(माँ अपनी भूख से मरती बच्ची से)
उठ मेरी लाडो कि सबेरा आने लगा है
उठ मेरी लाडो गम फिर से छाने लगा है
उठ मेरी लाडो कि तेरी माँ रोने लगी है
उठ मेरी लाडो कि वो होश खोने लगी है
उठ मेरी लाडो अब तो उठ मेरी लाडो
स्कूल खुल गए हैं तुझे पढ़ने जाना है
पढ़ लिख कर तुझे अफसर बन जाना है
घर में भूख न मिटी तो अब तू गम न कर
तुझको मिलेगा खाना तू उम्मीद कम न कर
तुझे भूखी देख कर मैं कहाँ रह पाती हूँ
लेकिन क्या करूँ गरीबी से हार जाती हूँ
उठ मेरी लाडो मुल्क़ में नयी सरकार है
अच्छे दिनों का अब सबको इंतज़ार है
लक्ष्मी, इंदिरा, कल्पना सा चमकना है तुझे
बस थोड़ी देर और भूख से लड़ना है तुझे
आखिर कब तक तू भात भात चिल्लायेगी
रहने दे बेटा थोड़ी देर में भूख मर जायेगी
(मरती हुई बच्ची अपनी माँ से)
माई अब मुझसे कुछ भी सहा नहीं जाता
कई दिन से भूखी हूँ और रहा नहीं जाता
राशन नहीं मिला क्योंकि नहीं आधार है
हम गरीबों पर अब ये नया अत्याचार है
जाति धर्म का न जाने कैसा ताना बाना है
भात माँगते हुए मुझे भूखा मर जाना है
डिजिटल इंडिया है यही नया भारत है
हम गरीबों की तो अब किसको जरूरत है
शायद ये वक्त है माई देशभक्ति दिखाने का
चंद चावल के बदले भूखी ही मर जाने का
नाम संतोषी मेरा किंतु संतोष होता नहीं है
कौन सा बच्चा है जो भूख से रोता नहीं है
(माँ अपनी मर चुकी बच्ची से)
उठ जा लाडो कि राशन हमको मिलेगा नहीं
तू अगर नही लड़ेगी तो कुछ बदलेगा नहीं
तू अपनी बंद आँखों को अब तो खोल दे
मुझसे नहीं अब तू इस जमाने को बोल दे
तू जो मर गयी तो मुझ पे क्या बीती जायेगी
तुझे मलेरिया से मरा दिखा सरकार बच जायेगी
इसी गाँव में फिर तेरी माँ ही घसीटी जायेगी
गाँव की बदनामी के डर से वो पीटी जायेगी
उठ जा लाडो कि तेरी माँ को तेरी दरकार है
खाना नहीं है लेकिन दिल में बेहद प्यार है
उठ जा लाडो अब तो तू उठ जा लाडो
अपनी माँ की खातिर फिर मुस्कुरा लाडो
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