शुक्रवार, 29 दिसंबर 2017

डर

वैसे तो ये डर बहुत छोटा सा शब्द है लेकिन इसका असर बहुत बड़ा होता है। बहुत भयानक भी। वैसे हम लोगों ने ही इस शब्द को बहुत बड़ा बना दिया है। ठीक वैसे ही जैसे किसी गली के छोटे मोटे गुंडे को हम अपना नेता बनाकर अपने सिर पर बिठा लेते हैं। अब ये डर भी हर वक़्त हमारे सिर पर ही बैठा रहता है और हम संसदीय प्रणाली में सिर्फ वोट तक सीमित रहने वाले लोग इसे भगवान की तरह चुन लेते हैं और अपना सर्वस्व न्यौछावर कर देते हैं इस पर।

बहुत तरह के डर हैं आज हमारे पास। पूरा का पूरा शॉपिंग मॉल खोल रखा है हम लोगों ने डर का। किसी को कुछ पाने का डर, किसी को कुछ खोने का डर। किसी को हँसने का डर, तो किसी को रोने का डर। किसी को नफरत का डर, किसी को मुहब्बत का डर। किसी को इंसान का डर, किसी को जानवर का डर। किसी को आने का डर, किसी को जाने का डर। खाने का डर, पीने का डर, सोने का डर, जागने का डर, सच का डर, झूठ का डर, अपनों का डर, परायों का डर, खूबसूरती का डर, बदसूरती का डर। अमीर लोगों को फुटपाथ पर सो रहे गरीब लोगों पर गाड़ी चढ़ जाने का डर है वहीं उन गरीबों को भी डर है कि सोते में किसी अमीर की गाड़ी उन पर न चढ़ जाये। लोगों को चुप रहने का भी डर है और लोग कहने से भी डरते हैं। यहाँ तक कि शैतान का डर भी है तो लोग भगवान से भी डरते हैं। इतने सारे डर हैं कि अगर सभी को गिनने बैठे तो कहीं मेरी उम्र ही न गुज़र जाये। सारी भूल भुलैया एक तरफ और डर की भूल भुलैया एक तरफ। इसमें घुसने के बाद निकलने का कोई रास्ता ही नहीं मिलता। नकली बाबाओं से आप मुक्ति पा सकते हो लेकिन डर से मुक्ति नहीं मिलती। डर दिखा दिखा कर ही नेता कुर्सी पा लेते हैं। जनता पहले डर से लड़ने के लिए नेता को चुनती है, बाद में उसी नेता से डरने लगती है। डर की महत्वता तो देखिए साहब कि नवरस में भी भय (डर) शामिल है।

डर बचपन से हमारे संस्कारों की भाँति हमारे अंदर प्रविष्ट कराया जाता है उसके बाद हम पर कब्ज़ा कर लेता है, और फिर हमारा मालिक बन जाता है। ये डर ही है जिसने दो दो विश्व युद्ध करवा दिए। प्राचीनकाल में महाभारत करवा दिया। डर ही दंगा करवाता है। एक तरफ लोग बात करते हैं भगत सिंह और सुभाष चंद्र बोस बनने की। लेकिन डर से इस क़दर डर जाते हैं कि शंभूलाल जैसे हत्यारे बन कर किसी निर्दोष अफराजुल की हत्या कर देते हैं। डर का बाजार लगाए लोग हर एक क़दम पर मिल जाते हैं। इतने अच्छे सेल्समैन होते हैं ये लोग कि आपको न चाहते हुए भी डर खरीदना पड़ जाता है। बहुत महँगा वाला कुत्ता है ये जो आपके पीछे तब तक दौड़ता है जब तक आपको काट न ले। इससे कटवाने के बाद आप खुद कुत्ता बनकर दूसरों को काटने निकल पड़ते हैं।

ख़तरनाक महामारी है ये डर। बेहद जानलेवा। मस्तिष्क को निष्क्रिय कर देता है डर। इंसान अपने सोचने समझने की शक्ति खो देता है। अब भला सोचने समझने की शक्ति ही न रहेगी तो फिर इंसान कैसा? जानवर ही कहलायेगा। हॉलीवुड की भाषा में कहें तो ज़ॉम्बी। हाँ वो ही ज़ॉम्बी जिसको फिल्मों में अक्सर देखते हैं हम। आप लोग अभी तक नेताओं को ही ज़ॉम्बी समझते आये हैं। लेकिन डर के वायरस से ग्रसित होकर हम सभी ज़ॉम्बी ही बन रहे हैं और समूची मानव सभ्यता का नाश करने निकल पड़े हैं।

