाज़ा बंद कर देता है। 

सामने टेबल पर उसने जल्दी से बैग रखा और दूसरे रूम की तरफ भागा। दूसरे रूम में जाकर सीधे एक दरवाजा खोला और अंदर चला गया। वो बाथरूम था। अब वो बाथरूम के अंदर था और उसकी सुकून में डूबी आह की आवाज़ आई जैसे कि कितनी देर से प्रेशर होल्ड करके रखा था उसने।

कुछ देर में वो बाहर आया। सामने वॉल पर टॉविल टंगी थी जिससे उसने अपने गीले हाथ साफ किये और वापस पहले रूम में आकर सोफे पर बैठ गया।

खुद को फिर से देखते हुए अचानक वो बहुत ज़्यादा डर जाता है और अंदर वाले कमरे में भागता है। अंदर कमरे में भाग कर दरवाज़ा बंद कर लेता है। और जल्दी से बेड में लेट जाता है और ब्लेंकेट ओढ़ लेता है जिससे उसे कोई देख न पाए। बेहद खौफ़ में वो कुछ समझ ही नहीं पाता। अचानक वो मोबाइल उठाता है तो उसमें टाइम देखता है। 2 बज रहे थे। वो फ़ोन रख देता है। अचानक फिर से फोन उठाया और देखा कि 2 बज रहे थे। ऐसा कैसे हो सकता है। 2 तो बहुत पहले बजे थे। वो बहुत डर जाता है और भगवान का नाम लेना शुरू कर देता है। पीछे हवा की आवाज़ें बढ़ने लगती हैं। कमरा फिर से ठंडा होने लगता है। वो ज़ोर ज़ोर से नाम लेने लगता है। और धीरे धीरे उसकी आँखें बंद होने लगती हैं। 

अचानक उसकी नींद खुलती है। लेकिन वो आँखें नहीं खोलता। ऐसे लगता है उसे जैसे कि उसके बिस्तर में कोई है। वो चौंक जाता है। एक आँख खोल कर देखता है तो बाहर अंधेरा था लेकिन उसे साँस अपनी पीठ पर महसूस हो रही थी। साँसों की आवाज़ें भी आ रहीं थीं। साफ सुन पा रहा था। अचानक से टेबल पर से पानी की बॉटल गिरने की आवाज़ आती है। आवाज़ से वो डरता है लेकिन आँख नहीं खोलता। कुछ देर शांति रहती है। लेकिन फिर ग्लास ज़ोर से गिरने की आवाज़ आती है। जैसे किसी ने उठा कर फेंका हो। फिर कुछ देर शांति रहती है। 

अचानक उसे अपने पीछे से कुछ आवाज़ आती है। साथ में साँसें भी उसे महसूस होती हैं। कमरे का टेम्परेचर अब अचानक घटने और बढ़ने लगता है खुद से ही। वो डरते डरते धीरे धीरे भगवान का नाम लेना शुरू कर देता है। लेकिन अचानक से महसूस होता है कि पीछे वो खुद ही बात कर रहा है। 

"क्या कहा? भूत! हाहाहाहा। कितनी बार कहा है कि भूत वूत जैसी कोई चीज नहीं होती। सिर्फ हमारा वहम होता है ये। अनपढ़ लोगों ने अपने वहम को भूत का नाम दे दिया है। तुम तो इतनी पढ़ी लिखी हो तुम ऐसी बात कर रही हो।"

"अगर कोई भूत मिले तो मेरे पास भेज देना। बेचारा मुझसे डर कर भाग जाएगा।"

"अगर कोई भूत मिले तो मेरे पास भेज देना। बेचारा मुझसे डर कर भाग जाएगा।"

"अगर कोई भूत मिले तो मेरे पास भेज देना। बेचारा मुझसे डर कर भाग जाएगा।" ये लाइन बार बार रिपीट होने लगती है। वो अब बेहद घबराने लगता है। हिम्मत करके भगवान का नाम लेते हुए पीछे पलटता है तो जड़ हो जाता है। उसकी आँखें खौफ़ में खुली की खुली रह जाती हैं। चेहरा पसीना पसीना हो जाता है। आवाज़ निकलना बंद हो जाती है।

सामने वो खुद ही लेटा हुआ है। ऑफिस के कपड़े पहने खुद को ही देख रहा है। इसके चेहरे पर खौफ़ है लेकिन दूसरे चेहरे पर कुटिल मुस्कान। उसकी मुस्कान बड़ी होती जाती है। इसका डर बढ़ता जाता है। चीखना चाहता है लेकिन आवाज़ नहीं निकलती। अचानक वो इसका गला पकड़ लेता है। और गला दबाने लगता है। ये छटपटाने लगता है। छूटने की कोशिश करने लगता है। बिस्तर पर पड़ा हुआ मोबाइल नीचे गिर जाता है। उसका पैर टेबल पर लगता है तो बॉटल भी नीचे गिर जाती है और टेबल पलट जाती है। 

