मैं बंजर सहमी सी दिल्ली
दिन रात वहमी सी दिल्ली
घूमती फिरती मैं तन्हा सी
हूँ ग़लतफ़हमी सी दिल्ली
इक़ ओर आसमान उम्मीदों का
इक़ ओर सूरज तक़लीफ़ों का
कहीं तो चिंता में डूबी हुई सी
कहीं शोर उठता है लतीफों का
पुरानी से लेकर नई तक
चलती रहती सी दिल्ली
मैं बंजर सहमी सी दिल्ली
लाल किले से संसद तक
ख़ामोशी को भी सहती हूँ
और निर्भया को देख कर
अक़्सर चुप ही रहती हूँ
दौड़ती भागती सड़कों पर
दिन रात मरती सी दिल्ली
मैं बंजर सहमी सी दिल्ली
देखा सत्ता के कंगूरों को
चिड़ियाघर में लंगूरों को
मदमस्त अमीरज़ादों को
ताक़त के नशे में चूरों को
ग़रीबों की मजबूरी पर
अक़्सर हँसती सी दिल्ली
मैं बंजर सहमी सी दिल्ली
चौड़ी सड़कें बड़े मकान
इंसान का नहीं कोई निशान
भीड़ में तन्हाई का आलम
पैसा ही सब का भगवान
दौलत के इस ढेर में ही
दबी कुचली सी दिल्ली
मैं बंजर सहमी सी दिल्ली
नेताओं का तो मैं हूँ सराय
जो आये भगवान बन जाये
फिर मुझको लूट खसोट कर
मुझ पर ही वो हँसता जाये
ज़ख्मों के दर्द में अक्सर
हूँ तड़पती सी दिल्ली
मैं बंजर सहमी सी दिल्ली
मेरा भाग्य ही फूटा है
सब ने मिलकर लूटा है
हर कदम पर चलते चलते
यहाँ पर क़ानून टूटा है
अपराधों के जाल में भी
हूँ फँसती सी दिल्ली
मैं बंजर सहमी सी दिल्ली
लेकिन कभी झुकती नहीं हूँ
मिटाना चाहो तो मिटती नहीं हूँ
जनता और सिंहासन की
लड़ाई में पीछे हटती नहीं हूँ
अत्याचार जब भी बढ़ जाये
तो सरकार बदलती सी दिल्ली
मैं बंजर सहमी सी दिल्ली
मैं लोकतंत्र की आस हूँ
मैं जनता का विश्वास हूँ
जनता को जो ताक़त देता
उस संविधान की साँस हूँ
जंतर मंतर से रामलीला तक
जनता के हक़ में लड़ती सी दिल्ली
मैं बंजर सहमी सी दिल्ली
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