अब सवाल उठता है कि क्या डर सचमुच में इतना ताकतवर है? भाई सच कह रहा हूँ ये कोई जुमला नहीं है और न ही मैं प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार। न ही मैं किसी चुनाव में खड़ा हूँ राष्ट्रवाद का डंडा लेकर। मैं तो डर की बात बता रहा हूँ आपको। लाल किले से भाषण नहीं दे रहा जो झूठ बोलूँगा। डर को तो आप भी पहचानते ही हो। इसीलिए मेरी बात समझ में आ रही होगी। अगर नहीं आयी तो आप भी डर के वायरस से ग्रसित हो चुके हो और शायद धर्म या मज़हब के डर से कटवा कर ज़ॉम्बी बन गए हो। अगर मेरी बात गलत हो तो किसी भी गली या चौराहे पर बुला कर सज़ा देना मुझे। मैं तो फकीर हूँ। जब आप मुझे मारने आओगे मैं अपना झोला उठा कर चल दूँगा।

डर इतना व्यापक हो गया है कि आज हम ये नहीं देख पा रहे है कि क्या सच में डर को मिटाया जा सकता है? या फिर खुद ही डर सत्ता में बैठे राजनैतिक दल के नेताओं की तरह निर्लज़्ज़ और हिंसक हो गया है। असंवैधानिक तरीके से डर अपने डर की सत्ता चला रहा है। लेकिन सृष्टि का नियम है परिवर्तन का। जो आया है उसे मिटना होगा। मुझे भी आपको भी नेताओं को भी और डर को भी। सतयुग में जब भगवान खुद वास करते थे धरती पर तब भी सतयुग खत्म हो गया तो ये डर किस खेत की मूली है। इसको भी मिटना होगा। हज़ार तरीके हैं डर को मिटाने के। ये और बात है कि हम डर से इतना डर चुके हैं कि डर को मिटाने के तरीके देख ही नहीं पाते।

जरा सोचिये। जब डर इतना व्यापक और विशाल साम्राज्य फैला चुका है अपना बिल्कुल आज के सत्ताधारी राजनीतिक दल की तरह तो क्या डर निडर बन चुका है? डर को कोई डर नहीं है क्या?

डर को भी डर है। वो डर है खुद डर का। जी हाँ। डर अपने ही डर से डरता है। डर को डर लगता है हमेशा कि हम लोग उससे डरना न छोड़ दें। क्योंकि अगर हमने उससे डरना छोड़ दिया तो वो एक ही पल में खत्म हो जाएगा। डर का साम्राज्य एक झटके में तबाह हो जाएगा। चुनाव में खड़े किसी प्रत्याशी की तरह डर की जमानत भी न बचेगी। क्योंकि डर ही डर की ज़िंदगी है। डर की वजह से ही तो डर ज़िंदा है। डर को ज़िंदा रखा है हमारे डर ने। हम डरते रहते हैं और डर की उम्र भी बढ़ती रहती है और उसे ताक़त भी मिलती रहती है। ठीक वैसे ही जैसे हमारी खामोशी से ताक़त मिलती है भ्रष्टाचारी और साम्प्रदायिक वैमनस्यता फैलाने वाले नेताओं को। हम खामोश रहते हैं और ऐसे नेता जीतते रहते हैं। हालात यह है कि चुनाव हारते हारते नेता आखिरी वक्त में कभी दुश्मन देश का डर दिखा देते हैं तो कभी किसी धर्म, मज़हब या किसी समुदाय का डर दिखा देते हैं और जीत जाते हैं। हम इतने बड़े और शक्तिशाली लोकतंत्र को हारते हुए खामोशी से देखते रहते हैं।

