शनिवार, 3 दिसंबर 2016

आहिस्ता आहिस्ता

गुज़र रही है शाम आहिस्ता आहिस्ता
फिर उस के नाम आहिस्ता आहिस्ता

कभी शिकन जो माथे पर आयी नहीं
कभी किस्मत में थी ऐसे जुदाई नहीं
छुपाना ज़ख्मों को यूँ आसान नही था
किसने कहा कि दिल परेशान नही था
मयख़ाने में भी ख़ामोशी मयस्सर नही
छलक रहे हैं जाम आहिस्ता आहिस्ता
गुज़र रही है शाम आहिस्ता आहिस्ता

उत्सवों के इस शहर में तुम चले आओ
तमन्नाएँ परे रख कर जरा मुस्कुराओ
अंधेरों ये हटा कर उजाले सजाओ तुम
चिरागों से क्या होगा सूरज उगाओ तुम
ज़िन्दगी भर ज़िन्दगी का इंतज़ार किया
हो रही उम्र तमाम आहिस्ता आहिस्ता
गुज़र रही है शाम आहिस्ता आहिस्ता
फिर उस के नाम आहिस्ता आहिस्ता


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