शनिवार, 3 दिसंबर 2016

फ़ासला

फासलों के शहर में ज़रा हिफाज़त रखना
अपने हाथ में दुनिया की क़यामत रखना

दुरंगे चेहरों से अच्छा है बचकर निकलना
मतलबी लोगों से दूर की ही आदत रखना

वैसे ज़माने के दस्तूर भी निराले लगते हैं
कभी ख़फ़ा होना कभी शिकायत रखना

अंदाज़े बयाँ लोगों के अजब अजब से हैं
जो अपने हैं उनसे तमाम अदावत रखना

सच और झूठ का फैसला खुदा पर छोड़
बेहतर है हमारा आँखों में शरारत रखना

हमारा क्या है बेहद सादे ख्वाब हैं अपने
उस एक के लिए संभाल मुहब्बत रखना

नोटबंदी

लोग मुल्क के दिख रहे हैं आजकल कतारों में
देश भी तो चल रहा यूँ अब खातों में उधारों में

जिसको समझते थे अपने हाथ का मैल कभी
अब तड़प रहे हैं ये लोग उसके ही विचारों में

ये हुक्म ए निज़ाम है अब सवाल कौन पूछेगा
हथियार दिख रहे हैं उनके सिपहसालारों में

गरीब की औकात तो बस दो रोटी की बात है
अक्सर दिखता नहीं है वो भीड़ के किनारों में

कल तक जो घूमते थे मंदिर और मस्जिदों में
उनको भगवान दिख रहे हैं अब साहूकारों में

तड़प रहे हैं लोग अब तो दवा रोटी पानी को
नया अत्याचार है ये साहब के अत्याचारों में

नोट बंदी करके थपथपा रहे जो पीठ अपनी
बदल रहे हैं नोट हज़ार का अब दो हज़ारों में

काली कमाई ग़र ढूंढ़ना हो तो तुमको बताऊँ
सारे चोर तो शामिल हैं आपके वफादारों में
         

आहिस्ता आहिस्ता

गुज़र रही है शाम आहिस्ता आहिस्ता
फिर उस के नाम आहिस्ता आहिस्ता

कभी शिकन जो माथे पर आयी नहीं
कभी किस्मत में थी ऐसे जुदाई नहीं
छुपाना ज़ख्मों को यूँ आसान नही था
किसने कहा कि दिल परेशान नही था
मयख़ाने में भी ख़ामोशी मयस्सर नही
छलक रहे हैं जाम आहिस्ता आहिस्ता
गुज़र रही है शाम आहिस्ता आहिस्ता

उत्सवों के इस शहर में तुम चले आओ
तमन्नाएँ परे रख कर जरा मुस्कुराओ
अंधेरों ये हटा कर उजाले सजाओ तुम
चिरागों से क्या होगा सूरज उगाओ तुम
ज़िन्दगी भर ज़िन्दगी का इंतज़ार किया
हो रही उम्र तमाम आहिस्ता आहिस्ता
गुज़र रही है शाम आहिस्ता आहिस्ता
फिर उस के नाम आहिस्ता आहिस्ता


ख्याल

मेरा ख्याल है तू
तेरा ख्याल हूँ मैं
मेरा जवाब है तू
तेरा सवाल हूँ मैं
लाख खतायें तेरी मेरी
मैं भी भुला दूँ
तू भी भुला दे
अपनी मुहब्बत को सजदा
मैं भी बना लूँ
तू भी बना ले
ग़र बेमिसाल है तू
कोई कमाल हूँ मैं
मेरा जवाब है तू
तेरा सवाल हूँ मैं
मेरा ख्याल है तू
तेरा ख्याल हूँ मैं
थोड़ा पागलपन तुझ में है
थोड़ा पागल तो मैं भी हूँ
तेरी नज़र का तीर लगा तो
थोड़ा घायल तो मैं भी हूँ
जो रंग गुलाब है तू
तो रंग गुलाल हूँ मैं
मेरा जवाब है तू
तेरा सवाल हूँ मैं
मेरा ख्याल है तू
तेरा ख्याल हूँ मैं

