ज़रा गुफ़्तगू कर यूँ ना तक़रार की बात कर
सबके गम देख तू ना दो चार की बात कर
मयकशीं का मौसम अभी तलक़ गुजरा नहीं
जाम हाथ में उठा और तक़रार की बात कर
रख दे नफरत को इक तरफ कुछ देर को
बरसों से रूठे हुए उस यार की बात कर
जो दिख रहा है ज़माने में मज़बूत सा आदमी
उसके दिल छुपी किसी दरार की बात कर
चंद सिक्कों से अब गुज़ारा मुमकिन नहीं होता
खजाना खोल फिर लाख हज़ार की बात कर
मैं देखता हूँ तो हर शख़्स रूठा हुआ सा है
उसके गले मिलकर फिर प्यार की बात कर
ज़िन्दगी चार दिन की है जो यूँ ही गुज़र गयी
जो रह जानी है पीछे उस बहार की बात कर
ज़रा गुफ़्तगू कर यूँ ना तक़रार की बात कर
सबके गम देख तू ना दो चार की बात कर
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