रविवार, 24 जुलाई 2016

"सुकून"

तेरी निगाहों में सुकून मैंने पाया
जब से है तुझको ज़िंदगानी बनाया
मुहब्बत की राहों पे जो हम चले
मेरे आशियाने को जो तूने सजाया
तेरी निगाहों में सुकून जो मैंने पाया

खुशनुमा रात और तेरा साथ
हो चांदनी और तेरी बात
खुशनुमा रात और तेरा साथ
हो चांदनी और तेरी बात
मेरी जान तू ही आज मुझमे समाया
जब से है तुझको ज़िंदगानी बनाया
तेरी निगाहों में सुकूँ जो मैंने पाया
जब से है तुझको ज़िंदगानी बनाया

सारी दुनिया मैं छोड़ दूँ
तू कहे तो रुख मोड़ लूँ
साड़ी दुनिया मैं छोड़ दूँ
तू कहे तो रुख मोड़ लूँ
इन ख़्वाहिशों को मैंने यूँ ही जगाया
ये ख्वाब मैंने पलकों पे सजाया
तेरी निगाहों में सुकूँ मैंने पाया
जब से है तुझको ज़िंदगानी बनाया
मुहब्बत की राहों पे जो हम चले
मेरे आशियाने को जो तूने सजाया
तेरी निगाहों में सुकून मैंने पाया

"रोना चाहता हूँ"

हाँ आज मैं रोना चाहता हूँ
आज मैं खुद खोना चाहता हूँ
तन्हा होकर जो सीखा मैंने
उन यादों को पिरोना चाहता हूँ
हाँ आज मैं रोना चाहता हूँ

जाने क्यों रूठे हैं सब मुझसे
जाने क्यों कुछ कहते नहीं हैं
जो मैं सहता हूँ दर्द हर रोज़
वो ऐसा क्यों सहते नहीं हैं
मैं भी उनके जैसा होना चाहता हूँ
हाँ आज मैं रोना चाहता हूँ

अब कोई मुझे मनाने नहीं आता
वो साथ हैं ये बताने नहीं आता
क्या खता मैंने की ज़माने भर से
क्यों मुझको समझाने नहीं आता
मैं मौत की बाँहों में सोना चाहता हूँ
हाँ आज मैं रोना चाहता हूँ

                                                     






"बात कर"

ज़रा गुफ़्तगू कर यूँ ना तक़रार की बात कर
सबके गम देख तू ना दो चार की बात कर

मयकशीं का मौसम अभी तलक़ गुजरा नहीं
जाम हाथ में उठा और तक़रार की बात कर

रख दे नफरत को इक तरफ कुछ देर को
बरसों से रूठे हुए उस यार की बात कर

जो दिख रहा है ज़माने में मज़बूत सा आदमी
उसके दिल छुपी किसी दरार की बात कर

चंद सिक्कों से अब गुज़ारा मुमकिन नहीं होता
खजाना खोल फिर लाख हज़ार की बात कर

मैं देखता हूँ तो हर शख़्स रूठा हुआ सा है
उसके गले मिलकर फिर प्यार की बात कर

ज़िन्दगी चार दिन की है जो यूँ ही गुज़र गयी
जो रह जानी है पीछे उस बहार की बात कर

ज़रा गुफ़्तगू कर यूँ ना तक़रार की बात कर
सबके गम देख तू ना दो चार की बात कर
                         
        

रविवार, 17 जुलाई 2016

स्पर्श

मुझे याद है
वो पहला स्पर्श
जो तुझसे मिला
तब दुनिया दिखी

मुझे याद है
वो पहला स्पर्श
जब तूने सबसे मिलवाया
अंजान था सभी के लिए मैं
तूने ही जीना सिखाया

मुझे याद है
वो पहला स्पर्श
जब तेरा हाथ
मेरे सर पर आया
जब रोया था मैं
कलेजे से लगाकर
तूने सुकूँ दिलाया

मुझे याद है
वो पहला स्पर्श
तूने संभाला मुझे
सहारा दिया
जब भी गिरा
मुझको उठाया

आज भी तरसता हूँ
फिर से उसी स्पर्श के लिए
मैं यहीं हूँ
लेकिन तू कहाँ है
देख मैं फिर रो रहा हूँ
फिर से गिर गया हूँ
डर भी लगता है
आ संभाल ले मुझे
और दे दे फिर वही
सुकूँ से भरा हुआ
तेरा पहला स्पर्श
    -"इश्क़"




गुरुवार, 7 जुलाई 2016

बेटी

मैं छोटी सी बच्ची हूँ हँसती खेलती गाती हूँ
कभी यहाँ तो कभी वहाँ दौड़ती भागती जाती हूँ

मम्मी की मैं हूँ लाड़ली पापा की भी परी हूँ मैं
कभी कभी तो प्यार से भैया से भी लड़ी हूँ मैं

दुनिया की सारी सुंदरता मुझमें ही तो समायी है
अपने घर की खुशियाँ मैंने ही मुस्कान से सजाई है

लेकिन कुछ शैतान आजकल मुझे क्यों सताने आते हैं
मेरी आखिर क्या गलती है जो वो मुझे रुलाने आते हैं

उनका बार बार छूना मुझको बहुत ही गन्दा लगता है
उनके आसपास रहना जैसे पिंजड़े में परिंदा लगता है

मम्मी को जब बतलाती हूँ मेरी बात नहीं समझती हैं
पापा को भी मेरी तक़लीफ़ जाने क्यूँ नहीं दिखती है

किसको अपनी व्यथा सुनाऊँ कैसे अपना दर्द दिखाऊँ
कभी कभी तो लगता है कि मैं दुनिया को ही छोड़ जाऊँ

वो शैतान हर जगह पर मुझको हमेशा ही दिखते हैं
स्कूल बाज़ार या आसपास में घूमते फिरते से लगते हैं

कभी कभी घर पर भी वो चाचा मामा बन कर आते हैं
लाड़ करने के बहाने मुझको वो गलत तरह छू जाते हैं

मम्मी गोदी में आज छुपाओ इन शैतानों से मुझे बचाओ
पापा आप तो मेरे हीरो हो इन शैतानों को मार भगाओ

इन लोगों ने दुनिया को बहुत ख़राब कर रखा है
आज़ादी से मेरे जीने को अधूरा ख्वाब कर रखा है

जब तक यहाँ पर बेटी को यूँ ही सताया जायेगा
चाहे जितनी पूजा कर लो रामराज कभी ना आएगा

क्योंकि

लोग पूजते हैं देवियाँ और बेटियाँ दुत्कारते
कुछ नौंचते हैं सड़क पर तो कुछ गर्भ में ही मारते