गुरुवार, 1 दिसंबर 2016

कुछ भी नहीं

तू इबादत मेरी
तू ही चाहत मेरी
मैं हूँ तुझसे ही
तू मेरी ज़िन्दगी
तेरे बिन कुछ भी नहीं
कुछ भी नहीं
कुछ भी नहीं
तेरे बिन कुछ भी नहीं
तू मेरी ज़िन्दगी
तेरे बिन कुछ भी नहीं
ख़ामोशी सी है ये मुहब्बत
इसको आ लफ़्ज़ों से सजा दें
बेमौसम बारिश की बूँदें
लाकर हम इसको भिगा दें
आसमान में चाँद से आगे
अपनी मुहब्बत हम पहुँचा दें
कोई हद ना रहे
ना रहे ये जमीं
कुछ भी नहीं
कुछ भी नहीं
तेरे बिन कुछ भी नहीं
तू मेरी ज़िन्दगी
तेरे बिन कुछ भी नहीं
जब मैं सोचूँ ज़िन्दगी क्या है
दिल में इक तेरा चेहरा है
अब मेरा मुझमेँ क्या है बाकी
रूह है तू ये दिल भी तेरा है
चाँद सितारे और रंग सारे
देखूँ जब तू मुझको दिखता है
कोई लम्हा ना हो
कोई पल भी नहीं
कुछ भी नहीं
कुछ भी नहीं
तेरे बिन कुछ भी नहीं
तू मेरी ज़िन्दगी
तेरे बिन कुछ भी नहीं

रविवार, 27 नवंबर 2016

उत्सव

देश तो उत्सव मना रहा है
नयी क्रांति भी ला रहा है
किसी गरीब को भी देखो
वो भूखे बच्चे सुला रहा है

तड़प रहा है आज तक जो
क़तार में खड़ा है आदमी
अत्याचार तमाम सहकर
मज़बूरी में पड़ा है आदमी
देशभक्ति की बयार में यूँ
हँसकर मुल्क बना रहा है
देश तो उत्सव मना रहा है
नयी क्रांति भी ला रहा है

आओ इस उत्सव में हम
अपने प्राणों की आहुति दें
आज़ादी की लड़ाई की वो
फिर दिल को अनुभूति दें
लेकिन देखा जो ताज़ा हाल
लोन ले कोई उड़ा जा रहा है
देश तो उत्सव मना रहा है
नयी क्रांति भी ला रहा है

कोई क्रांति ऐसी भी आये
जिसमें गरीब भी मुस्कुराये
ना रहे भूख रोटी की चिंता
नेता भी जनता से घबराये
मेरे दिल का क्या कहूँ मैं
कैसे ख्वाब ये सजा रहा है
देश तो उत्सव मना रहा है
नयी क्रांति भी ला रहा है
                           


रविवार, 20 नवंबर 2016

इंडिया मस्त है

इंडिया तो आज मस्त है
भारत ही अस्त व्यस्त है
अमीर कर रहे मौज यहाँ
गरीब सब जगह त्रस्त है

चारों ओर जिधर भी देखो
बस नोटों की मारामारी है
आज यहाँ सवाल पूछना
आजकल देश से गद्दारी है
लोग मर रहे लाइन में अब
लेकिन लाईन तो लाचारी है
बाकी सारे देशद्रोही लगते
सरकार बस वतन परस्त है
अमीर कर रहे मौज यहाँ
गरीब सब जगह त्रस्त है

पाँच सौ हज़ार अब बंद हुए
नया नोट आया दो हज़ारी है
दूध राशन सब्जी कैसे लायें
गायब हुई अब रेजगारी है
ललित विजय तो जीत मनाएं
नेताओं की भी तो अब मौज है
गरीब किसान के पीछे पड़ती
साहब जी की ही ये फौज है
जिसने हिंदुस्तान को थामा था
हिल रहे अब सारे दरख़्त है
अमीर कर रहे मौज यहाँ
गरीब सब जगह त्रस्त हैं

सैनिक मर रहे हैं सीमा पर
लोग मर रहे नोटों के खेल में
बाकी जो लोग बच जाते हैं
वो भी मर जाते हैं अब रेल में
पेट्रोल दुनिया में सस्ता हुआ
यहाँ तो आग लगी है तेल में
राष्ट्रवादी तो हँस रहे हैं देखो
हालत जनता की पस्त है
अमीर कर रहे हैं मौज यहाँ
गरीब सब जगह त्रस्त है
                                     

फ़ासले

हज़ारों फ़ासले देखे
हज़ारों गम पाए हैं
तमाम लोग ज़माने में
हमने आजमाए हैं

मुक़म्मल आरज़ू जैसी
कोई चीज नहीं होती
बिना हौंसले के यारों
तक़दीर भी नहीं होती
जो रिश्तों में यकीं नहीं
तो ज़िन्दगी सताये है
तमाम लोग ज़माने में
हमने आजमाए हैं

