बुधवार, 28 सितंबर 2016

आईना

ये दिल आईना है तुझे पहचानता है
मेरी सुनता नहीं तेरी बात मानता है
ये दिल आईना है तुझे पहचानता है

सामने तेरे आते ही तुझसा लगता है
तेरे जाने पर रोता है और तड़पता है
चाहता है ये अब तेरे साये में रहना
एक पल को भी ना दूर तुझसे रहना
रात और दिन तेरा नाम पुकारता है
ये दिल आईना है तुझे पहचानता है

मेरा समझाना अब तो बेकार हुआ है
तेरी ख़ुशी दिल का कारोबार हुआ है
खरीदोगे दिल कैसे मुझे भी बताओ
जानते हो गर तरीक़ा मुझे बतलाओ
दौलत शौहरत को ये कहाँ जानता है
ये दिल आईना है तुझे पहचानता है

तोड़ देना यूँ दिल को मुनासिब नहीं है
इसकी कोई वजह भी वाजिब नहीं है
खिलौना नहीं है जो ये दूजा मिल जाये
फूल नहीं है जो हर बाग़ में खिल जाये
रस्मो रिवाजों से दिल अनजान सा है
ये दिल आईना है तुझे पहचानता है
मेरी सुनता नहीं तेरी बात मानता है
                   





तनहा चाँद

चाँद रात में तनहा चाँद
कुछ तेरा कुछ मेरा चाँद
आठों पहर देखूँ जिसको
मेरे सनम का चेहरा चाँद

दूरी कम क्यों होती नहीं
रात भी क्यों सोती नहीं
आँखों का किस्सा जुदा
ख्वाब कोई संजोती नहीं
पानी में अक्स है दिखता
यूँ फ़लक़ से उतरा चाँद
चाँद रात में तनहा चाँद
कुछ तेरा कुछ मेरा चाँद

आसमान की बातें देखो
कैसा किस्सा है सुनाया
तारों के साथ भी होकर
क्यों तनहा चाँद बनाया
बादल के पीछे शर्मीला
कभी छुपा निकला चाँद
चाँद रात में तनहा चाँद
कुछ तेरा कुछ मेरा चाँद
आठों पहर देखूँ जिसको
मेरे सनम का चेहरा चाँद

तनहा

तुम ख़्वाबों की रेत सी
मैं कोई बीता लम्हा हूँ
तुम भी कितनी तनहा हो
मैं भी कितना तनहा हूँ

वक़्त से खेलें आज यूँ
जैसे बच्चे का खिलौना हो
हम भी हैं तैयार यहाँ
हो जाये हो भी होना हो
कोई अपना ही दुश्मन सा
लगता मैं जैसे अँधेरा हूँ
तुम भी कितनी तनहा हो
मैं भी कितना तनहा हूँ

घाव एक से दर्द एक सा
मरहम भी एक हमारा है
ये बैरी सा वक़्त यहाँ
ज़िन्दगी ने क्यों उतारा है
सारी आरज़ू मिटाने को
जैसे मैं दर्द का पुलिंदा हूँ
तुम भी कितनी तनहा हो
मैं भी कितना तनहा हूँ

काली रात

काली काली रातों के
पीछे उजले सबेरे हैं
सारे दर्द ख़्वाबों के
आके यहीं पे ठहरे हैं

सारा दिन ज़ख्मो से
हम परेशान रहते हैं
हँसी चूका के पाए हैं
हमने पल सुनहरे हैं
काली काली रातों के
पीछे उजले सबेरे हैं

कोई बात सुनी नही
इश्क़ की रात बाकी है
मयख़ाने में पूँछें लोग
कितने जाम ठहरे हैं
काली काली रातों के
पीछे उजले सबेरे हैं

हर पल रुसवा होता है
जाने कैसी किस्मत है
कैसे ज़िंदा इश्क़ रहा है
उस पर इतने पहरे हैं
काली काली रातों के
पीछे उजले सबेरे हैं
     


