रविवार, 22 अक्टूबर 2017

लाडो

(माँ अपनी भूख से मरती बच्ची से)
उठ मेरी लाडो कि सबेरा आने लगा है
उठ मेरी लाडो गम फिर से छाने लगा है
उठ मेरी लाडो कि तेरी माँ रोने लगी है
उठ मेरी लाडो कि वो होश खोने लगी है
उठ मेरी लाडो अब तो उठ मेरी लाडो

स्कूल खुल गए हैं तुझे पढ़ने जाना है
पढ़ लिख कर तुझे अफसर बन जाना है
घर में भूख न मिटी तो अब तू गम न कर
तुझको मिलेगा खाना तू उम्मीद कम न कर
तुझे भूखी देख कर मैं कहाँ रह पाती हूँ
लेकिन क्या करूँ गरीबी से हार जाती हूँ
उठ मेरी लाडो मुल्क़ में नयी सरकार है
अच्छे दिनों का अब सबको इंतज़ार है
लक्ष्मी, इंदिरा, कल्पना सा चमकना है तुझे
बस थोड़ी देर और भूख से लड़ना है तुझे
आखिर कब तक तू भात भात चिल्लायेगी
रहने दे बेटा थोड़ी देर में भूख मर जायेगी

(मरती हुई बच्ची अपनी माँ से)
माई अब मुझसे कुछ भी सहा नहीं जाता
कई दिन से भूखी हूँ और रहा नहीं जाता
राशन नहीं मिला क्योंकि नहीं आधार है
हम गरीबों पर अब ये नया अत्याचार है
जाति धर्म का न जाने कैसा ताना बाना है
भात माँगते हुए मुझे भूखा मर जाना है
डिजिटल इंडिया है यही नया भारत है
हम गरीबों की तो अब किसको जरूरत है
शायद ये वक्त है माई देशभक्ति दिखाने का
चंद चावल के बदले भूखी ही मर जाने का
नाम संतोषी मेरा किंतु संतोष होता नहीं है
कौन सा बच्चा है जो भूख से रोता नहीं है

(माँ अपनी मर चुकी बच्ची से)
उठ जा लाडो कि राशन हमको मिलेगा नहीं
तू अगर नही लड़ेगी तो कुछ बदलेगा नहीं
तू अपनी बंद आँखों को अब तो खोल दे
मुझसे नहीं अब तू इस जमाने को बोल दे
तू जो मर गयी तो मुझ पे क्या बीती जायेगी
तुझे मलेरिया से मरा दिखा सरकार बच जायेगी
इसी गाँव में फिर तेरी माँ ही घसीटी जायेगी
गाँव की बदनामी के डर से वो पीटी जायेगी
उठ जा लाडो कि तेरी माँ को तेरी दरकार है
खाना नहीं है लेकिन दिल में बेहद प्यार है
उठ जा लाडो अब तो तू उठ जा लाडो
अपनी माँ की खातिर फिर मुस्कुरा लाडो

शुक्रवार, 20 अक्टूबर 2017

आदमी

हँसता भी आदमी तो रोता भी आदमी
सब कुछ पाकर कुछ खोता भी आदमी

जाने किस सोच में डूबा डूबा रहता है
अपनी सोच में ही क्या होता है आदमी

अनजान रास्तों पर डर डर के निकलना
वही काटता है जो खुद बोता है आदमी

कहता भी नहीं और चुप रहता भी नहीं
जैसे जागते जागते ही सोता है आदमी

खुद को मंज़िल पर जाने की जल्दी नहीं
कोई और आगे चले तो रोता है आदमी

गुरुवार, 19 अक्टूबर 2017

और गरीबी मर गयी

"और गरीबी मर गयी"

कितने ही वर्षों से भारत की विकराल समस्या बनी हुई थी गरीबी। नई नई योजनाएँ गरीबी को खत्म करने के लिए लायी जाती रहीं लेकिन गरीबी तो सुरसा के मुख की तरह बढ़ती ही जाती थी। वहीं दूसरी ओर चंद अमीर लोगों की संपत्ति इसी अनुपात में तेजी से बढ़ती जाती रही। हम सही मायनों में हिंदुस्तान को दो अलग अलग रूप में देखते रहे। एक ओर जहाँ विकास की राह पर अग्रसर धनवान होता इंडिया तो वहीं दो वक्त की रोटी को मोहताज़ गरीब भारत। सरकार जब कुछ न कर सकी तो आंकड़ों का खेल खेलना शुरू कर दिया। इसी आँकड़े के कारण ही तो 32 रुपये से अधिक खर्च करने वाले एक झटके में अमीर बन गये। उफ्फ। इतनी तेजी से इस प्रक्रिया से गरीब को अमीर बनाने की कोशिश शुरू हो गयी। आखिर उभरते भारत की नई तस्वीर जो दुनिया को दिखानी थी। अब जब तस्वीर दिखानी हो किसी को तो खूबसूरत ही दिखायेगा। कोई दाग धब्बे वाली तस्वीर कैसे कोई दिखा सकता है। शर्म आती है। और गरीबी तो सबसे बड़ा दाग है देश के ऊपर।

