"और गरीबी मर गयी"
कितने ही वर्षों से भारत की विकराल समस्या बनी हुई थी गरीबी। नई नई योजनाएँ गरीबी को खत्म करने के लिए लायी जाती रहीं लेकिन गरीबी तो सुरसा के मुख की तरह बढ़ती ही जाती थी। वहीं दूसरी ओर चंद अमीर लोगों की संपत्ति इसी अनुपात में तेजी से बढ़ती जाती रही। हम सही मायनों में हिंदुस्तान को दो अलग अलग रूप में देखते रहे। एक ओर जहाँ विकास की राह पर अग्रसर धनवान होता इंडिया तो वहीं दो वक्त की रोटी को मोहताज़ गरीब भारत। सरकार जब कुछ न कर सकी तो आंकड़ों का खेल खेलना शुरू कर दिया। इसी आँकड़े के कारण ही तो 32 रुपये से अधिक खर्च करने वाले एक झटके में अमीर बन गये। उफ्फ। इतनी तेजी से इस प्रक्रिया से गरीब को अमीर बनाने की कोशिश शुरू हो गयी। आखिर उभरते भारत की नई तस्वीर जो दुनिया को दिखानी थी। अब जब तस्वीर दिखानी हो किसी को तो खूबसूरत ही दिखायेगा। कोई दाग धब्बे वाली तस्वीर कैसे कोई दिखा सकता है। शर्म आती है। और गरीबी तो सबसे बड़ा दाग है देश के ऊपर।
खैर! गरीब कम हुए लेकिन खत्म फिर भी नहीं हुए।
लेकिन सरकार के हाथ आँकड़े से भी बड़ा हथियार आ गया। वो था "आधार"। जो कहने के लिए तो सिर्फ एक कागज का टुकड़ा ही था लेकिन कागज़ी काम में सरकारें हमेशा अच्छी होती हैं। ईमानदार और स्वच्छ होती हैं सभी सरकारें कागजों में। उसी तरह ये कागज़ के टुकड़ा भी हो गया ईमानदार और स्वच्छ। इसकी मिसाल दूँ अगर तो यही कहूँगा कि एक विपक्षी पार्टी जो पहले इसका पुरजोर विरोध करती थी सरकार में आते ही इसे भारत का भविष्य बना दिया। ऐसा कागज़ जो लोगों के अस्तित्व का ही "आधार" बना दिया गया। जिसके पास है वो इंसान है जिसके पास नहीं वो जानवर, ओह्ह!! माफ करना अब तो जानवरों के लिए भी आधार जरूरी हो गया है, जानवर से भी गिरा हुआ कोई कीट होगा बिना "आधार" वाला क्योंकि सरकार की नज़र में "जिसके पास आधार नहीं, उसका कोई आधार नहीं। अजीब है न? लेकिन जरूरी है क्योंकि अब आपके पास कुछ हो या न हो लेकिन आधार जरूर होना चाहिये। मैंने तो बनवा लिया बहुत पहले ही। क्या पता किसी दिन सरकार आधार न रखने वालों को देशद्रोही बोलकर देशनिकाला दे दे। कहाँ जायेंगे हम जैसे लोग फिर? हमको तो बैंक लोन भी नहीं देते कि इंग्लैंड या अमेरिका में जाकर व्यापारी बन जायें या पार्टी करते हुए ज़िन्दगी गुज़ारें। ये हक़ सिर्फ बड़े उद्योगपतियों (जिनको लोन की जरूरत नहीं) या देश के सम्माननीय नेताओं को है। या फिर ऐसे नेता पुत्रों को जिनको आसानी से बिना व्यापार किये लोन मिल जाता है और जब कोई ये सवाल उठाता है तो सरकारी बचाव शुरू हो जाता है।
आप लोग सोच रहे होंगें कि आज मैं कहाँ "आधार" की गैर जरूरी बात लेकर बैठ गया। लेकिन आप भूल गये कि अब "आधार" ही हर बात का "आधार" है। भई। कल एक ख़बर सुनी मैनें तो समझ में आया कि "आधार" ऐसा हथियार बना दिया सरकार ने जिससे सारी समस्याओं को मारा जा सकता है।