रविवार, 25 सितंबर 2016

रोटियाँ


चाँद के किसी ख्वाब की सी होती हैं रोटियां
जुगनुओं के किसी तालाब सी होती हैं रोटियां

किसी को नसीब होती हैं बड़ी मिन्नतों के बाद
किसी के लिए ज़ख्म हज़ार सी होती हैं रोटियां
               
कभी किसी लम्हा ये मुहब्बत बरसाती हैं खूब
तो हीर को रांझे की पुकार सी होती हैं रोटियां

लाख मिन्नतें करते लोग मंदिर ओ मस्ज़िद में
कभी खुदा कभी भगवान सी होती हैं रोटियां

लाखों लोग जो सो जाते हैं सड़क पर भूखे पेट
उनको पकवानों के ख्वाब सी होती हैं रोटियां

तुम जो फेंक दिया करते हो ये बचीं हुईं रोटियां
सोचो छोटे बच्चे के मिज़ाज़ सी होती हैं रोटियां

वो भूखे नहीं तो क्या जानेंगे कीमत रोटियों की
अँधेरी रात में कोई आफ़ताब सी होती हैं रोटियां

किसी भूखे गरीब को दो रोटी देकर तुम देखना
दिल को सुकून ए बहार की सी होती हैं रोटियां

चाँद के किसी ख्वाब की सी होती हैं रोटियां
जुगनुओं के किसी तालाब सी होती हैं रोटियां
                

सोमवार, 19 सितंबर 2016

शहीद का घर

बुझती साँसे सूनी अँखियाँ  कुछ ऐसे ही होते हैं मंज़र
आओ तुमको मैं दिखलाता हूँ मेरे गाँव में इक शहीद का घर

इक माँ दरवाजे पर बैठी है बेटे की राह निहारा करती है
सोते जागते उठते बैठते वो दिन रात पुकारा करती है
इक दिन वापस आएगा वो उसका अब तक विश्वास है
मुर्दा सा जिस्म है जिसका फौलादी उसकी हर सांस है
इंतज़ार में बेटे के कटते हैं उसकी रात दिन आठ पहर
आओ तुमको मैं दिखलाता हूँ मेरे गाँव में इक शहीद का घर

इक बाप है अंदर कमरे में खामोश घड़ी वो तकता है
शायद अपने बेटे की याद लेकर बहुत ही तड़पता है
बेटे की यादों में ही अब वक़्त यूँ गुज़ारा करता है
ख़्वाबों में उससे मिलता है सोते में नाम पुकारा करता है
काश कि वो अब कह सकता बेटा दो पल थोड़ा और ठहर
आओ तुमको मैं दिखलाता हूँ मेरे गाँव में इक शहीद का घर

इक बहन हाथ में राखी ले तस्वीर को देखा करती है
कहाँ गए हो प्यारे भाई मेरे ये अक्सर ही पूछा करती है
रक्षा करने का जो वादा था क्या खूब तूने निभाया है
मातृभूमि की रक्षा में भाई तूने अपना शीश कटाया है
कुछ तो पूण्य किया होगा जो तुझ सा भाई पाया है
तेरे होने से ही तो लगता था मुझको ये मेरा सा घर
आओ तुमको मैं दिखलाता हूँ मेरे गाँव में इक शहीद का घर

बच्चे अब भी पापा को ऐसे घर में तो ढूंढा ही करते हैं
वो मासूम हैं वो क्या जानें शहादत किसको कहते हैं
इक जोड़ी आँखें हैं जिनका पानी भी तो अब सूख गया
उसका जो सबसे अपना था बिन बोले ही वो रूठ गया
वो औरत शहीद की बेवा है उसका कितना बड़ा कलेजा है
खुशियों से वो मिलती नहीं है ज़िंदा सी है पर दिखती नहीं है
इस राष्ट्रभक्त ने भी यौवन पर देश प्रेम का श्रृंगार किया
इक शहीद के बदले में अपने दो बेटों को तैयार किया
शहीद होने का गम नहीं बहुत होता है उसको फकर
आओ तुमको मैं दिखलाता हूँ मेरे गाँव में इक शहीद का घर
आओ तुमको मैं दिखलाता हूँ मेरे गाँव में इक शहीद का घर
            
