शुक्रवार, 13 दिसंबर 2019

मुक्तक


बंद दीवारों में जब तय मसौदे होंगे
तब मुल्क़ के खुलेआम सौदे होंगे
इसलिए चुप्पी तोड़ चिल्लाओ ज़रा
मुल्क़ बचा लो, बाहर आओ ज़रा


सच का साथ भी निभा सकता हूँ
सच के लिए जाँ लुटा सकता हूँ
तुम में आएगी कोई खराबी जब
तुम को भी आईना दिखा सकता हूँ

जाति धर्म पर लड़ना सीखो
भड़काऊ नारे गढ़ना सीखो
मलाई सब मिल बाँट खाओ
पहले पैरों में पड़ना सीखो
सत्य बोलना अपराध बड़ा है
अपने झूठ पर अड़ना सीखो
कुर्सी आसानी से पाओगे
दूजे के कांधे चढ़ना सीखो
रक्त बहाने की करो तैयारी
फिर तुम आगे बढ़ना सीखो
अब छोड़ दो भलाई बुराई
सीना ठोक अकड़ना सीखो

भूख लगे तो रोटी नहीं देती
शुरू कर देती है रोज तमाशे
चापलूसी करने लगो तो
मिलने लगते हैं हमें बताशे
वो बात बात में मुँह बनाये
कुछ पूछो तो जवाब न आये
रूठ जाती है तो मानती नहीं है
खुद के सिवा कुछ जानती नहीं है
रोज सवाल करती है
मुझसे मुहब्बत करते हो या नही? 
साथ ही धमकी भी है
मायके जाने की नहीं,
बल्कि मुझे घर से निकालने की।
जो कुछ भी रोज कमाता हूँ 
उसके हाथों में रख आता हूँ

उस शहर में मेरा हो ठिकाना नहीं
जिस शहर में गर तेरा बसेरा न हो
उस घड़ी मुझको ये ज़िन्दगी कम लगे
जिस घड़ी तेरे साथ सबेरा न हो

ज़रा सी देर हो बेटी को
तो कलेजा मुँह को आ जाता है
और हमारे मुल्क को 
दुनिया में आज़ाद कहा जाता है

नागफनी के गुलदस्ते में गुलाब कहाँ से पाओगे
बोया पेड़ बबूल का तो आम कहाँ से खाओगे

सियासत किसी की सगी नहीं है
यह आग कहाँ पर लगी नहीं है
पानी डाल दो तुम जितना चाहे
चिंगारी कभी भी बुझी नहीं है

मैं आईना हूँ सबकी खबर रखता हूँ
सब की नजरों पर नज़र रखता हूँ
मेरे वजूद को क्या जानेगा ज़माना
जहाँ नहीं हूँ वहाँ भी असर रखता हूँ

आजमाना छोड़ दो तुम
दिल लगाना छोड़ दो तुम
छोड़ कर जाना हो जाओ
अब बहाना छोड़ दो तुम

फिर किसी रोज उनका सहारा होगा
जो हमारा था कभी फिर हमारा होगा
उनका नहीं था कसूर छोड़ जाने में
हमने ही ठीक से नहीं पुकारा होगा

आदमी ही आदमी को खा रहा है
आदमी आज क्या होता जा रहा है
आदमी ही आदमी से लड़ने लगा
देखो अब आदमी कहाँ जा रहा है

सर यूँ ही नहीं झुका होगा
पाँव में काँटा चुभा होगा
टूट कर बिखरने से पहले
दिल कई बार दुखा होगा

घर से बाहर निकलो तो जाना संभल-संभल के
सियासत कर रहे हैं लोग चेहरे बदल-बदल के

चन्द लम्हों का फ़साना ज़िन्दगी
मर के जीने का बहाना ज़िन्दगी
महज़ अल्फ़ाज़ों में बयां मुश्किल
भूलना और याद आना ज़िन्दगी

जब भी रात अमावस आये
तुम बन चन्द्रमा आ जाना
जब भी मेरा दिल घबराये
तुम दिल पर मेरे छा जाना

जब शांति पर प्रहार हो
तो श्वानों का शिकार हो
और सिंह की हो गर्जना
फिर आर हो या पार हो

रोज़ रोज़ का तमाशा अच्छा नहीं होता
कभी कम कभी ज़्यादा अच्छा नहीं होता
जानते हैं ज़माने में कुछ लोग मक्कार हैं
ऐसे लोगों से राबता अच्छा नहीं होता

कोई अपनी नज़र से देखता है
हमें बड़े ही सबर से देखता है
खुदा को मालूम है हाल हमारा
वो न जाने किधर से देखता है

इस तरह न नज़रें झुका के बात कर
तू सच्चा है तो सर उठा के बात कर

ऐसे तो आँखें भिगो नहीं सकता
तू हँस सकता है रो नहीं सकता
तुझसा होने में कोई आसानी नहीं
तुझसा कोई और हो नहीं सकता

जब जब मुद्दों पर ख़ाक डाली जाएगी
तब तब लोगों पर राख उछाली जाएगी
नफ़रत और भड़के जमाने में आजकल
ये सोच कर ही अब आग पाली जायेगी

हम पानी को आब लिखेंगे
जीतने के ही ख़्वाब लिखेंगे
सारे जुल्मों सितम के बदले
चारों ओर इंक़लाब लिखेंगे

न नफ़ा न नुकसान मुहब्बत में
बस आफत में जान मुहब्बत में
वो तो चैन से सोते रहे रात भर
और हम रहे परेशान मुहब्बत में

अंधेरों से निकलो उजालों में आओ
डरते हो क्यों तुम सवालों में आओ
ज़िन्दगी गुज़रेगी जो तन्हा तो क्या
बेहतर होगा कि मिसालों में आओ

ज़िन्दगी में आबोदाना चलता रहेगा
इश्क़ में रूठना मनाना चलता रहेगा
तुम्हारे इश्क़ में ही जाँ रुखसत होगी
तुम्हें लगा आना जाना चलता रहेगा

अलहदा लम्हों से गुज़र गये होंगे
हम उनकी नज़रों से उतर गये होंगे
उन्होंने किये वादे वो बात और थी
ये और बात है कि वो मुकर गये होंगे

अनसुलझा सा इक सवाल हो गया
मुहब्बत में क्यों जीना मुहाल हो गया
सारे शहर में भी अब चर्चे होने लगे हैं 
वो बाहर क्या निकले बवाल हो गया

इक तुम्हारी छुअन का ये असर हो गया
भटकते मुसाफ़िर को जैसे घर हो गया
तुमने बाहों में भर जो लिया ज़ोर से
दर्द जितना भी था बे असर हो गया

न काँटा न कोई गुलाब चाहिए
वोट के लिए न शराब चाहिए
हम ने माँगा है बस वो दीजिये
राफेल का पूरा हिसाब चाहिए

वो मुहब्बत की बातें फिर सुनाने लगे हैं
दिल के तारों में गुंजन यूँ उठाने लगे हैं
आँखों आँखों में बातें फिर होंगी कभी
वो आँखों से आँखें फिर मिलाने लगे हैं

आग पानी में लगा कर देखो
अश्क़ थोड़े से बहा कर देखो
तुमको आएगा मजा जीने में
इश्क़ की राहों में आकर देखो

ये कैसा है आलम 
ये कैसी फ़िज़ा है
चारों ओर उठता
धुँआ ही धुँआ है
समझा लो कोई
लोगों को अब तो
ये देश है हमारा
यहाँ लड़ना मना है



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