लोग मुल्क के दिख रहे हैं आजकल कतारों में
देश भी तो चल रहा यूँ अब खातों में उधारों में
जिसको समझते थे अपने हाथ का मैल कभी
अब तड़प रहे हैं ये लोग उसके ही विचारों में
ये हुक्म ए निज़ाम है अब सवाल कौन पूछेगा
हथियार दिख रहे हैं उनके सिपहसालारों में
गरीब की औकात तो बस दो रोटी की बात है
अक्सर दिखता नहीं है वो भीड़ के किनारों में
कल तक जो घूमते थे मंदिर और मस्जिदों में
उनको भगवान दिख रहे हैं अब साहूकारों में
तड़प रहे हैं लोग अब तो दवा रोटी पानी को
नया अत्याचार है ये साहब के अत्याचारों में
नोट बंदी करके थपथपा रहे जो पीठ अपनी
बदल रहे हैं नोट हज़ार का अब दो हज़ारों में
काली कमाई ग़र ढूंढ़ना हो तो तुमको बताऊँ
सारे चोर तो शामिल हैं आपके वफादारों में
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