एक लाश पड़ी थी बीच में जिसके चारों तरफ मजमा लगा था अलग अलग रंगों का। सभी रंग अपने अपने रंग के अनुसार उस लाश पर अपना हक़ जमा रहे थे। लेकिन जब तफ़सील से लाश के बारे में बताने की बात आती तो सब कन्नी काट जाते थे।
असल में सभी रंग मौका ढूँढ़ रहे थे कि लाश उनकी कौम की मालूम हो जाये तो दूसरे रंग वालों पर इल्ज़ाम लगा सकें और फिर उनकी बस्ती में जाकर अपनी ताक़त की ज़ोर आज़माइश कर सकें।
कानून अपनी आँख पर हमेशा की तरह पट्टी बाँध कर लाश के मुर्दा ज़िस्म का मुआयना कर रहा था। लेकिन उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था। तब तक कानून लिखने और संभालने वाले एक खास रंग को इस लाश का मालिक बनाने के लिए कुछ नए तरीके लिखने लगे।
तभी कानून को मुर्दा ज़िस्म में एक पर्ची मिली जिस पर लाश की पहचान के लिए नाम लिखा था। सिर्फ एक लफ्ज़। "इंसान।"
अब इंसान को किस रंग की तरफ माना जाए। मजमे की सारी बहस इस तरफ मुड़ गयी। अफ़सोसनाक ये था कि लाश जो अब इंसान की थी उस पर कोई रंग भी नहीं दिख रहा था। अब कैसे उस पर रंग चढ़ाया जाए अपने हिसाब का? ये सभी रंगों के लीडर सोचने लगे थे।
ये बिना रंग की लाश उनको तख़्त के पास ले जा सकती थी। जिस पर बैठ कर वो एक अपने रंग की तरफदारी खुल कर कर सकते थे और दूसरे रंगों को डरा धमका या मार कर ख़ामोश करवा सकते थे। लेकिन सवाल वही कि इस मुर्दा इंसान पर रंग चढ़ाएं तो चढ़ाएं कैसे?
तमाम लीडरान को धीरे धीरे ये समझ आ रहा था कि उनको इंसान की नहीं बल्कि मुर्दा ज़िस्म की ज़रूरत थी। एक लाश की ज़रूरत थी। इंसान तो उनके किसी काम का नहीं था। लाश के ऊपर वो सियासत बखूबी कर सकते हैं। दूसरे रंगों को दुश्मन बता कर उनके खात्मे की बात कर सकते हैं। उनके लिए दुनिया की खूबसूरती सिर्फ उनके अपने रंग से थी। उनके हिसाब से बाकी कोई रंग होना ही नहीं चाहिए था।
खैर! वो सब लीडरान समझ गए कि सियासत कैसे करनी है जब रंग नहीं दिख रहा हो। इसलिए वो सभी अपने अपने रंगों को भड़काने में लग गए। आग लगाने की तैयारी शुरू हो गयी थी जिसमें दुश्मन रंगों को जलाकर ख़ाक करना था। सभी रंगों ने एक दूसरे के खिलाफ मोर्चा खोल लिया था। हथियार गोला बारूद जमा किये जाने लगे। कानून अब भी अपनी आँख पर पट्टी बाँध कर उस लाश के पास तसल्लीबख्श बैठा हुआ था।
लाश में कोई ज़ुम्बिश नहीं हो सकती थी। कानून भी अपने हाथ पैर खुद नहीं हिला सकता था। कानून की देखभाल करने वाले अब रंगों में होने वाली लड़ाई के कायदे तय करने में जुट गए। असल में वो भी अपने पसंदीदा रंग को जिताने के लिए उसके मुताबिक़ कायदे बना रहे थे जिससे कि कुछ भी गैरकानूनी न लगे।
इंसान की गैर रंग की लाश अब भी पड़ी थी। वहीं कोई खड़ा हुआ था जो इस माहौल को देख कर खुश था। वो सबके साथ था सिवाय इंसान की लाश के। सभी रंगों का हौसला बढ़ा रहा था वो। सभी रंग उसको अपना मसीहा मानने लगे थे कि वो हमारे साथ है वो हमारे साथ है।
चेहरा बदसूरत था और हाथ खूँ में रंगे हुए थे। अचानक उसकी पॉकेट से एक पर्ची गिरी। जिस पर लिखा हुआ था "शैतान!"
इंसान की बेरंगी लाश अब सड़ने लगी थी। रंग आपस में लड़ना शुरू कर चुके थे। मौतें होना शुरू हो चुकी थी। सब से पहले उन इंसानों को मारा जाने लगा जिन पर या तो कोई रंग नहीं चढ़ा था या फिर जिन पर सभी रंग बराबर चढ़े थे। कानून ख़ामोश बैठा हुआ था। लेकिन धीरे धीरे आपस में लड़ते हुए सभी रंग खत्म होने लगे थे। दुनिया बदरंग होने लगी थी और शैतान....शैतान बस मुस्कुरा रहा था।
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