दर्द निकल रहे हैं खामोशी से
उम्र भर परेशान रहे जिनसे
ज़ख्म पल रहे हैं खामोशी से
इस क़दर नहीं आसाँ मुहब्बत
ख़्वाब बहल रहे हैं ख़ामोशी से
एक से नहीं रहते हालात कभी
आज संभल रहे हैं ख़ामोशी से
अँधेरा यूँ ही नहीं मिटा होगा
चराग जल रहे हैं ख़ामोशी से
उनसे कहो कभी मिलें हमसे
हम पिघल रहे हैं खामोशी से
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें