सोमवार, 19 जून 2017

इश्क़

इश्क़ चढ़ता है तो उतरता ही नहीं
दिल यूँ भी कभी निखरता ही नहीं

जाने कितनी शब गुज़ार देता है यूँ
चाँद चौदहवीं जैसे संवरता ही नहीं

हर बार फिक्र में चाँद थम जाता है
तुम्हारी आह सा पिघलता ही नहीं

कितने लम्हों में इज़हार हमने किया
पहले लम्हे सा दिल तड़पता ही नहीं

यूँ तो तुम पर मरने वाले लाखों होंगे
लेकिन कोई इश्क़ सा मरता ही नहीं
     ।। हिमांशु "इश्क़" ।।






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