तो क्या सोच रहे हैं? क्या आप को नेताओं की गुलामी करते-करते डर की ग़ुलामी करने की भी आदत पड़ गयी है? आज आदत सुधारने का वक़्त है। आज डर को मारने का वक़्त है। डर ने हमको ज़िन्दगी भर डराया है तो चलो आज इस डर को हम डराएं। आज डर को इतना डराया जाए कि ये डर को डर से इतना डर लगे कि डर के मारे खुद ही मर जाये। फिर न रहेगा कोई डर न कोई फिक्र। फिर हम बन सकेंगे इंसान। खुशहाल होगी दुनिया और बेहद खूबसूरत भी क्योंकि फिर यहाँ कोई डर नहीं आयेगा। कोई डर जन्म ही नहीं लेगा दुनिया में डर की वजह से। फिर दुनिया में कोई ज़ॉम्बी नहीं होगा। दुनिया में रहेंगे सिर्फ इंसान और इंसानियत बिना डरे।

मंगलवार, 26 दिसंबर 2017

वो गरीब आदमी

सड़क पर पड़ा हुआ है वो गरीब आदमी
सिस्टम सा सड़ा हुआ है वो गरीब आदमी

भूख अब भी जिसको तड़पाया करती है
खुद से ही लड़ा हुआ है वो गरीब आदमी

सत्ता में नेता के झूठे आश्वासनों के खिलाफ
सच के लिये अड़ा हुआ है वो गरीब आदमी

सर्दी गर्मी बारिश जिसको झुका नहीं पायी
मजबूरी में अकड़ा हुआ है वो गरीब आदमी

इस झूठी लोकशाही में अपने ही हालात में
क़दम-क़दम रगड़ा हुआ है वो गरीब आदमी

नफरतों के दौर में आज मुहब्बत ढूंढता हुआ
ख्वाबों से भी झगड़ा हुआ है वो गरीब आदमी

इंसानियत ज़िंदा है अभी तक उसके अंदर
यूँ छोटा नहीं, बड़ा हुआ है वो गरीब आदमी

ये दुनिया उसे कभी कहीं देख ही नहीं पाती
खजाने सा कहीं गढ़ा हुआ है वो गरीब आदमी

जो नहीं कर पाता है मज़हब में फ़र्क़ कोई
संविधान सा खड़ा हुआ है वो गरीब आदमी

बुधवार, 20 दिसंबर 2017

रोती रही

बेमौसम बरसात कल होती रही
हँसती रही दुनिया मैं रोती रही
खुद को अश्क़ों से भिगोती रही
हँसती रही दुनिया मैं रोती रही

लम्हा लम्हा तुझको ही याद करूँ
तुझसे मिलने की मैं फ़रियाद करूँ
तेरे साथ ही अब मेरा जीना मरना
तेरे बिन मुझको अब क्या करना
तेरे साथ के ख्वाब संजोती रही
हँसती रही दुनिया मैं रोती रही

मेरे होंठों पर तेरा ही नाम सनम
करूँ मैं तेरी बातें दिन रात सनम
तुझसे मिलने को दिल मेरा तरसे
तेरे बिन ये दिल रोये आँखें बरसे
तुझ बिन न जागी न सोती रही
हँसती रही दुनिया मैं रोती रही

बेमौसम बरसात कल होती रही
हँसती रही दुनिया मैं सोती रही

मंगलवार, 5 दिसंबर 2017

मेरी मुहब्बत

कुछ ख़तों के जवाब लिख दूँ
आज तुमको गुलाब लिख दूँ
मैंने मुहब्बत में जो था देखा
मेरी आँखों का ख्वाब लिख दूँ

जाने कितनी रातें गुजारीं हैं
न जाने कितने दिन हैं बीते
मुहब्बत का ये खेल है ऐसा
इसमें न हम हारे न ही जीते
दिल पर नशा चढ़ने लगा है
तीखी कोई शराब लिख दूँ
कुछ ख़तों के जवाब लिख दूँ
आज तुमको गुलाब लिख दूँ

ये दुनिया है भूल भुलैया
इसमें मैं कहीं खो न जाऊँ
मुझको अब तुम ही संभालो
तुम बिन मैं अब जी न पाऊँ
आखिर कैसे तुमसे कहूँ मैं
मेरी हालत खराब लिख दूँ
कुछ ख़तों के जवाब लिख दूँ
आज तुमको गुलाब लिख दूँ
मैंने मुहब्बत में जो था देखा
मेरी आँखों का ख्वाब लिख दूँ