वो छूटने की पूरी कोशिश कर रहा है लेकिन उसकी पकड़ बहुत ज़्यादा है। उसकी साँसें अब थमने लगी हैं। शरीर शिथिल पड़ने लगा है। धीरे धीरे उसकी आँखें बंद हो रहीं हैं। अंधेरा छाने लगा है। अब उसमें ताक़त नाममात्र की बची है। वो फिर से पूरी ताकत लगा कर खुद को छुड़ाने की कोशिश कर रहा है। आँखें बंद होते होते एक बार फिर कोशिश करता है और आँखें खोल देता है। 

सामने कोई नहीं है। कमरे में उजाला है सुबह का। वो लंबी साँस लेता है और उठ जाता है। अचानक उठ कर देखता है कि सुबह हो चुकी है। उसका मोबाइल उसके बगल में ही था। टाइम देखता है तो 8 बज रहे थे। वो सुकून की साँस लेता है और खुद से ही कहता है, "उफ़्फ़ कितना डरावना सपना था।"

उठ कर तैयार होने जाता है। तैयार होकर अपना लैपटॉप बैग उठाता है और बाहर निकलता है फ्लैट से। थोड़ा नीचे उतरा था सीढ़ियों से अचानक उसे कुछ याद आता है। अपनी जेबें चेक करने के बाद लैपटॉप बैग चेक करता है। फिर कहता है, "मोबाइल अंदर ही रह गया शायद।" वापस ऊपर चढ़ता है। अपनी चाभी लॉक में डालता है लेकिन लॉक फिर से जाम हो जाता है। फिर से लॉक हिलाता है। फिर थक कर सोचने लगे जाता है। अचानक लॉक खुद से खुल जाता है। फिर दरवाज़ा भी खुद से खुल जाता है। 

ये देखते ही वो चीखता हुआ नीचे भागता है। सीढ़ियों पर गिरता हुआ दीवारों पर टकराता हुआ चीख रहा होता है। वहीं उसके फ्लैट का दरवाजा पूरा खुल कर फिर बंद हो जाता है। अंदर मोबाइल बेड से नीचे गिरा हुआ था। टेबल और बॉटल भी नीचे गिरी हुई थी। ग्लास आईने के पास पड़ा था। और आईने में उसका अक्स खड़ा हुआ दिख रहा था। 

The End

रविवार, 1 मार्च 2020

देखो न

ये ठंडी ठंडी आग पड़ी है, देखो न
जाने किसकी राख पड़ी है, देखो न

जाने किसने क़लम किये लोगों के सर
जाने किसने चला दिये दिल पर खंजर
जाने किसने आग लगाई गुलशन में
जाने किसने जला दिए लोगों के घर
शहर गाँव बस्ती आग लगी है, देखो न
जाने किसकी ख़ाक पड़ी है, देखो न

हाकिम जी से कह दो थोड़ा रहम करें
अगर बची हो आँखों में तो शरम करें
ज़ख्म लगाना यूँ तो मुश्किल भी नहीं
बातें करना छोड़ अब कुछ करम करें
खामोशी में कोई बात दबी है, देखो न
जाने किसकी राख पड़ी है, देखो न

हमने तुमको हरदम ही अपना माना
हम सब से है मुल्क का ताना बाना
शांति अहिंसा साथ हमको जीना है
भाई भाई हैं हमको साथ ही रहना है
रिश्तों में जो गांठ पड़ी है, देखो न
जाने किसकी ख़ाक पड़ी है, देखो न

देखो कि अब कोई घर न जल पाये
नफ़रत की ये दाल कहीं न गल पाये
लाशों के इस ढेर में सब तो अपने हैं
भाई, बेटा, माँ, बहन कहीं मिल जाये
मुल्क़ की यहाँ लाश दबी है, देखो न
जाने किसकी ख़ाक पड़ी है, देखो न

ये ठंडी ठंडी आग पड़ी है, देखो न
जाने किसकी ख़ाक पड़ी है, देखो न






सोमवार, 24 फ़रवरी 2020

मेरा वतन वापस कर दो

मुझको चैन ओ अमन वापस कर दो
मुझको गंग ओ चमन वापस कर दो
जहाँ रहते थे साथ हम सारे मिल के
मुझको मेरा वो वतन वापस कर दो