उनकी बातें जैसे साँसे
मेरे जीने की जरुरत है
उनको मैं समझाऊँ कैसे
कितनी उनसे मुहब्बत है
उनकी मुस्कानों में हमने
कितने ग़म भुलाये हैं
तमाम लोग ज़माने में
हमने आजमाए हैं

यूँ हक़ीक़त का फ़साना
आसान तो नहीं होता
ग़र मिल जाता यूँ ही से
तो वो चाँद नहीं होता
लोगों ने जिसको देख के
कई ख्वाब सजाये हैं
तमाम लोग ज़माने में
हमने आजमाए हैं
     

चाँद दीवाना

देखो पिया तुम भूल ना जाना
खिड़की पे बैठा चाँद दीवाना
अच्छा नहीं है मुझे तड़पाना
आजाना तुम घर जल्दी आना

मेरे पिया मैं तेरी राह निहारूँ
साँझ सकेरे तेरा नाम पुकारूँ
जिस रस्ते से तुमको है आना
उस रस्ते को मैं झाड़ू बुहारूँ
मेरी अरज भी तो सुनते जाना
आजाना तुम घर जल्दी आना
देखो पिया तुम भूल ना जाना
खिड़की पे बैठा चाँद दीवाना
अच्छा नहीं है मुझे तड़पाना
आजाना तुम घर जल्दी आना

बावरी कह मुझे लोग चिड़ायें
मेरा दरद वो समझ नहीं पाएँ
कैसे बिरह की पीड़ा बताऊँ
अखियन में बस राम समाये
प्रेम अगन में मोहे जलते जाना
आजाना तुम घर जल्दी आना
देखो पिया तुम भूल ना जाना
खिड़की पे बैठा चाँद दीवाना
अच्छा नहीं है मुझे तड़पाना
आजाना तुम घर जल्दी आना
             

रविवार, 6 नवंबर 2016

खिड़कियां

दिल के दरवाजे खोल दो सारे
बंद खिड़कियां भी खोल दो
अब तो मुहब्बत का मौसम है
ज़माने से आज ये बोल दो

लाख नफ़रतें बाँध रखी जो
ऐसी जंज़ीरें भी तोड़ दो
इंसान को इंसान से आज
इंसान बनाकर जोड़ दो
कह दो हुक्मरानों से ये भी
कि मज़हब की न दीवार है
हम हिंदुस्तानी हैं सभी
हमें इंसानियत से प्यार है
आज वफाओं का फिर से तुम
जान से भी ज्यादा मोल दो
दिल के दरवाजे खोल दो सारे
बंद खिड़कियां भी खोल दो

राम के भजन भी होएंगे अब
और अज़ान भी तो आएगी
दुःख का अँधियारा छट जायेगा
मानवता गीत बसंत गायेगी
मेरा कहना तुम मान जो लोगे
सारे कष्ट भी मिट जायेंगे
प्रेम की इस पावन भूमि में
फिर दुश्मनी नहीं पाएंगे
मेरा तेरा सब करना छोड़ के
हम से रिश्ता जोड़ लो
दिल के दरवाजे खोल दो सारे
बंद खिड़कियां भी खोल दो
     

मंगलवार, 25 अक्टूबर 2016

देशभक्ति

"किसी ने कहा मुझे हिन्दू
किसी ने कहा मुसलमान हूँ
मैंने कहा मत बाँट मुझे
मैं तेरा हिंदुस्तान हूँ"

