हँसता भी आदमी तो रोता भी आदमी
सब कुछ पाकर कुछ खोता भी आदमी
जाने किस सोच में डूबा डूबा रहता है
अपनी सोच में ही क्या होता है आदमी
अनजान रास्तों पर डर डर के निकलना
वही काटता है जो खुद बोता है आदमी
कहता भी नहीं और चुप रहता भी नहीं
जैसे जागते जागते ही सोता है आदमी
खुद को मंज़िल पर जाने की जल्दी नहीं
कोई और आगे चले तो रोता है आदमी
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