झारखंड की 11 वर्षीय लड़की संतोषी भूख से तड़प कर मर गयी। सरकारी राशन सिर्फ आधार न होने की वजह से नहीं मिला। 28 सितंबर की ये घटना 10 अक्टूबर के बाद मीडिया में आयी। ये मीडिया की विश्वसनीयता की मौत थी। आज इंसान की कीमत कागज़ के टुकड़े से भी कम हो गयी है। क्या यही "न्यू इंडिया" है? ऐसा न्यू इंडिया, जहाँ गरीबों के लिए कोई जगह नहीं? जहाँ असहमति के लिए कोई जगह नहीं? जहाँ समरसता के लिए कोई जगह नहीं? जहाँ एकता और सद्भाव के लिए कोई जगह नहीं? अगर जगह है तो सिर्फ नेताओं की भक्ति के लिए। या फिर झूठे वादे और सपने दिखाने के लिए। बस उन्हीं झूठे वादों की ढपली बजाकर कीर्तन करते रहना होगा। 11 वर्षीय संतोषी जो आज की गरीबी का नया चेहरा कही जा सकती है, उनके परिवार का आधार न बनने की वजह से राशन की लिस्ट में से उनका नाम काट दिया गया। छुट्टियाँ होने की वजह से स्कूल का मिड डे मील भी नहीं मिल सका। उसकी माँ ने बताया कि आखिरी वक्त वो भात भात चिल्ला रही थी। लेकिन जिस देश को चलाने वाले झूठे वादों और आश्वासनों के सहारे सत्ता पर आसीन होते हैं उसी देश की एक मजबूर गरीब माँ अपनी भूख से मरती बेटी को झूठे वादे के सहारे ज़िंदा न रख पायी। भात भात चिल्लाते हुए ही संतोषी की मौत हो गयी। लेकिन मुझे लगा कि वो संतोषी नहीं थी। वो गरीबी थी जो उम्मीदों का इंतज़ार करते करते हार गयी और भूखी ही मौत की नींद में सो गयी। क्या कोई बता सकता है कि मरने के बाद भूख परेशान तो नहीं करती होगी? आखिर वो गरीबी ही थी जो उस रोज मारी गयी हमारी व्यवस्था के कारण।
लेकिन असल कार्यवाई उसके बाद शुरू हुई सरकार की और सारा तंत्र उस भूख से हुई मौत को नकार कर उसे मलेरिया से हुई मौत बनाने में जुट गया। गाँव ने भी अच्छा साथ दिया व्यवस्था का और संतोषी की माँ को मार पीट कर गाँव से बाहर निकाल दिया गया। उसकी वजह से बदनामी जो हुई थी गाँव की।
जो गरीबी 70 साल में खत्म न हो सकी अब वो मर रही है। कहीं तो अस्पतालों में ऑक्सीजन की कमी से मर रही है। कहीं भूख से मर रही है या फिर कहीं पर धर्म या मज़हब या फिर गाय के नाम पर सरेआम उसका क़त्ल किया जा रहा है। सरकारों का मुख्य मुद्दा तो गरीबी खत्म करना ही है फिर चाहे उसके लिए गरीबों को ही क्यों न मारना पड़े। न रहेंगे गरीब और न रहेगी गरीबी।
बुलेट ट्रेन वाले देश में आखिर क्या काम है गरीबों का? जहाँ सिर्फ चुनाव प्रचार पर हज़ारों करोड़ खर्च किये जाते हों वहाँ कोई गरीब होना भी नहीं चाहिये। अगर गरीब होंगे तो सरकार को गरीबों को खत्म करना पड़ेगा। ऐसे ही रोज हज़ारों गरीबी मारी जायेंगी और हम ये ही कहते रहेंगे कि "और गरीबी मर गयी" ।
- हिमांशु
Bilkul ...sochny ka muqam hai ye ...
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