सही मायनों में ये पंक्तियाँ बहुत कुछ कह जाती हैं। देश क्या है? राष्ट्र क्या है? क्या सिर्फ भौगोलिक क्षेत्र कोही देश कहते हैं? नहीं। देश बनता है आम लोगों से। उसमें रहने वाले जो किसी भी धर्म, जाति या संप्रदाय के हों, एक साथ मिलकर देश बनाते हैं। देश एक विचार है एक भावना है जो हम सभी से मिलकर बनी है।
यही भावना और विचार जब कुछ कर गुजरने के जज़्बे के साथ मिलता है तो उसे देशभक्ति कहते हैं। जी हां वही देशभक्ति जो बहादुरशाह जफ़र ने अपनी शायरी में बयाँ की रंगून की जेल में। वही देशभक्ति जिससे प्रभावित होकर अकबर ने दीन ए इलाही धर्म चलाया।
लेकिन सवाल है कि क्या देशभक्ति स्थान और स्थिति के हिसाब से बदल जाती है? इसी सवाल का जवाब ढूंढ़ने की एक कोशिश की है मैंने इस लेख में।
आज़ादी से पहले:-
मैंने पढ़ा है आज़ादी से पहले के इतिहास को। जिसमें महान देशभक्त पैदा हुए। जिन्होंने अंग्रेजी हुक़ूमत के तमाम जुल्म सहते हुए ना सिर्फ हिंदुस्तान को आज़ाद कराने की जंग जारी रखी साथ ही मानव कल्याण के लिए कार्य करने में भी आगे रहे। ऐसा नहीं की उन लोगों में उस वक़्त मतभेद नहीं थे। तब भी एक तरफ जहाँ झाँसी की रानी हुई थी जिनके लिए देशभक्ति अपनी झाँसी को बचाने के साथ साथ अंग्रेजों को खदेड़ना भी थी। वहीँ कुछ ऐसे राजा भी थे जिनके लिए अपने राज्य को बचाने के लिए अंग्रेजों से संधि बुरी नहीं लगी। शायद ये देशभक्ति के अलग अलग प्रकार ही थे। क्योंकि तब हिंदुस्तान अनेक रियासतों में बँटा हुआ था। इसलिए उनकी देशभक्ति भी उनके राज्य हित के अनुसार ही चलती थी। उसके बाद दौर आया गांधी जी का। जहाँ गांधी जी की अहिंसा की भावना ने पूरे देश को रियासतों की भावना से आगे बढ़ कर एक देश के रूप में पिरोने का काम किया। वहीँ कुछ उनसे अलग राह पर भी चले जैसे कि सुभाष चंद्र बोस, भगत सिंह, रामप्रसाद बिस्मिल और चंद्र शेखर आज़ाद। वहीँ उधम सिंह जैसे मतवाले भी हुए जो अकेले ही आज़ादी की लड़ाई को लड़े। लेकिन अलग अलग रास्तों पर चलते हुए भी इन सभी का एक ही मक़सद था हिंदुस्तान को अंग्रेजों से आज़ाद करवाना।  इस लड़ाई का बिगुल तो 1857 में मंगल पांडे ने ही फूंक दिया था जब देशभक्ति जैसी भावना का विकास नहीं हो पाया था।
ऐसे वक़्त में सारा देश जिसमे हिन्दू मुस्लिम सिख एवं अन्य सभी जातियां अपने अपने तरीके से इस लड़ाई में कूद पड़ी। जिसकी वजह से अंग्रेजों को महसूस हो गया कि अब हिंदुस्तान में वो ज्यादा दिन टिक नहीं पाएंगे। तब उन्होंने अपना ब्रम्हास्त्र निकाला धर्म के आधार पर भेदभाव का। जिसके आगे तमाम हिंदुस्तानियों की देशभक्ति धुंधली सी पड़ने लगी। तब देश में हिन्दू मुस्लिम की भावना ने जोर मारा जिसकी बदौलत देश आपस में भी लड़ने लगा। इसकी बदौलत देश में हिन्दू सभा और मुस्लिम लीग जैसे धर्म आधारित संगठनों का जन्म हुआ। यही वो वक़्त था जब देश में एक देशभक्ति के स्थान पर धर्म आधारित देशभक्ति दिखने लगी। उसी के परिणामस्वरूप जिन्ना जैसे लोगों का उद्भव हुआ जिनका मक़सद जनसेवा नहीं बल्कि सत्ता था। इसी नयी तरह की देशभक्ति के कारण देश में दंगे हुए और इसका परिणाम एक नए देश पाकिस्तान का उद्भव हुआ।
     कल जो देशभक्ति बयार कलकत्ता, दिल्ली से लाहौर तक बह रही थी वो अटारी बॉर्डर पंजाब में पहुँच कर रुकने लगी। यहाँ से ऐसा लगने लगा कि देशभक्ति की भावना भी सीमा बदलते ही बदल जाया करती है।