तेरा इंतज़ार है

राहों पर नज़रें हैं
दिल बेक़रार है
तेरा इंतज़ार है
तेरा इंतज़ार है

लम्हे जुदाई के
अब सह नहीं पाऊँ
डरता हूँ अब मैं कि
यूँ ही न मर जाऊँ
तुझमें सुकून मेरा
तुझमें क़रार है
राहों पे नज़रें हैं
दिल बेक़रार है
तेरा इंतज़ार है
तेरा इंतज़ार है

कैसे बताऊँ तुझे
हाल क्या है मेरा
मेरी आँखों में है
अब इंतज़ार तेरा
तेरा ही नाम दिल
पुकारे बार बार है
तेरे ही साथ जीत
तेरे बिन हार है
तेरा इंतज़ार है
तेरा इंतज़ार है

शनिवार, 25 नवंबर 2017

राम भरोसे

अंधे लड़ने को तैयार
गूंगे चला रहे सरकार
चलो भई राम भरोसे
वो सत्ता के ठेकेदार
क़त्ल करने को तैयार
चलो भई राम भरोसे

उनके हाथ में ताक़त है
अपनी भी खिलाफत है
हम सच के साथ खड़े
उनके लिए बग़ावत है
सत्ता ही है मंज़िल उनकी
जनता है बस सीढ़ी भाई
राम नाम की लूट मचा के
बन गए धर्म के पहरेदार
चलो भई राम भरोसे

उन्नति की बातें हैं उनकी
अवनति वो देश की करते
ईमानदारी भी मरी पड़ी है
सच्चाई भी कहीं गढ़ी है
रेडियो उनका टीवी उनकी
सभी जगह मिट्टी पड़ी है
तिरंगे को भी बनाया है
हत्यारों ने अब हथियार
चलो भई राम भरोसे

गाँधी के इस मुल्क की देखो
कैसी हालत आज बनाई
जिनको रक्षा सौंपी हमने
उन लोगों ने आग लगाई
मरते हिन्दू और मुसलमान
चलती नेता जी की दुकान
खुद तो बन जाते हैं महान
देश का कर दिया बंटाधार
चलो भई राम भरोसे
चलो भई राम भरोसे

लिख दूँ


क्या इश्क़ का सैलाब लिख दूँ मैं
या फिर कोई इंक़लाब लिख दूँ मैं

तमाम नफरतों को कर के रुसवा
मुहब्बत की इक किताब लिख दूँ मैं

बड़ा मुश्किल है यादों को संभालना
पन्नों में छिपा के गुलाब लिख दूँ मैं

दरिया में उतरता और चढ़ता रहा
मेरे इन अश्क़ों को आब लिख दूँ मैं

ज़िन्दगी गुलज़ार हो गयी तुझ से
तेरे चेहरे को आफ़ताब लिख दूँ मैं

जब भी देखूँ नशे में डूब जाता हूँ
तेरी आँखों को शराब लिख दूँ मैं

रोज तुझे पाने की नयी जद्दोज़हद
मुहब्बत में ये हिसाब लिख दूँ मैं

रविवार, 22 अक्टूबर 2017

लाडो

(माँ अपनी भूख से मरती बच्ची से)
उठ मेरी लाडो कि सबेरा आने लगा है
उठ मेरी लाडो गम फिर से छाने लगा है
उठ मेरी लाडो कि तेरी माँ रोने लगी है
उठ मेरी लाडो कि वो होश खोने लगी है
उठ मेरी लाडो अब तो उठ मेरी लाडो

स्कूल खुल गए हैं तुझे पढ़ने जाना है
पढ़ लिख कर तुझे अफसर बन जाना है
घर में भूख न मिटी तो अब तू गम न कर
तुझको मिलेगा खाना तू उम्मीद कम न कर
तुझे भूखी देख कर मैं कहाँ रह पाती हूँ
लेकिन क्या करूँ गरीबी से हार जाती हूँ
उठ मेरी लाडो मुल्क़ में नयी सरकार है
अच्छे दिनों का अब सबको इंतज़ार है
लक्ष्मी, इंदिरा, कल्पना सा चमकना है तुझे
बस थोड़ी देर और भूख से लड़ना है तुझे
आखिर कब तक तू भात भात चिल्लायेगी
रहने दे बेटा थोड़ी देर में भूख मर जायेगी

