शनिवार, 26 अगस्त 2017

क्योंकि हम हिंसक हैं

जरा सी बात से
धर्म खतरे में आ जाता है
और शहर जल जाता है
क्योंकि हम हिंसक हैं

मर्यादा की बात
हम करते हैं अमर्यादित
और दंगा हो जाता है
क्योंकि हम हिंसक हैं

फिर जुम्मन मियाँ की
झोपड़ी जलाकर हम
अपने घर में सोते हैं
क्योंकि हम हिंसक हैं

फिर दलित की पिटाई
हम करके खुश होते हैं हैं
चैन से खाते पीते हैं
क्योंकि हम हिंसक हैं

भगवानों की पूजा में
ठेकेदारों को भगवान बनाते हैं
उन लोगों से ही खुद लुट जाते हैं
क्योंकि हम हिंसक हैं

जाति धर्म में बाँट कर देश
खुद को देशभक्त कहलाते हैं
नहीं देखते भूखे बच्चे रोते जाते हैं
क्योंकि हम हिंसक हैं

अहिंसा का पाठ पढ़ाते दुनिया को
खेतों में बारूद बच्चों को हथियार
खुद ही तो थमाते हैं
क्योंकि हम हिंसक हैं

इक दिन खुद की ही कब्रें हम खोदेंगे
खुद अपने हाथों से अपना गला काटेंगे
खुश होंगे फिर खुद को लहूलुहान देख कर
क्योंकि हम हिंसक हैं

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