आज़ादी के बाद:-
आज़ादी के बाद सभी को ऐसा लगा कि अब ये देश हमारा है। अब सब अच्छा होगा। इसीलिए सभी की देशभक्ति कम हो गयी और धन भक्ति बढ़ने लगी। अब लोगों का मुख्य सपना ज्यादा से ज्यादा धन इकट्ठा करना हो गया। जिसके लिए शक्ति संपन्न लोग अपने ही देशवासियों पर जुल्म करने लगे। अब किसी के पास देशभक्ति का वक़्त नहीं था। हाँ चुनाव आने पर कांग्रेस आज़ादी के पहले की देशभक्ति की दुहाई जरूर देने लगी जिससे सत्ता उससे दूर न हो। चूँकि लोकतंत्र का राज है इसलिए चुनाव तो जीतना ही पड़ेगा। चाहे उसके लिए कुछ भी करना पड़े। आज़ादी के बाद हर जाति और धर्म की अपनी अपनी देशभक्ति की भावना अलग तरह से विकसित होने लगी। आंबेडकर की देशभक्ति ने भेदभाव मिटाने और देश को एक सूत्र में पिरोने की कोशिश की लेकिन स्वार्थी तत्वों की देशभक्ति ने उनके सपनों को पानी फेर दिया। वहीँ हिन्दू सभा की अलग तरह की देशभक्ति से प्रभावित होकर नाथूराम गोडसे ने गांधी जी का क़त्ल कर दिया। लेकिन हिन्दू सभा ने एक हत्यारे को ऐसे महिमामंडन किया जैसे की वो कोई अवतार हो। ये कौन सी देशभक्ति थी मैं आज तक नहीं समझ सका।