खैर! गरीब कम हुए लेकिन खत्म फिर भी नहीं हुए।
लेकिन सरकार के हाथ आँकड़े से भी बड़ा हथियार आ गया। वो था "आधार"। जो कहने के लिए तो सिर्फ एक कागज का टुकड़ा ही था लेकिन कागज़ी काम में सरकारें हमेशा अच्छी होती हैं। ईमानदार और स्वच्छ होती हैं सभी सरकारें कागजों में। उसी तरह ये कागज़ के टुकड़ा भी हो गया ईमानदार और स्वच्छ। इसकी मिसाल दूँ अगर तो यही कहूँगा कि एक विपक्षी पार्टी जो पहले इसका पुरजोर विरोध करती थी सरकार में आते ही इसे भारत का भविष्य बना दिया। ऐसा कागज़ जो लोगों के अस्तित्व का ही "आधार" बना दिया गया। जिसके पास है वो इंसान है जिसके पास नहीं वो जानवर, ओह्ह!! माफ करना अब तो जानवरों के लिए भी आधार जरूरी हो गया है, जानवर से भी गिरा हुआ कोई कीट होगा बिना "आधार" वाला क्योंकि सरकार की नज़र में "जिसके पास आधार नहीं, उसका कोई आधार नहीं। अजीब है न? लेकिन जरूरी है क्योंकि अब आपके पास कुछ हो या न हो लेकिन आधार जरूर होना चाहिये। मैंने तो बनवा लिया बहुत पहले ही। क्या पता किसी दिन सरकार आधार न रखने वालों को देशद्रोही बोलकर देशनिकाला दे दे। कहाँ जायेंगे हम जैसे लोग फिर? हमको तो बैंक लोन भी नहीं देते कि इंग्लैंड या अमेरिका में जाकर व्यापारी बन जायें या पार्टी करते हुए ज़िन्दगी गुज़ारें। ये हक़ सिर्फ बड़े उद्योगपतियों (जिनको लोन की जरूरत नहीं) या देश के सम्माननीय नेताओं को है। या फिर ऐसे नेता पुत्रों को जिनको आसानी से बिना व्यापार किये लोन मिल जाता है और जब कोई ये सवाल उठाता है तो सरकारी बचाव शुरू हो जाता है।

आप लोग सोच रहे होंगें कि आज मैं कहाँ "आधार" की गैर जरूरी बात लेकर बैठ गया। लेकिन आप भूल गये कि अब "आधार" ही हर बात का "आधार" है। भई। कल एक ख़बर सुनी मैनें तो समझ में आया कि "आधार" ऐसा हथियार बना दिया सरकार ने जिससे सारी समस्याओं को मारा जा सकता है।

झारखंड की 11 वर्षीय लड़की संतोषी भूख से तड़प कर मर गयी। सरकारी राशन सिर्फ आधार न होने की वजह से नहीं मिला। 28 सितंबर की ये घटना 10 अक्टूबर के बाद मीडिया में आयी। ये मीडिया की विश्वसनीयता की मौत थी। आज इंसान की कीमत कागज़ के टुकड़े से भी कम हो गयी है। क्या यही "न्यू इंडिया" है? ऐसा न्यू इंडिया, जहाँ गरीबों के लिए कोई जगह नहीं? जहाँ असहमति के लिए कोई जगह नहीं? जहाँ समरसता के लिए कोई जगह नहीं? जहाँ एकता और सद्भाव के लिए कोई जगह नहीं? अगर जगह है तो सिर्फ नेताओं की भक्ति के लिए। या फिर झूठे वादे और सपने दिखाने के लिए। बस उन्हीं झूठे वादों की ढपली बजाकर कीर्तन करते रहना होगा। 11 वर्षीय संतोषी जो आज की गरीबी का नया चेहरा कही जा सकती है, उनके परिवार का आधार न बनने की वजह से राशन की लिस्ट में से उनका नाम काट दिया गया। छुट्टियाँ होने की वजह से स्कूल का मिड डे मील भी नहीं मिल सका। उसकी माँ ने बताया कि आखिरी वक्त वो भात भात चिल्ला रही थी। लेकिन जिस देश को चलाने वाले झूठे वादों और आश्वासनों के सहारे सत्ता पर आसीन होते हैं उसी देश की एक मजबूर गरीब माँ अपनी भूख से मरती बेटी को झूठे वादे के सहारे ज़िंदा न रख पायी। भात भात चिल्लाते हुए ही संतोषी की मौत हो गयी। लेकिन मुझे लगा कि वो संतोषी नहीं थी। वो गरीबी थी जो उम्मीदों का इंतज़ार करते करते हार गयी और भूखी ही मौत की नींद में सो गयी। क्या कोई बता सकता है कि मरने के बाद भूख परेशान तो नहीं करती होगी? आखिर वो गरीबी ही थी जो उस रोज मारी गयी हमारी व्यवस्था के कारण।