मुझको नहीं अरमान किसी जन्नत का
मुझको चाहिए मुल्क़ मेरा मुहब्बत का
करता हूँ दुआ और यही फरियाद रहे
मैं रहूँ न रहूँ मुल्क़ ये मेरा आबाद रहे
गज़लें महकें और गीत मुस्कुराए जहाँ
वो महफ़िल ओ सुखन वापस कर दो
मुझको मेरा वो वतन वापस कर दो

मंदिर में भजन मस्ज़िद में अज़ान रहे
जहाँ कान्हा के इश्क़ में रसखान रहे
जहाँ गाँधी ने अहिंसा हमें सिखाई थी
जहाँ भगत सुभाष ने क्रांति लाई थी
इंक़लाब को जिसने ज़िंदाबाद किया
शहीदों को वो नमन वापस कर दो
मुझको मेरा वो वतन वापस कर दो





गुरुवार, 2 जनवरी 2020

बदल दो दुनिया

ऐसी है दुनिया और 
वैसी है दुनिया
हम से सुनो 
कैसी कैसी है दुनिया
कॉफी के प्याले में 
नमक का है घोल
दुनिया को किसी का 
नहीं कोई मोल
दुनिया की तारीफ 
हरगिज़ न करना
दुनिया के लिए 
क्या जीना क्या मरना
झूठी बातें ही तो 
सुनाये ये दुनिया
हम तो कहें 
भाड़ में जाये ये दुनिया

बदल दो ये दुनिया
ये बेमतलब की दुनिया
वहशी फरेबी और
आरामतलब की दुनिया

इसमें मसर्रत का नहीं
कोई ठिकाना
अक्स दुनिया का हो
चुका है पुराना
इस दुनिया पर कोई
यकीं भी न करना
इस दुनिया का भरोसा
कहीं भी न करना
जब मौका मिलेगा
तो लूटेगी दुनिया
अपनी ही गलती से
ये टूटेगी दुनिया
दुनिया में कुछ भी
मुनासिब नहीं है
कुछ भी किसी के
जानिब नहीं है
अपने ही मतलब से 
पूछेगी दुनिया
मतलब के बाद ये
थूकेगी दुनिया
दुनिया में पैसा ही
एक मज़हब
दुनिया पहले सी 
लगती नहीं अब
इसको फ़रागत नहीं
नफ़रतों से
मुहब्बत है दुनिया को
बस तुर्बतों से
धर्मों पर अक्सर ही
लड़ती है दुनिया
झूठ कह कह कर
अकड़ती है दुनिया
दुनिया ने भगवान 
तो लाखों बनाये
दुनिया ही दुनिया
में भगवान कहलाये
झूठी बातों में अक्सर
लुभाती है दुनिया
सच्चाई से भी
मुँह चुराती है दुनिया
दुनियावालों की दुनिया
में बड़ी है खराबी
किसी की कदर इसको
नहीं है ज़रा भी
देती थी जन्नत की तासीर
कभी जो
हुई है जहन्नुम की कोई
तस्वीर वो
प्यार मुहब्बत से दुनिया
करती है नफरत
लहू बहाने की लग गयी
इसको आदत
इसको बदलना अब 
मुमकिन नहीं है
इसमें सुकूँ वाला
कोई दिन नहीं है
इंसानों से इसका 
नहीं वास्ता कोई
शैतानों से इसका 
हुआ राब्ता कोई
लाशों पर अपनी है
रोटी पकाती
शैतानों के साथ 
मिल बाँट है खाती
वैसे तो मीठी सी 
दिखती है दुनिया
लेकिन ज़हर सी 
तीखी है दुनिया
इसमें हुक़ूमत के पास
ताकत
लहू बहाना ही जिसकी है
आदत
आपस में जबसे ये
लड़ने लगी है
दुनिया बहुत ज़्यादा 
सड़ने लगी है
फालतू के अक्सर
तमाशे दिखाये
ऐसी दुनिया तो न हमें
रास आये
बेहतर है कि अब तो 
मिट जाये ये दुनिया
लहूलुहान ही बस
नज़र आये ये दुनिया
ए दुनिया ओ दुनिया
तुझे याद करेंगे
तुझसा न कोई हो ये
फरियाद करेंगे
चली जा अब नज़रों से 
तू दूर दुनिया
आज़ाद हैं हम
तू मजबूर दुनिया

बदल दो ये दुनिया
ये बेमतलब की दुनिया
वहशी फरेबी और
आराम तलब की दुनिया