इश्क़ चढ़ता है तो उतरता ही नहीं
दिल यूँ भी कभी निखरता ही नहीं
जाने कितनी शब गुज़ार देता है यूँ
चाँद चौदहवीं जैसे संवरता ही नहीं
हर बार फिक्र में चाँद थम जाता है
तुम्हारी आह सा पिघलता ही नहीं
कितने लम्हों में इज़हार हमने किया
पहले लम्हे सा दिल तड़पता ही नहीं
यूँ तो तुम पर मरने वाले लाखों होंगे
लेकिन कोई इश्क़ सा मरता ही नहीं
।। हिमांशु "इश्क़" ।।
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