बात छोटी सी थी भुलाई नहीं
वो शाम कभी लौट पाई नहीं
रातें अभी तक हैं रौशन यहाँ
मेरे घर में सुबह मुस्कुराई नहीं
जो शमा के नीचे अँधेरे मिले
परवाने जले थे वो सबेरे मिले
पूछा था उनसे तुम्हें क्या मिला
मुस्कुराते सनम के चेहरे मिले
दीदार को जो हो मरना कबूल
मुहब्बत का है ये पहला उसूल
उनसे सलामत है दुनिया मेरी
मुहब्बत में बाकी बातें फ़िज़ूल
मुझसे रूठे हुए से वो आज हैं
मुहब्बत अभी आजमाई नहीं
बात छोटी सी थी भुलाई नहीं
वो शाम कभी लौट पाई नहीं
रातें अभी तक हैं रौशन यहाँ
मेरे घर में सुबह मुस्कुराई नहीं
मुहब्बत हसीं इक लम्हा रहा
इक पल में ही गुजर सा गया
सपनों में चाँद चमकता हुआ
जमीं पे उतर बिखर सा गया
कई वादे थे ज़िन्दगी के लिए
जो दुनिया के आगे तोड़ दिए
कितनी ही हीरों ने दुनिया में
होके मजबूर रांझे छोड़ दिए
करीं कोशिशें ज़माने ने हज़ार
मुहब्बत कभी मिट पाई नहीं
बात छोटी सी थी भुलाई नहीं
वो शाम कभी लौट पाई नहीं
रातें अभी तक है रौशन यहाँ
मेरे घर में सुबह मुस्कुराई नहीं
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें