शनिवार, 30 सितंबर 2017

हाल ए दिल

कैसा हाल ए दिल हुआ
कहना भी मुश्किल हुआ
लफ़्ज़ों से है अब दूरी
मुहब्बत का हाँसिल हुआ

तुझको सोचूँ चाहूँ मैं
लेकिन न कह पाऊँ मैं
ये जुदाई की अगन है
तुझ बिन न रह पाऊँ मैं
ख्याल हज़ारों तेरे संग
आज रंगी मैं तेरे रंग
तू जैसे डोर मेरी है
मैं बनी तेरी पतंग
क्या क्या करूँ मैं
कैसे अब रहूँ मैं
कैसा हाल ए दिल हुआ
कहना भी मुश्किल हुआ

पल पल दिल बैचेन रहे
कुछ कहे कभी चुप रहे
लाखों जतन करती मैं
तुझमें जीती मरती मैं
लम्हा लम्हा ज़िन्दगी तू
तू है खुदा और बंदगी तू
इक दिन तुझमें खो जाऊँ
मैं तो बस तेरी हो जाऊँ
तुझको मांगा रब से मैंने
वक़्त वही क़बूल हुआ
कैसा हाल ए दिल हुआ
कहना भी मुश्किल हुआ

शुक्रवार, 22 सितंबर 2017

मृत्यु आलिंगन

जीवन का आधार
आत्मा का है सार
हमेशा आसपास है
मृत्यु का आभास है
मृत्यु सम्पूर्ण है

जीवन की उत्पत्ति से
प्रेम भाव और भक्ति से
काल्पनिक भय से
या अंतर्मन की शक्ति से
इसका अटूट बंधन है
ये मृत्यु का आलिंगन है
मृत्यु सम्पूर्ण है

अनसुलझा प्रश्न है
क्या होती है मृत्यु
देह का मिटना
साँस का रुकना
हृदय का थमना
स्मृति खत्म होना
या दृश्यता समाप्त होना
अकल्पनीय एहसास है
जिसके बाद
कुछ नहीं होता
कोई नहीं हँसता
कोई नहीं रोता
मृत्यु सम्पूर्ण है

आज आभासी है
मुझको मेरी मृत्यु
आज प्रश्न सुलझाऊँगा
मृत्यु के भेद दिखाऊँगा
घनघोर स्मृति के जंगल में
आज विचर रहा हूँ मैं
मृत्यु के आभास से
सज संवर रहा हूँ मैं

थोड़ी सी घबराहट भी है
जैसे पिय से प्रथम मिलन हो
आत्मा नग्न होने को आतुर
इस ज़िस्म रूपी कपड़े से
अवरूद्ध आज मेरा मन हो
क्या होगा जब मृत्यु
मुझको आलिंगन में भरेगी
क्या होगी अनुभूति वो
जो हृदय बिन बहेगी
क्या उत्तेजना का
आभास कर पाउँगा
अथवा मृत्यु पिय के अधरों
पर बिछ जाऊँगा

ओह्ह
पिय मिलन का समय हुआ
अब अनुमति दे दो मुझको
रोकना भी चाहूँ तो
रोक सकूँगा न खुद को
हृदय स्पन्दन मंद हो रहा
स्मृति में अंतर्द्वंद हो रहा
समाप्त हो रही स्मृति
जैसे रीत रहा हो गागर
प्यास मिलन की बढ़ती जाये
जैसे निकट आता जाये सागर
आँखों के सामने जो दृश्य हैं
अब धुंधले से हो रहे हैं
जाने क्यों लोग आसपास
खड़े खड़े रो रहे हैं
अब सुन नही रहा हूँ मैं कुछ
इक खामोशी चारों ओर है
रोशनी अब नहीं कोई
अंधकार का न कोई छोर है
अब मेरा आभास भी
मिटने लगा है
दृश्य समाप्त
ध्वनि समाप्त
हृदय स्पन्दन और
स्मृति समाप्त
शांति की अनुभूति है
जो मिटने लगी है अब
अब साथ छोड़ रहे
अभ्यास अनुभूति सब
अब बस बात खत्म करूँ
कुछ न कह पाउँगा
दिख नहीं रहा कुछ भी
कुछ नहीं समझ पा रहा
शायद मुक्त हुआ हूँ अब
जीवन मरण के बंधन से
इक नई शुरुआत हुई है
मृत्यु के आलिंगन से
सब कुछ छूट गया है पीछे
न कुछ ऊपर न कुछ नीचे
अब न कुछ आसपास है
मेरा मुझको न आभास है
आज समझ सका हूँ
खुद से अब न दूरी है
मृत्यु बहुत जरूरी है
मृत्यु बहुत जरूरी है
अब मैं नहीं हूँ कहीं
अब जो है वो बस...............

बुधवार, 13 सितंबर 2017

कुछ ख्याल

दर्द का पानी गहरा नीला
और इश्क़ का रंग सुनहरा
ज़माने की मुश्क़िलात हैं
इश्क़ बड़ी दूर की बात है

चेहरों पर चेहरे हैं सजते
वाह वाह क्या नक्काशी है
दुनियादारी के इस खेल में
इश्क़ ही तो काबा काशी है

राहों पर नज़र और बेखबर
हालात ख़िलाफ़ रहगुज़र
इश्क़ की राह में आजकल
लोग कभी इधर कभी उधर

चलना इश्क़ राह संभलकर
क़दम क़दम पर ख़तरा है
दोतरफ़ा तलवार है दुनिया
जिससे अपना झगड़ा है

ज़िन्दगी से अब नाराज़गी
मौत ही दूर करवायेगी
जिसकी बाहों में सोकर के
मेरी रूह सुकून पायेगी

जीवन दर्शन

मानव जीवन बस क्षण भंगुर
सब पाने को क्यों इतना आतुर
बस अंतर्मन की व्याकुलता है
सब माया की चंचलता है

जीवन राह पथिक हैं हम सब
बस्ती दरिया पार है करना
अपने प्रीतम से मिलने को
कई बरसों तक हमको चलना
ये सारी बाधायें मिल कर
जीवन दर्शन समझायेंगी
बैरी दुनिया से लड़ लड़ कर
अपना प्रीतम हमको मिलता है
बस अंतर्मन की व्याकुलता है
सब माया की चंचलता है

कुछ लोग हैं बैठे धूनी रमाये
मोह के धागे मन आप बंधाये
जीवन मरण है किसके हाथ
फिर किससे घृणा कैसी बात
अर्पण तर्पण कर क्या होगा
प्रभु के दर्शन कर क्या होगा
जीवन पथ की प्रेम गली में
हृदय पुष्प बनकर खिलता है
बस अंतर्मन की व्याकुलता है
सब माया की चंचलता है

झूठ हत्यारा है

झूठ तो इक हत्यारा है
जिसने सच को मारा है
ये नेताओं की बेशर्मी से
सच अक्सर ही हारा है

संसद को वो कहते हैं
अपना मंदिर पावन सा
अपनी हरकतों से बनाते
बड़ी गंदी बिछावन सा
कैसा राज है कैसी नीति
जब सत्ता सुख प्यारा है
ये नेताओं की बेशर्मी से
सच अक्सर ही हारा है

राजनीति में धर्म मिलायें
धर्म में राजनीति चलायें
नीचता की हद पार करते
दंगा करा के जीत जायें
मानवता की लाशों पर ही
पड़ा अब ईमान हमारा है
ये नेताओं की बेशर्मी से
सच अक्सर ही हारा है

लोकतंत्र की हत्या होती
अब सत्ता के गलियारों में
ईमानदारी भी दफन करी
नेताओं ने अब चौबारों में
शर्म आने लगी है हमको
कि नेता बेशर्म हमारा है
ये नेताओं की बेशर्मी से
सच अक्सर ही हारा है

नहीं

ज़ख्म हैं ये कोई अधखुली क़िताब नहीं
दर्द भी तो है हमें लेकिन बेहिसाब नहीं

यूँ भी नहीं आसां कि जी लिया जाये
ज़िन्दगी है ये कोई पुरानी शराब नहीं

कहाँ मुमकिन कि ठोकरों से भी न टूटें
इतने भी मजबूत तो मेरे ये ख्वाब नहीं

ज़माना भी हमसे नाराज़ सा दिख रहा
हम अच्छे नही तो इतने भी खराब नहीं

कभी शमा कभी जुगनू रात की रवानी हैं
चिराग़ के मुक़ाबिल कुछ आफताब नहीं

प्यार आज कल

पहले शहर में नौकरी और मकान किया जाये
हो सके तो इश्क़ इसी दरमयान किया जाये

मुहब्बत बड़ी महँगी है आज कल के दौर में
यूँ ही आज़मा कर क्यों नुकसान किया जाये

बटुए में नहीं अब कार्डों में वजन दिखता है
कमा कर कार्ड खुद का सम्मान किया जाये

मेरी बच्चे सी तनखा उनके खर्चे शाही जैसे
डबल शिफ्ट से पूरा हर अरमान किया जाये

दौर गुज़र गये खुद को खतों में लिखने के
अब इंटरनेट पर ही दर्द बखान किया जाये

उनको जान कहना तो अब पुरानी बात हुई
अंग्रेजी में न कहो तो अपमान किया जाये

बैंकों की देनदारियाँ और किश्तों में प्यार
और कैसे ज़िन्दगी को हलाकान किया जाये

आजकल

ज़िन्दगी बहर सी लड़खड़ा रही है आजकल
रूह भी ज़िस्म में फड़फड़ा रही है आजकल

धड़कन भी अब तो रिहाई को मचल उठी है
शायद दिल में वो भी घबरा रही है आजकल

कोई हसीन ख्वाब भी अब मुझे आता नहीं है
आँख भी जाने क्या बड़बड़ा रही है आजकल

ये काली रात अब तो और भी डराने लगी है
बिजली बादल संग कड़कड़ा रही है आजकल

काफ़िले की मंज़िल कहीं ठिकाना कहीं और है
राह भी दीवानी हो धूल उड़ा रही है आजकल

वो गली जहाँ से आशिक़ों के जनाजे निकले
खुशबू-ए-मुहब्बत बिखरा रही है आजकल

इतना भी आसां नहीं मुहब्बत का मिटना
मौत महज़ ज़िस्म अकड़ा रही है आजकल

हुज़ूर

चालें सजा कर शतरंज की यूँ
चौसर का पासा फैंकते हैं हुज़ूर

सारे मोहरे आपस में लड़ा कर
आराम से तमाशा देखते हैं हुज़ूर

भूख उनकी कहाँ मिटा करती है
लाशों पर रोटियाँ सेकते हैं हुज़ूर

सवाल पूछना जैसे गुनाह हुआ
सरकारी फ़रमान भेजते हैं हुज़ूर

उनके लिए मुश्किल है दूर रहना
कुर्सी पाने को ईमान बेचते हैं हुज़ूर

शुक्रवार, 1 सितंबर 2017

अच्छे दिन

बढ़ती जाये है महंगाई
भैया अब तो शामत आई
अब जीना हुआ मुश्किल
कहाँ हैं अच्छे दिन
कहाँ हैं अच्छे दिन
कहाँ हैं अच्छे दिन कहाँ हैं अच्छे दिन

आज की हालत क्या कहें
न दवा और न खाना मिलता
जो भी हम कमा के लायें
टैक्स बनजेब से निकलता
बच्चों की पढ़ाई भी ऐसी
महँगाई की परिभाषा जैसी
गैस भी महँगी तेल भी महँगा
रेल वाला खेल भी महँगा
मंत्री जी से विनती करें तो
हमको तो दिखाएं वो ठेंगा
ऐसी हालत में है देश
और खतरे में है दिल
कहाँ हैं अच्छे दिन
कहाँ हैं अच्छे दिन
कहाँ हैं अच्छे दिन कहाँ हैं अच्छे दिन

नोटबंदी करके देखो
कालाधन सफेद बनाया
विदेश जाकर साहब ने
मुल्क़ का मजाक उड़ाया
खुलने लगी है जब से पोल
बजाने लगे गये वो तो ढोल
गाय बच गयी लोग मर गये
गुंडे जब से कुर्सी चढ़ गए
खाना पीना अब इनकी मरज़ी
हगना धोना कहें जब सर जी
जी एस टी लगाई हम पर
बढ़ा दिए सब बिल
कहाँ हैं अच्छे दिन
कहाँ हैं अच्छे दिन
कहाँ हैं अच्छे दिन कहाँ हैं अच्छे दिन