अलग अलग तरह की देशभक्ति:-
उस दौर के बाद तो देशभक्ति टुकड़ों टुकड़ों में विकसित होने लगी। नेहरू ने हिंदी चीनी भाई भाई का नारा देकर नयी तरह की देशभक्ति सिखाने की कोशिश की। वो तो भला हो चीन का जो नेहरू की इस देशभक्ति के टुकड़े टुकड़े कर दिए नहीं तो आज पता नहीं हम कौन सी देशभक्ति के दौर में जी रहे होते।
वहीँ एक दौर शास्त्री जी का आया जब उन्होंने फिर से देश को जय जवान जय किसान के नारे के साथ जोड़ा। तब पुरे देश में एक लहर चली किसान को मजबूत करने की तथा सेनाओं के मजबूतीकरण की। इसी दौर में पाकिस्तान ने जब हमला किया तब शास्त्री जी की देशभक्ति ने पाकिस्तान जो कल तक हिंदुस्तान ही था उसके अंदर जाकर उनको हार मानने पर मजबूर किया।
इंदिरा जी के वक़्त में भी पाकिस्तान विरोधी लहर देशभक्ति के रूप में आयी। पाकिस्तान फिर से हार गया। लेकिन तब तक हिंदुस्तान में देशभक्ति का स्वरुप बदलने लगा था। वो देशभक्ति जो अपने देश को शांति और सद्भाव के साथ आगे बढ़ने के रूप में थी वो अब पाकिस्तान विरोध तक सीमित होने लगी थी।
वक़्त के साथ साथ देशभक्ति का स्वरुप भी बदलता रहा। वहीँ देश में हिन्दू संगठन अलग तरह की देशभक्ति चला रहे थे। जिनका मक़सद सिर्फ हिंदुओं के लिए था। उनके लिए देशभक्ति सिर्फ हिंदुओं के लिए थी और बाकि दूसरे मज़हबों के लिए उन संगठनों ने जहर फैलाने का काम किया।
लेकिन जैसा मैंने पहले भी कहा कि देशभक्ति सीमा के हिसाब से बदल जाती है। ऐसी ही एक सबसे अलग देशभक्ति का जन्म पंजाब में हुआ जो अपने को हिंदुस्तान से अलग करने की मांग करने लगा। इसी समय पंजाब में आतंकवाद ने अपना शैतानी सर उठाया। पंजाब में लोग अपनी इसी देशभक्ति की वजह से आतंकवाद के शिकार बने। और इसी देशभक्ति की वजह से हमने इंदिरा गांधी को खोया। लेकिन इसी का परिणाम था कि जहाँ एक ओर पंजाब में हज़ारों नौजवानों को अपनी जान गंवानी पड़ी वहीँ उनकी हत्या के बाद हुए दंगों में हज़ारों सिख लोगों को सरेआम देशभक्ति की आड़ में मार डाला गया। आज़ाद हिंदुस्तान का सबसे जघन्य नरसंहार था ये। इन हज़ारों सिखों में जाने कितने लोग ऐसे होंगे जिन्होंने आज़ादी की लड़ाई में लाठियां खाई, भूखे रहे या अपने परिवार जनों की कुर्बानियां दी। लेकिन लोगों की स्वार्थी देशभक्ति के आगे वो सब असफल रहीं और क़त्लेआम हुआ। अगर देशभक्ति सिर्फ देश और उसके लोगों के लिए होती तो शायद ऐसा क़त्लेआम नहीं होता।
लेकिन हमारा देश इतना सहिस्णु है कि इन सभी बातों को भूलकर आगे बढ़ने लगा। शायद समय सबसे बड़ी दवा है कुछ भी भूलने के लिए। लेकिन हिन्दू सभा के फैलाये जा रहे ज़हर से देश बच नहीं सका और फिर इन लोगों के स्वार्थ में आकर बाबरी मस्जिद को गिरा दिया और उसके बाद फिर दंगे हुए। फिर सभी की देशभक्ति अपनी अपनी सहूलियत के हिसाब से नज़र आने लगी।
लेकिन उसके बाद हमारा हिंदुस्तान दो तरह की देशभक्ति में बँट गया। एक वो देशभक्ति जो देश का और सारे समाज का भला चाहती थी, सभी को एक समान देखती थी वहीँ दूसरी ओर धार्मिक देशभक्ति। इसी समय देश में अलग अलग धर्म और जातियों के संगठनों का प्रादुर्भाव हुआ। जाहिर तौर पर कोई भी धार्मिक या जातीय संगठन देश सेवा के लिए नहीं बल्कि दुश्मनी फ़ैलाने के रूप में ही सामने आये। कल तक जो देश एक साथ दिखाई देता था अब अलग अलग धर्म और जातियों की देशभक्ति में चरमराने लगा। तब देश में आरक्षण आंदोलन का उद्भव हुआ। देश फिर से एक नयी बयार में बहने लगा आरक्षण समर्थक और आरक्षण विरोधी। लेकिन होता वही है जो राजनेता चाहते हैं। वही हुआ। देश का भला छोड़ कर सब अपना भला करने में लग गए।
मैं इन सभी बातों का विश्लेषण नहीं कर रहा क्योंकि मैं सिर्फ देशभक्ति की व्याख्या ढूंढ़ने की कोशिश कर रहा हूँ। और ये इतिहास की घटनाएं मुख्य कारक रही हैं हिंदुस्तान में देशभक्ति को प्रभावित करने में।
आधुनिक देशभक्ति:-
आधुनिक देशभक्ति जिसे राष्ट्रवाद का नाम भी दिया गया। शायद ये सबसे ज्यादा नकली देशभक्ति है। इसमें देश या समाज से किसी को कुछ लेना देना नहीं है। हर रोज बदलती है ये। जो ज़हर जातिवादी एवं धार्मिक संगठनों ने देश में बोया उसका परिणाम है ये आधुनिक देशभक्ति। आज देश को इतने हिस्सों में तोड़ दिया है इन लोगों ने कि फिर से एक करने में वर्षों बीत जायेंगे। अब ये देशभक्ति हिन्दू, मुस्लिम या किसी अन्य जाति से सम्बंधित नहीं है बल्कि ये सिर्फ राजनितिक दलों की अपनी अपनी भक्ति है। इसे उन्होंने राष्ट्रवाद का नाम दिया है। दूसरे अर्थों में कहें तो सिर्फ वो ही राजनीतिक दल या संगठन राष्ट्र हैं बाकि सभी को वो विदेशी, पाकिस्तानी या दुश्मन मानते हैं हिंदुस्तान का। अब देशभक्ति के लिए आपको देश के लोगों का भला करना, समाज की सहायता करना, गरीबों की मदद करना या देश के लिए शहीद होना मायने नहीं रखता। आप राजनीतिक दल का हिस्सा बन जाये फिर आप सरेआम गुंडागर्दी कीजिये लूट कीजिये हत्या कीजिये। आपका कोई कुछ नहीं बिगाड़ पायेगा। जो आपका विरोध करेगा वो देश का दुश्मन कहलायेगा। आप पक्के राष्ट्रवादी कहलायेंगे।