लेकिन असल कार्यवाई उसके बाद शुरू हुई सरकार की और सारा तंत्र उस भूख से हुई मौत को नकार कर उसे मलेरिया से हुई मौत बनाने में जुट गया। गाँव ने भी अच्छा साथ दिया व्यवस्था का और संतोषी की माँ को मार पीट कर गाँव से बाहर निकाल दिया गया। उसकी वजह से बदनामी जो हुई थी गाँव की।

जो गरीबी 70 साल में खत्म न हो सकी अब वो मर रही है। कहीं तो अस्पतालों में ऑक्सीजन की कमी से मर रही है। कहीं भूख से मर रही है या फिर कहीं पर धर्म या मज़हब या फिर गाय के नाम पर सरेआम उसका क़त्ल किया जा रहा है। सरकारों का मुख्य मुद्दा तो गरीबी खत्म करना ही है फिर चाहे उसके लिए गरीबों को ही क्यों न मारना पड़े। न रहेंगे गरीब और न रहेगी गरीबी।

बुलेट ट्रेन वाले देश में आखिर क्या काम है गरीबों का? जहाँ सिर्फ चुनाव प्रचार पर हज़ारों करोड़ खर्च किये जाते हों वहाँ कोई गरीब होना भी नहीं चाहिये। अगर गरीब होंगे तो सरकार को गरीबों को खत्म करना पड़ेगा। ऐसे ही रोज हज़ारों गरीबी मारी जायेंगी और हम ये ही कहते रहेंगे कि "और गरीबी मर गयी" ।
- हिमांशु

गुरुवार, 5 अक्टूबर 2017

लोकतंत्र रो रहा होगा

तिरंगा सिसक रहा होगा
लोकतंत्र रो रहा होगा
जब संसद में कोई अपराधी
पोर्न देख रहा होगा
या चैन से सो रहा होगा

इक तरफ मुल्क में
गरीबी है और लाचारी है
वहीं हमारे नेताओं को
पैसे खाने की बीमारी है
जहाँ कोई गरीब का बच्चा
पैसे की कमी से मर रहा होगा
और अमीर सरकारी खर्चे पर
मौज मस्ती कर रहा होगा
तिरंगा सिसक रहा होगा
लोकतंत्र रो रहा होगा

जब धर्मों के चक्कर में लोग
इक दूसरे को मारेंगे
जब सत्ता के नशे में लोग
कलम पर तलवार उतारेंगे
सीमा पर खड़ा जवान जब
भूख से मर रहा होगा
खेतों में कोई मजबूर किसान
खुदख़ुशी कर रहा होगा
तिरंगा सिसक रहा होगा
लोकतंत्र रो रहा होगा

सीता, राधा, द्रोपदी, दुर्गा
सड़क पर लूटी जायेंगी
अपने हक़ में लड़ती छात्रायें
कॉलेज में जब पीटी जायेंगी
क़त्ल करने के बाद जब क़ातिल
वंदे मातरम कह रहा होगा
देशभक्ति के नाम कोई गुंडागर्दी
खुलेआम कर रहा होगा
तिरंगा सिसक रहा होगा
लोकतंत्र रो रहा होगा

आप जब शाम को घर में
चैन से रोटी खायेंगे
मुल्क के हालात पर गुस्से में
टीवी चैनल बदलते जायेंगे
सब कुछ देख कर भी जब
आपका खून नही खौलेगा
या नेताओं की भक्ति में आपका
दिल सच झूठ नहीं तौलेगा
तब
तिरंगा सिसक रहा होगा
लोकतंत्र रो रहा होगा