(मरती हुई बच्ची अपनी माँ से)
माई अब मुझसे कुछ भी सहा नहीं जाता
कई दिन से भूखी हूँ और रहा नहीं जाता
राशन नहीं मिला क्योंकि नहीं आधार है
हम गरीबों पर अब ये नया अत्याचार है
जाति धर्म का न जाने कैसा ताना बाना है
भात माँगते हुए मुझे भूखा मर जाना है
डिजिटल इंडिया है यही नया भारत है
हम गरीबों की तो अब किसको जरूरत है
शायद ये वक्त है माई देशभक्ति दिखाने का
चंद चावल के बदले भूखी ही मर जाने का
नाम संतोषी मेरा किंतु संतोष होता नहीं है
कौन सा बच्चा है जो भूख से रोता नहीं है

(माँ अपनी मर चुकी बच्ची से)
उठ जा लाडो कि राशन हमको मिलेगा नहीं
तू अगर नही लड़ेगी तो कुछ बदलेगा नहीं
तू अपनी बंद आँखों को अब तो खोल दे
मुझसे नहीं अब तू इस जमाने को बोल दे
तू जो मर गयी तो मुझ पे क्या बीती जायेगी
तुझे मलेरिया से मरा दिखा सरकार बच जायेगी
इसी गाँव में फिर तेरी माँ ही घसीटी जायेगी
गाँव की बदनामी के डर से वो पीटी जायेगी
उठ जा लाडो कि तेरी माँ को तेरी दरकार है
खाना नहीं है लेकिन दिल में बेहद प्यार है
उठ जा लाडो अब तो तू उठ जा लाडो
अपनी माँ की खातिर फिर मुस्कुरा लाडो

शुक्रवार, 20 अक्टूबर 2017

आदमी

हँसता भी आदमी तो रोता भी आदमी
सब कुछ पाकर कुछ खोता भी आदमी

जाने किस सोच में डूबा डूबा रहता है
अपनी सोच में ही क्या होता है आदमी

अनजान रास्तों पर डर डर के निकलना
वही काटता है जो खुद बोता है आदमी

कहता भी नहीं और चुप रहता भी नहीं
जैसे जागते जागते ही सोता है आदमी

खुद को मंज़िल पर जाने की जल्दी नहीं
कोई और आगे चले तो रोता है आदमी

गुरुवार, 19 अक्टूबर 2017

और गरीबी मर गयी

"और गरीबी मर गयी"

कितने ही वर्षों से भारत की विकराल समस्या बनी हुई थी गरीबी। नई नई योजनाएँ गरीबी को खत्म करने के लिए लायी जाती रहीं लेकिन गरीबी तो सुरसा के मुख की तरह बढ़ती ही जाती थी। वहीं दूसरी ओर चंद अमीर लोगों की संपत्ति इसी अनुपात में तेजी से बढ़ती जाती रही। हम सही मायनों में हिंदुस्तान को दो अलग अलग रूप में देखते रहे। एक ओर जहाँ विकास की राह पर अग्रसर धनवान होता इंडिया तो वहीं दो वक्त की रोटी को मोहताज़ गरीब भारत। सरकार जब कुछ न कर सकी तो आंकड़ों का खेल खेलना शुरू कर दिया। इसी आँकड़े के कारण ही तो 32 रुपये से अधिक खर्च करने वाले एक झटके में अमीर बन गये। उफ्फ। इतनी तेजी से इस प्रक्रिया से गरीब को अमीर बनाने की कोशिश शुरू हो गयी। आखिर उभरते भारत की नई तस्वीर जो दुनिया को दिखानी थी। अब जब तस्वीर दिखानी हो किसी को तो खूबसूरत ही दिखायेगा। कोई दाग धब्बे वाली तस्वीर कैसे कोई दिखा सकता है। शर्म आती है। और गरीबी तो सबसे बड़ा दाग है देश के ऊपर।