                              

अतीत

जो कल के वर्तमान थे
वो आज के अतीत हैं
अजीब भेड़चाल में ये
समय क्यों व्यतीत है

कोई रंग रूप से मिला
कोई नाम पर झुका
साथियों का काफिला
अपने अंजाम पे रुका
किसी के हिस्से हार है
किसी के हिस्से जीत है
अजीब भेड़चाल में ये
समय क्यों व्यतीत है

पथिक भी थका हुआ
नाविक की हुई हार है
तूफान ज़ोर का है या
कमजोर सी पतवार है
अपने अपने शोर में ही
ढूंढते सब अपनी प्रीत है
अजीब भेड़चाल में ये
समय क्यों व्यतीत है

कितने शिक़वे ज़िन्दगी से
कितनी ही शिकायतें हैं
नफरतों के साए में पलतीं
आज यहाँ मोहब्बतें हैं
राधा कृष्ण की नगरी में
प्रेम सबसे बड़ी कुरीत है
अजीब भेड़चाल में ये
समय क्यों व्यतीत है
        - इश्क़




मंगलवार, 13 सितंबर 2016

गीत गाँव

मैं गीत गाँव से आया हूँ
मैं प्यार संदेसा लाया हूँ
जात पात और मज़हब के
सब धागे तोड़ आया हूँ
मैं गीत गाँव से आया हूँ

भोले भाले इन चेहरों पर
तकलीफों के क्यों पहरे हैं
आँख उनींदी सी हैं इनकी
क्यों अश्क़ यहाँ पे ठहरे हैं
मैं बन के कुछ अपना सा
मुस्कान सजाने आया हूँ
मैं गीत गाँव से आया हूँ
मैं प्यार संदेसा लाया हूँ

लोग बढे खामोश हुए हैं
जाने कैसी ये मजबूरी है
लोगों की लोगों से देखो
बढ़ती जाती क्यों दूरी है
मीलों की इस दूरी को मैं
दिलों से मिटाने आया हूँ
मैं गीत गाँव से आया हूँ
मैं प्यार संदेसा लाया हूँ

मेरा गाँव मुहब्बत का है
फ़र्ज़ वहाँ इबादत का है
हँसते गाते सब रहते हैं
इश्क़ जहाँ आदत सा है
ऐसे ही इक बस्ती के मैं
ख्वाब दिखाने आया हूँ
मैं गीत गाँव से आया हूँ
मैं प्यार संदेसा लाया हूँ
                                                  


गुरुवार, 1 सितंबर 2016

सरकार

कैसे भरोसा करें हम साहब के बयानों पर
लोग लाशें उठाये ही चल रहे हैं कांधों पर

जिनके हाथ सौंपी हमने विकास की चाभी
वो तो सत्ता कर रहे हैं अब सिर्फ गायों पर

सारे देश का हाल कुछ लावारिस सा हुआ
अँधेरा जमा हुआ है चारों ओर चिरागों पर

वादे हज़ार थे सब ही जुमले बन गए होंगे
गुस्सा हो जाते हैं अब साहब सवालों पर

आजमा भी लिया है मुल्क़ की सरकार को
अब कैसे यकीन करें विकास के दावों पर

रोक लेते हैं हर खबर हर विरोधी बात को
कैसे ताला लगाएंगे अब हमारे ख़्वाबों पर

चलो इक वादा हम भी उनसे कर लें आज
आगे से यकीं न करना हमारे भी वादों पर

जनाब तुमने रखे हैं जो अँधेरे हमारे लिए
ये तुमको सौंप कर रहेंगे हम उजालों पर

तुम तो बदल जाते हो कुछ वक़्त के बाद
कभी शक़ ना करना तुम हमारे इरादों पर

जनता हैं हम तख़्त ओ ताज बदल देते हैं
उतारते हैं गुस्सा सत्ता के गुनाहगारों पर