इसी राष्ट्रवाद का सबसे विकृत स्वरुप आधुनिक समय में सामने आने लगा जब देश में मारपीट की घटनाएं सर उठाने लगीं। जहाँ देश में पहले गौसेवा की मान्यता थी। वही देश में अब गौरक्षा का उद्भव हुआ जिसके नाम पर कानून तोड़ना और अत्याचार करना सामने आया। जो लोग समाज के सभी तबकों के लिए काम कर रहे उनको देशद्रोही कहा जाने लगा। संविधान और कानून का तो जैसे कोई मतलब ही ख़त्म हो गया इन राष्ट्रवादियों या फ़र्ज़ी देशभक्तों ने हर तरह से समाज का उत्पीड़न शुरू कर दिया। सेना के नाम पर इन्ही फर्जी राष्ट्रवादियों या नकली देशभक्तों ने ताबूत घोटाला किया आदर्श घोटाला किया। तो कभी गाय के नाम पर एक बुजुर्ग को घर से निकाल कर सरेआम पीट पीट कर मार डाला गया। दलितों को पीटा गया गाय के नाम पर और जब दलितों ने विरोध किया तो उनको और पीटा गया। जिस हिंदुस्तान के लोकतंत्र की सारी दुनिया मिसाल देती है उसी लोकतंत्र का मजाक बनाया इन राष्ट्रवादियों ने विपक्षी दलों को नक्सली, देशद्रोही कह कर। विपक्षी नेताओं का जिस तरह से मजाक उड़ाया गया ये देख कर संविधान निर्माताओं को जरूर शर्म आ रही होगी स्वर्ग में। अगर इन राष्ट्रवादियों की इन हरकतों का विरोध किसी ने किया तो उसे गन्दी गन्दी गलियां इनके कार्यकर्ताओं ने देना शुरू कर दिया। महिलाओं तक को नहीं बख्शा गया।
जे एन यू प्रकरण को ज्यादा दिन नहीं बीते हैं अभी। सभी को याद है कि कुछ लोगों की हरकतों को लेकर इन लोगों ने पूरे विश्वविद्यालय को देशद्रोही कह दिया। यहाँ तक कि जब उसके अध्यक्ष को कोर्ट परिसर में राष्ट्रवादियों के समूह ने तिरंगा लेकर पीटा। यहाँ तक कि इनके एक विधायक भी विपक्षी नेता को कोर्ट के बाहर पिटाई करते हुए कैमरे में क़ैद हो गए। संविधान, कानून और न्याय व्यवस्था का इससे घिनौना मजाक क्या हो सकता है? सभी हिंदुस्तानियों को इन हरकतों से शर्म आयी। लेकिन ये बेशर्मी के साथ अपनी इन कारगुजारियों को महिमामंडित करते रहे।
आज ये माहौल बना दिया है इन फ़र्ज़ी देशभक्तों ने कि सेना के नाम पर बड़ी बड़ी बातें तो करते हैं लेकिन जंतर मंतर पर बैठे ओ आर ओ पी की मांग करते बुजुर्ग सैन्य कर्मियों को पिटवाने में इनको कोई गुरेज नहीं। इनके ही कार्यकर्त्ता इन सैन्यकर्मियों को गालियां देते है सोशल मीडिया पर गद्दार और देशद्रोही शब्दों से नवाजते हैं।
तालिबान की नीतियों पर ही चलते हुए ये महिला शिक्षा, महिला सशक्तिकरण, सामाजिक  एकता और अखंडता के खिलाफ हैं। आज आधुनिकता के दौर में लड़कियों के मोबाइल रखने या उनके कपड़ों को लेकर इनके बयान शर्म का अहसास करवाते हैं। वहीँ बलात्कार के लिए लड़की को जिम्मेदार कहते हुए भी इनको शर्म नहीं आती। लव जिहाद का नाम लेकर राधा कृष्ण के देश में प्रेम का विरोध करते हैं ये देशभक्त और इसके लिए लड़कियों पर हाथ उठाना और पीटने को सही मानते हैं।
ये लोग सरकार या इनका विरोध करने पर तमाम तरह की धमकियाँ देते हैं। लेकिन खुद के गाली देने और धमकी देने को अभिव्यक्ति की स्वन्त्रता का नाम देते हैं। दूसरे की अभिव्यक्ति की स्वन्त्रता इनके शब्दकोष में है ही नहीं। फ़िल्मी कलाकारों को मज़हब के नाम पर परेशां करते हैं लेकिन अपराधियों हत्यारों बलात्कारियों को सम्मानित करते हैं समारोहों में।
इनकी देशभक्ति इनके पाकिस्तान प्रेम में आड़े नहीं आती बल्कि उसे ये लोग महिमामंडन करते हैं लेकिन अगर कोई पाकिस्तानी कलाकार हिंदुस्तान आकर फिल्मों में काम करे या शोज करे तो इनकी छाती पर सांप लोट जाते हैं। फिर ये मुम्बई अंडरवर्ल्ड की तर्ज़ पर वसूली का गन्दा खेल करते हैं सेना के नाम पर जिसे नकार कर सेना इनके मुह पर करारा तमाचा मारती है। लेकिन फ़र्ज़ी देशभक्त या राष्ट्रवादी होना कोई आसान काम नहीं। बेशर्म होने की हद पार करनी पड़ती है क्योंकि पाकिस्तानी कलाकार पसंद नहीं इनको लेकिन पाकिस्तान के साथ व्यवसाय करना पसंद है। दिवाली पर चीनी पटाखे और सामान का बहिष्कार करने की अपील तो करते हैं ये लेकिन चीनी फ़ोन और दूसरी चीजों का लगाव नहीं छोड़ पाते। स्वदेशी की अपील तब झूठ का पुलिंदा लगती है जब सरदार पटेल की मूर्ति, योग के लिए मैट, एवं अन्य सामान इनको चीन का ही चाहिए।
दूसरों से ये लोग देशभक्त होने का सर्टिफिकेट मांगते हैं जिसके लिए सिर्फ आपको गली देना, महिलाओं का अपमान करना और गुंडागर्दी करना आना चाहिए। बस इनके साथ शामिल हो जाओ और बन जाओगे आप भी आधुनिक देशभक्त। दूसरे मज़हब के लोगों को दुश्मन मानते हैं और पाकिस्तानी होने का ठप्पा लगा देते हैं ये नकली देशभक्त। इहक़ जवाब मैं इस शेर में देना चाहूंगा कि