खैर! गरीब कम हुए लेकिन खत्म फिर भी नहीं हुए।
लेकिन सरकार के हाथ आँकड़े से भी बड़ा हथियार आ गया। वो था "आधार"। जो कहने के लिए तो सिर्फ एक कागज का टुकड़ा ही था लेकिन कागज़ी काम में सरकारें हमेशा अच्छी होती हैं। ईमानदार और स्वच्छ होती हैं सभी सरकारें कागजों में। उसी तरह ये कागज़ के टुकड़ा भी हो गया ईमानदार और स्वच्छ। इसकी मिसाल दूँ अगर तो यही कहूँगा कि एक विपक्षी पार्टी जो पहले इसका पुरजोर विरोध करती थी सरकार में आते ही इसे भारत का भविष्य बना दिया। ऐसा कागज़ जो लोगों के अस्तित्व का ही "आधार" बना दिया गया। जिसके पास है वो इंसान है जिसके पास नहीं वो जानवर, ओह्ह!! माफ करना अब तो जानवरों के लिए भी आधार जरूरी हो गया है, जानवर से भी गिरा हुआ कोई कीट होगा बिना "आधार" वाला क्योंकि सरकार की नज़र में "जिसके पास आधार नहीं, उसका कोई आधार नहीं। अजीब है न? लेकिन जरूरी है क्योंकि अब आपके पास कुछ हो या न हो लेकिन आधार जरूर होना चाहिये। मैंने तो बनवा लिया बहुत पहले ही। क्या पता किसी दिन सरकार आधार न रखने वालों को देशद्रोही बोलकर देशनिकाला दे दे। कहाँ जायेंगे हम जैसे लोग फिर? हमको तो बैंक लोन भी नहीं देते कि इंग्लैंड या अमेरिका में जाकर व्यापारी बन जायें या पार्टी करते हुए ज़िन्दगी गुज़ारें। ये हक़ सिर्फ बड़े उद्योगपतियों (जिनको लोन की जरूरत नहीं) या देश के सम्माननीय नेताओं को है। या फिर ऐसे नेता पुत्रों को जिनको आसानी से बिना व्यापार किये लोन मिल जाता है और जब कोई ये सवाल उठाता है तो सरकारी बचाव शुरू हो जाता है।

आप लोग सोच रहे होंगें कि आज मैं कहाँ "आधार" की गैर जरूरी बात लेकर बैठ गया। लेकिन आप भूल गये कि अब "आधार" ही हर बात का "आधार" है। भई। कल एक ख़बर सुनी मैनें तो समझ में आया कि "आधार" ऐसा हथियार बना दिया सरकार ने जिससे सारी समस्याओं को मारा जा सकता है।

झारखंड की 11 वर्षीय लड़की संतोषी भूख से तड़प कर मर गयी। सरकारी राशन सिर्फ आधार न होने की वजह से नहीं मिला। 28 सितंबर की ये घटना 10 अक्टूबर के बाद मीडिया में आयी। ये मीडिया की विश्वसनीयता की मौत थी। आज इंसान की कीमत कागज़ के टुकड़े से भी कम हो गयी है। क्या यही "न्यू इंडिया" है? ऐसा न्यू इंडिया, जहाँ गरीबों के लिए कोई जगह नहीं? जहाँ असहमति के लिए कोई जगह नहीं? जहाँ समरसता के लिए कोई जगह नहीं? जहाँ एकता और सद्भाव के लिए कोई जगह नहीं? अगर जगह है तो सिर्फ नेताओं की भक्ति के लिए। या फिर झूठे वादे और सपने दिखाने के लिए। बस उन्हीं झूठे वादों की ढपली बजाकर कीर्तन करते रहना होगा। 11 वर्षीय संतोषी जो आज की गरीबी का नया चेहरा कही जा सकती है, उनके परिवार का आधार न बनने की वजह से राशन की लिस्ट में से उनका नाम काट दिया गया। छुट्टियाँ होने की वजह से स्कूल का मिड डे मील भी नहीं मिल सका। उसकी माँ ने बताया कि आखिरी वक्त वो भात भात चिल्ला रही थी। लेकिन जिस देश को चलाने वाले झूठे वादों और आश्वासनों के सहारे सत्ता पर आसीन होते हैं उसी देश की एक मजबूर गरीब माँ अपनी भूख से मरती बेटी को झूठे वादे के सहारे ज़िंदा न रख पायी। भात भात चिल्लाते हुए ही संतोषी की मौत हो गयी। लेकिन मुझे लगा कि वो संतोषी नहीं थी। वो गरीबी थी जो उम्मीदों का इंतज़ार करते करते हार गयी और भूखी ही मौत की नींद में सो गयी। क्या कोई बता सकता है कि मरने के बाद भूख परेशान तो नहीं करती होगी? आखिर वो गरीबी ही थी जो उस रोज मारी गयी हमारी व्यवस्था के कारण।

