शुक्रवार, 14 अक्टूबर 2016

चल सजना वे हम वतना वे

चल सजना वे हम वतना वे
अपने घर में चाँद है निकला
परदेस में सूना आसमान रे
चल सजना वे हम वतना वे

बचपन के वो खेल खिलौने
याद आने पर लगते हैं रोने
माँ के हाथ की वो इक रोटी
शिकायत करती बहन छोटी
मिट्टी के जो घर थे बनाये
आज वो फिर से हमें बुलाये
गुड्डे गुड़ियों की ज़िन्दगानी
कितनी लगती थी वो सुहानी
दादी फिर से सुनाए कहानी
एक था राजा एक थी रानी
सपनों से सजाया जहान रे
चल सजना वे हम वतना वे
अपने घर में चाँद है निकला
परदेस में सूना आसमान रे

सावन के झूले याद हैं आये
गंगा किनारे फिर से बुलाएँ
मंदिर मस्जिद और गुरूद्वारे
जाकर ईद दिवाली मनाएं
राह तके है अब माँ बेचारी
बाबा को भी घेरे है बीमारी
घर की दीवारें भी टूट रहीं हैं
कब आओगे अब पूछ रही हैं
अपनों से जो हम दूर हुए थे
जाने क्यों यूँ मजबूर हुए थे
चलो अब यारों देस महान रे
चल सजना वे हम वतना वे
अपने घर में चाँद है निकला
परदेस में सूना आसमान रे

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