तख्तों की ऊँचाई इतनी ज़्यादा हो गयी है कि सड़क पर चलते आम लोग तख़्त पर बैठे हुए लोगों को नज़र नहीं आते। अगर वो थोड़ा झुक कर देखते भी हैं तो उन्हें लगता है कि कीड़े मकौड़े हैं जिनको तख़्त के पाए के नीचे कुचल कर खुद ही मर जाना है।
उनकी कोशिश बस इतनी होती है कि तख़्त के पायों में किसी भी तरह दीमक न लग पाए। दीमक वो लोग होते हैं जो गरीब, मजदूरों के हक़ की बात करते हैं। अन्याय और अत्याचार के विरोध में खड़े होते हैं और वो लोग भी जो तख़्त को झुक कर सलाम नहीं करते।
तख़्त के नीचे मुलायम गद्दी लगी होती है जो चापलूसी से बनी होती है। तख़्त में मौकापरस्ती की कीलें लगाई जाती हैं मजबूती देने के लिए। तख़्त की पीठ सीधी रखी जाती है जिससे कि तख़्त पर बैठने वाला किसी के सामने नहीं झुके। वो तना रहे तख़्त की कठोर पीठ की तरह।
तख़्त में सोना चाँदी हीरे जवाहरात जड़े होते हैं। जिसकी कीमत चुकाते हैं आम किसान, मजदूर, व्यापारी, बेरोजगार और सैनिक भी। सैनिक तो तख़्त की सुरक्षा में भी लगे रहते हैं। तख़्त को कोई ख़तरा नहीं होना चाहिए। जब भी किसी से तख़्त को ख़तरा होता है तो सैनिक उस ख़तरे को ख़त्म कर देते हैं।
तख़्त रखे जाते हैं ऊँचे और आलीशान महलों में। जिनको बनाते हैं गरीब मजदूर। लेकिन बनने के बाद सबसे ज़्यादा दूर किया जाता है मजदूरों को ही। कहीं अगर उन्होंने महल में प्रवेश किया और तख़्त के पास जा पहुँचे तो तख़्त को ख़तरा हो जायेगा। एक तख़्त के लिए पूरी प्रजा को क़ुर्बान किया जा सकता है। लेकिन तख़्त कभी प्रजा के लिए क़ुर्बान नहीं किया जाता।
तख़्त में लगा लाल रंग लहू से बनाया गया है। हज़ारों लाखों लोगों के लहू से तख़्त को सजाया गया। जितना ज़्यादा लहू उतना ही गहरा रंग तख़्त का। इस लहू के लिए जनता पर अत्याचार किये जाते हैं, बड़े बड़े युद्ध रचे जाते हैं। यह लगातार चलने वाली प्रक्रिया है क्योंकि समय समय पर तख़्त के लाल रंग को और गहरा करने की ज़रूरत होती है।
तख़्त के इर्दगिर्द जमावड़ा होता है कुछ लोगों का। ये लोग होते हैं बड़े पूँजीपति, अपराधी, बड़े व्यापारी, हत्यारे, और कुछ शैतान। बाकी लोग तख़्त पर बैठने वाले के खास होते हैं। पूँजीपति जनता से पूँजी चूसते हैं और फिर आधी पूँजी तख़्त को समर्पित कर आधी खुद रखते हैं। अपराधी तख़्त के सामने जनता में खौफ़ बनाये रखते हैं जिससे कि कोई सर न उठा सके विरोध में। बड़े व्यापारी तख़्त के साथ कारोबारी रिश्ते बना कर मुनाफा वसूली में लगे रहते हैं जिनका काम होता है नफा सरकार के हिस्से करना और नुकसान जनता के सिर मढ़ देना। हत्यारे तख़्त के आदेश पर विरोधियों की हत्याएँ करते हैं। शैतान का काम होता है तख़्त पर बैठे हुए को शैतान के साथ शामिल करना और उससे जनता के दिल में शैतान की हुक़ूमत को मनवाना।
बाकी खास लोग वो होते हैं जिनको लगता है कि बाद में ये तख़्त उनको मिलेगा इसलिए हर बुरे काम को वो अपना समर्थन देते हैं और ये उम्मीद रखते हैं कि वो खुद भी तख्तनशीं हो जाएंगे कभी न कभी।
तख़्त की बादशाहत को कायम रखने के लिए तरह तरह के छल प्रपंच रचे जाते हैं। जनता कहीं एक साथ विद्रोह न कर दे इसलिए उन्हें छोटे छोटे टुकड़ों में बाँटा जाता है। फिर उनको आपस में लड़वाया जाता है। कुछ जगहों पर सैनिकों को छूट दी जाती है कि विरोधियों के साथ मनमानी कर सकें। कानून के नाम पर लोगों को कई वर्षों तक बिना किसी गुनाह के जेल भेज दिया जाता है। दंगे करवाये जाते हैं। काफ़िले लुटवाये जाते हैं। शहरों को जलाया जाता है।
फिर भी अगर कोई ख़तरा उत्पन्न होता है तो एक दुश्मन देश की काल्पनिक कहानी जनता के सामने रखी जाती है। फिर उसी दुश्मन देश के नाम पर जनता को एक होने का पाठ पढ़ाया जाता है। राष्ट्रवाद के नाम पर किसी भी तरह के विरोध को दबा दिया जाता है।
हथियारों की प्रदर्शनी लगाई जाती है। जनता को बरगलाया जाता है कि चाकू खंजर या तलवारें उठा ले और आपस में मारकाट शुरू कर दे। फिर जनता आपस में उलझ कर रह जाती है और तख़्त पर आया ख़तरा टल जाता है।
तख़्त की सुरक्षा के लिए आम जनता को धर्म और जाति का नशा चढ़ाया जाता है। धर्म के नाम पर जनता आपस में मरने मारने को तैयार हो जाती है और लहू बहाती है। ये सब तख़्त को मजबूती देते हैं। ये लहू तख़्त की चमक बढ़ाता है। लहू हमेशा से ही तख़्त को ताक़त देता है। तख़्त की कहानियाँ हमेशा से ही लहू के बिना पूरी नहीं होती। धर्म हमेशा से तख़्त के लिए हथियार रहा है। तख़्त के एक हाथ में तलवार होती है दूसरे हाथ में धर्म। जबकि काम दोनों का एक ही होता है।
किसी बीमारी अथवा महामारी के काल में जब आम जनता मर रही होती है तब जनता को समाजसेवा का पाठ पढ़ाया जाता है और उनसे अधिक कर वसूले जाते हैं। जनता को लगता है कि अधिक कर देकर वह अपने जैसे लोगों की मदद कर रही है जबकि वो सारा पैसा तख़्त के खजाने और उसकी देखरेख में चला जाता है।
असल में ये एक पूरी व्यवस्था बनाई गई है जो पहले राजशाही में थी और अब इसी का नाम बदल कर लोकतंत्र कर दिया गया। नाम बदल गए लेकिन व्यवस्था नहीं बदली।
तख़्त आज भी कायम है। तख़्त की सत्ता आज भी चल रही है। तख़्त के भारी पाए तले आम जनता कुचल कर मारी जा रही है। तख़्त के आसपास मौजूद लोग ताली बजा रहे हैं और तमाशा मज़ेदार होता जा रहा है।
- हिमांशु श्रीवास्तव
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