लेकिन असल कार्यवाई उसके बाद शुरू हुई सरकार की और सारा तंत्र उस भूख से हुई मौत को नकार कर उसे मलेरिया से हुई मौत बनाने में जुट गया। गाँव ने भी अच्छा साथ दिया व्यवस्था का और संतोषी की माँ को मार पीट कर गाँव से बाहर निकाल दिया गया। उसकी वजह से बदनामी जो हुई थी गाँव की।

जो गरीबी 70 साल में खत्म न हो सकी अब वो मर रही है। कहीं तो अस्पतालों में ऑक्सीजन की कमी से मर रही है। कहीं भूख से मर रही है या फिर कहीं पर धर्म या मज़हब या फिर गाय के नाम पर सरेआम उसका क़त्ल किया जा रहा है। सरकारों का मुख्य मुद्दा तो गरीबी खत्म करना ही है फिर चाहे उसके लिए गरीबों को ही क्यों न मारना पड़े। न रहेंगे गरीब और न रहेगी गरीबी।

बुलेट ट्रेन वाले देश में आखिर क्या काम है गरीबों का? जहाँ सिर्फ चुनाव प्रचार पर हज़ारों करोड़ खर्च किये जाते हों वहाँ कोई गरीब होना भी नहीं चाहिये। अगर गरीब होंगे तो सरकार को गरीबों को खत्म करना पड़ेगा। ऐसे ही रोज हज़ारों गरीबी मारी जायेंगी और हम ये ही कहते रहेंगे कि "और गरीबी मर गयी" ।
- हिमांशु

गुरुवार, 5 अक्टूबर 2017

लोकतंत्र रो रहा होगा

तिरंगा सिसक रहा होगा
लोकतंत्र रो रहा होगा
जब संसद में कोई अपराधी
पोर्न देख रहा होगा
या चैन से सो रहा होगा

इक तरफ मुल्क में
गरीबी है और लाचारी है
वहीं हमारे नेताओं को
पैसे खाने की बीमारी है
जहाँ कोई गरीब का बच्चा
पैसे की कमी से मर रहा होगा
और अमीर सरकारी खर्चे पर
मौज मस्ती कर रहा होगा
तिरंगा सिसक रहा होगा
लोकतंत्र रो रहा होगा

जब धर्मों के चक्कर में लोग
इक दूसरे को मारेंगे
जब सत्ता के नशे में लोग
कलम पर तलवार उतारेंगे
सीमा पर खड़ा जवान जब
भूख से मर रहा होगा
खेतों में कोई मजबूर किसान
खुदख़ुशी कर रहा होगा
तिरंगा सिसक रहा होगा
लोकतंत्र रो रहा होगा

सीता, राधा, द्रोपदी, दुर्गा
सड़क पर लूटी जायेंगी
अपने हक़ में लड़ती छात्रायें
कॉलेज में जब पीटी जायेंगी
क़त्ल करने के बाद जब क़ातिल
वंदे मातरम कह रहा होगा
देशभक्ति के नाम कोई गुंडागर्दी
खुलेआम कर रहा होगा
तिरंगा सिसक रहा होगा
लोकतंत्र रो रहा होगा

आप जब शाम को घर में
चैन से रोटी खायेंगे
मुल्क के हालात पर गुस्से में
टीवी चैनल बदलते जायेंगे
सब कुछ देख कर भी जब
आपका खून नही खौलेगा
या नेताओं की भक्ति में आपका
दिल सच झूठ नहीं तौलेगा
तब
तिरंगा सिसक रहा होगा
लोकतंत्र रो रहा होगा

शनिवार, 30 सितंबर 2017

हाल ए दिल

कैसा हाल ए दिल हुआ
कहना भी मुश्किल हुआ
लफ़्ज़ों से है अब दूरी
मुहब्बत का हाँसिल हुआ