" मेरे मज़हब से ना तौल वतनपरस्ती मेरी
  सज़दा भी करता हूँ तो जमीन चूमता हूँ मैं"

इनके लिए देश की अवधारणा सिर्फ इनके संगठन पर आकर ख़त्म हो जाती है। जो इनसे अलग है उसे ये देश का दुश्मन मानते हैं। खुद को राष्ट्रवादी कहते हैं लेकिन इनसे सवाल किया जाये कि देश और समाज के लिए क्या किया तो कुछ दंगे और नफरत वाले बयानों के अलावा इनके पास सिर्फ एक बात बचती है कहने को और वो है कि तुम देश द्रोही हो, पाकिस्तानी हो या नक्सली हो, देश के दुश्मन हो।
लेकिन असल में इस तरह के लोग ही देश के लिए सबसे बड़ा खतरा हैं और लोकतंत्र के लिए भी ये खतरा हैं। लोकतंत्र में जहाँ सभी राजनीतिक दल देश के लिए जरुरी हैं वहीँ फ़र्ज़ी देशभक्त संविधान की इस अवधारणा को ही ख़त्म करने में लगे हुए हैं। अगर ऐसा ही चला तो लोकतंत्र की परिभाषा "हम भारत के लोग" बदल कर "हम राष्ट्रवादी लोग" या "हम फलाना संगठन या पार्टी के लोग" हो जायेगी। और तब हमारे जान से प्यारे देश को कितना नुकसान पहुंचेगा इसका अंदाज़ा लगाने से भी डर लगने लगता है।
ये कैसी देशभक्ति है जो इस मुकाम पर आ पहुंची है कि अब देश की अवधारणा को ही बिगाड़ रही है। हमारे लिए देशभक्ति कल भी गरीब, लाचार , मजबूर की मदद करना है चाहे वो किसी भी धर्म या मज़हब के हों। और हमारी देशभक्ति अपने देश की समृद्ध और सुखी बनाने की है जिसके लिए ऐसे तमाम अवरोधों से लड़ते हुए आगे बढ़ना होगा।
सिर्फ भारत माता की जय या वंदे मातरम कहने से कोई देशभक्त नहीं हो जाता। देशभक्त होने के लिए जरुरी है अपने देश की एकता अखंडता को बनाये रखना। अपना काम ईमानदारी से करना। और देश की तरक्की में सहायता करना। लेकिन शायद हमारी देशभक्ति इनकी समझ में नहीं आएगी। लेकिन हिंदुस्तान जरूर समझता है इसीलिए आज भी ये देश आगे बढ़ रहा है और हमेशा बढ़ता जायेगा। जब तक एक एक सच्चा हिंदुस्तानी देशभक्त ज़िंदा है वो देश न टूटने देगा, न बँटने देगा और न मिटने देगा।
जय हिंद