हिंदुस्तान

ये शहर इंसानों की बस्ती है
यहाँ ज़िन्दगी बेहद सस्ती है

चंद सिक्कों में बिका करती है
कभी भूखी ही मरा करती है

यहाँ जो उपलब्ध भीड़ तंत्र है
वो क़त्ल करने का षडयंत्र है

राजनीति के हाथ की गोटी है
नेताओं की नीयत बस खोटी है

ये जो सामने पड़ा है निष्प्राण सा
कुछ देर पहले था जो इंसान सा

अभी भीड़ के हत्थे चढ़ गया
कुछ देर में ही ये तो मर गया

ये अभी आया था ईद मनाने को
अपने बच्चों के लिए कुछ लाने को

भीड़ ने मज़हब के नाम पर मारा है
जाने किस बात का गुस्सा उतारा है

आजकल मुल्क में यही हालात है
लोगों का मुद्दा बस मज़हब की बात है

ये भीड़ जो मज़हब जात ढूंढती है
इंसानों की अब औकात ढूंढती है

क़त्ल करने में तो माहिर हो गयी है
नेताओं की मंशा जाहिर हो गयी है

इंसान होना अब इंसान नही होता
दूसरे इंसान में तो प्राण नहीं होता

जिसका दिल करे उसको मारिये
नफ़रत को अब खून से संवारिये

खून है जो अब थैलियों में बिकता है
बस अब ज़िंदा लोगों में न दिखता है

आपके अंदर तो बस पानी भरा है
जो भी यहाँ भीड़ बन कर खड़ा है

चलो कि आज भीड़ को तौला जाये
इनके नेता को कुछ तो बोला जाये

मैं इनकार करता हूँ आज झुकने से
मुझको डर नही कोई अब मरने से

मैं खून ए हिंदुस्तान हूँ चुप नहीं रहूँगा
अन्याय न कभी सहा है न कभी सहूँगा

ये जो हाथ मे तुमने तिरंगा थामा है
ये इस मुल्क की एकता का नामा है

तुम खुद ही तिरंगे को नहीं पहचानते
हथियार समझ कर लोगों को मारते

चलो कि आज मैं आ गया हूँ सामने
आपके खंजर अपने दिल पर थामने

तुम जो मेरे मुल्क में आतंक फैलाते हो
जाने किस मुँह से वंदे मातरम गाते हो

बेशर्म हो अपनी गलती मानते भी नहीं
अपने ही वतन को पहचानते भी नहीं

ये मुल्क जो लोगों के दिलों में बसता है
तुम्हारा खंजर उनके दिल मे उतरता है

मैं आज बतला रहा हूँ तुमको ये बात
जरा गौर से सुनना रख दिल पे हाथ

ये जो तुम ऐसे मारते हो किसी इंसान को
गौर से देखो तुम मार रहे हिंदुस्तान को

अगर हो जरा सी शर्म तो आगे आओ
अपना खंजर आज मेरे दिल पे चलाओ

मैं इश्क़ हूँ नफरत को मिटा जाऊँगा
क़त्ल हो होकर भी मैं मर नहीं पाउँगा

इश्क़ ही तो हिंदुस्तान का आधार है
इसके बिना सब कुछ अत्याचार है

नफरतों को जीतना है तो दिल मे आइये
इश्क़ रखिये साथ में और मुस्कुराइये

भीड़ बन कर बस अपने हक़ के लिए लड़ो
ये राजनीति के चक्कर में ऐसे तो न पड़ो

राजनीति ने आज मुल्क को बर्बाद किया
लूट कर गरीब को तिजोरी को आबाद किया

उम्मीद है कि फिर कोई भगत सिंह आएगा
फिर से रंग दे बसंती मुल्क में वो गायेगा

समझायेगा तुमको हिंदुस्तान की अवधारणा
उसको दुश्मन समझ कर तुम उसे न मारना

आज मुल्क की जरूरत स्कूल अस्पताल है
जरा देख लो गरीब कितना आज बेहाल है

बच्चे हैं मरते अस्पताल में गैस के अभाव में
आपस में लोग लड़ रहे हैं धर्म और गाय में

मंदिर नहीं मस्ज़िद नहीं सोच लो क्या चाहिये
जाति धर्म पर लड़ना है या आज़ाद हवा चाहिये

कहीं जुनैद मर रहे हैं कहीं पंडित मारे जा रहे
किस बात का जश्न आज हम लोग मना रहे

आज मरा कोई गैर कल तुम्हारा नंबर आएगा
आग में घिरा हुआ आखिर कब तक बच पायेगा

तालिबानी सोच है जो वो दुश्मन है विकास की
सोच लो तुम क्या तुम्हें जरूरत है विनाश की

बेहतर है आज फ़िर हम लड़े एक होने के लिये
वरना कल कोई न बचेगा हम पर रोने के लिये

हम अगर शरीर हैं तो ये मुल्क हमारी जान है
चाहे कोई भी जाति है या हिन्दू मुसलमान है

एक ही हैं हम सभी और एक ही पहचान है
मैं भी हिंदुस्तान हूँ और तू भी हिंदुस्तान है

मेरे बाद

मैं आज हूँ मैं कल न रहूँ
मैं याद बनकर बहता रहूँ
क्या रह जायेगा बाद मेरे
क्या रह जायेगा बाद मेरे

चंद किताबें पुरानी सी
और कुछ पुराने से नगमे
उनको तुम पढ़ लेना कभी
देखोगे फिर ये ज़िन्दगी
जो इतनी मुश्किल होती है
बात बात पर ये तो रोती है
लोग ज़िन्दगी कैसे जीते हैं
और कैसे हँसते रहते हैं
मैं आज हूँ मैं कल न रहूँ
बस याद बनकर बहता रहूँ

उम्मीदों के आसमान का
जो रंग गुलाबी लगा मुझे
फूलों के साये में छुपकर
कोई कांटा सा चुभा मुझे
ज़ख्मों ने चूमा मुझको भी
और दर्द ने लगाया गले
जो बातें हों कर लो आज
क्या पता कल हम न मिलें
मैं आज हूँ मैं कल न रहूँ
बस याद बनकर बहता रहूँ

जो मुहब्बत की कहानी थी
ज़माने को आज़मानी थी
वफ़ा के तराजू पर दिल रखा
जुदाई का ज़हर भी हमने चखा
चलो कि अब तुमसे मिलूँगा मैं
इन आसमानों के पार कहीं पर
रह जानी है तुम्हारे साथ में
मेरी ये सारी यादें यहीं पर
मैं आज हूँ मैं कल न रहूँ
बस याद बनकर बहता रहूँ