तुझको सोचूँ चाहूँ मैं
लेकिन न कह पाऊँ मैं
ये जुदाई की अगन है
तुझ बिन न रह पाऊँ मैं
ख्याल हज़ारों तेरे संग
आज रंगी मैं तेरे रंग
तू जैसे डोर मेरी है
मैं बनी तेरी पतंग
क्या क्या करूँ मैं
कैसे अब रहूँ मैं
कैसा हाल ए दिल हुआ
कहना भी मुश्किल हुआ

पल पल दिल बैचेन रहे
कुछ कहे कभी चुप रहे
लाखों जतन करती मैं
तुझमें जीती मरती मैं
लम्हा लम्हा ज़िन्दगी तू
तू है खुदा और बंदगी तू
इक दिन तुझमें खो जाऊँ
मैं तो बस तेरी हो जाऊँ
तुझको मांगा रब से मैंने
वक़्त वही क़बूल हुआ
कैसा हाल ए दिल हुआ
कहना भी मुश्किल हुआ

शुक्रवार, 22 सितंबर 2017

मृत्यु आलिंगन

जीवन का आधार
आत्मा का है सार
हमेशा आसपास है
मृत्यु का आभास है
मृत्यु सम्पूर्ण है

जीवन की उत्पत्ति से
प्रेम भाव और भक्ति से
काल्पनिक भय से
या अंतर्मन की शक्ति से
इसका अटूट बंधन है
ये मृत्यु का आलिंगन है
मृत्यु सम्पूर्ण है

अनसुलझा प्रश्न है
क्या होती है मृत्यु
देह का मिटना
साँस का रुकना
हृदय का थमना
स्मृति खत्म होना
या दृश्यता समाप्त होना
अकल्पनीय एहसास है
जिसके बाद
कुछ नहीं होता
कोई नहीं हँसता
कोई नहीं रोता
मृत्यु सम्पूर्ण है

आज आभासी है
मुझको मेरी मृत्यु
आज प्रश्न सुलझाऊँगा
मृत्यु के भेद दिखाऊँगा
घनघोर स्मृति के जंगल में
आज विचर रहा हूँ मैं
मृत्यु के आभास से
सज संवर रहा हूँ मैं

थोड़ी सी घबराहट भी है
जैसे पिय से प्रथम मिलन हो
आत्मा नग्न होने को आतुर
इस ज़िस्म रूपी कपड़े से
अवरूद्ध आज मेरा मन हो
क्या होगा जब मृत्यु
मुझको आलिंगन में भरेगी
क्या होगी अनुभूति वो
जो हृदय बिन बहेगी
क्या उत्तेजना का
आभास कर पाउँगा
अथवा मृत्यु पिय के अधरों
पर बिछ जाऊँगा

ओह्ह
पिय मिलन का समय हुआ
अब अनुमति दे दो मुझको
रोकना भी चाहूँ तो
रोक सकूँगा न खुद को
हृदय स्पन्दन मंद हो रहा
स्मृति में अंतर्द्वंद हो रहा
समाप्त हो रही स्मृति
जैसे रीत रहा हो गागर
प्यास मिलन की बढ़ती जाये
जैसे निकट आता जाये सागर
आँखों के सामने जो दृश्य हैं
अब धुंधले से हो रहे हैं
जाने क्यों लोग आसपास
खड़े खड़े रो रहे हैं
अब सुन नही रहा हूँ मैं कुछ
इक खामोशी चारों ओर है
रोशनी अब नहीं कोई
अंधकार का न कोई छोर है
अब मेरा आभास भी
मिटने लगा है
दृश्य समाप्त
ध्वनि समाप्त
हृदय स्पन्दन और
स्मृति समाप्त
शांति की अनुभूति है
जो मिटने लगी है अब
अब साथ छोड़ रहे
अभ्यास अनुभूति सब
अब बस बात खत्म करूँ
कुछ न कह पाउँगा
दिख नहीं रहा कुछ भी
कुछ नहीं समझ पा रहा
शायद मुक्त हुआ हूँ अब
जीवन मरण के बंधन से
इक नई शुरुआत हुई है
मृत्यु के आलिंगन से
सब कुछ छूट गया है पीछे
न कुछ ऊपर न कुछ नीचे
अब न कुछ आसपास है
मेरा मुझको न आभास है
आज समझ सका हूँ
खुद से अब न दूरी है
मृत्यु बहुत जरूरी है
मृत्यु बहुत जरूरी है
अब मैं नहीं हूँ कहीं
अब जो है वो बस...............