शुक्रवार, 28 अप्रैल 2017

देश

देश मिला था मुझे राह में गुमसुम सा घबराया सा
थका हुआ बीमार सा वो अपने ज़ख्म छुपाया सा

दो बोल संबल के बोले तो उसके आँसू फुट पड़े
बोला मुझको चाहने वाले आज आपस में क्यों लड़े
जाति और मजहब में ही अब विकास दिखाते हैं
ये सफेद कपड़ों में नेता क्यों मुझको लूट जाते हैं
अस्पताल और स्कूलों की बातें कोई नहीं करता है
जिसको भी देखो आज धर्म के नाम पर लड़ता है
आम आदमी दिखता है सहमा सा भरमाया सा
थका हुआ बीमार सा वो अपने ज़ख्म छुपाया सा

देवी का जश्न मनाने वाले अपनी बेटी को मरवाते हैं
सबको दाना देने वाले वो किसान भूख से मर जाते हैं
सीमा पर जवान की भूख कोई महसूस नहीं करता है
मेरी रक्षा में रहता है सदा वो बेचारा मेरे लिए मरता है
बच्चों के भी दिल में अब ये ज़हर यूँ भरा जाता है
लोगों को अब इंसान नहीं हिन्दू मुस्लिम कहा जाता है
उनको शर्म नहीं आती है जब बेटी सड़क पर लुटती है
ये सब देख देख कर अब आँखें मेरी तो नहीं उठती हैं
मुझको ज़ख्म नहीं दिए हैं किसी दुश्मन अत्याचारी ने
मुझको तो अब तक लूटा है बस सत्ता के व्यापारी ने
हज़ारों साल की उम्र हुई है हज़ारों साल तक जीना था
लेकिन मेरे अपनों ने ही तो मुझसे जीने का हक़ छीना था

सुनकर मेरी इन आंखों में आँसू का सागर आया था
थका हुआ बीमार सा वो अपने ज़ख्म छुपाया सा
देश मिला था मुझे राह में गुमसुम सा घबराया सा

अपनी राह मैं चला आया लेकिन सारी बातें याद रही
उसके ज़ख्म भी याद रहे और फरियाद सारी याद रही
अब तक सोच रहा हूँ यारों कि कैसे मेरा देश बचाऊँ मैं
या फिर देश के साथ अब तो खुद ही ना मर जाऊँ मैं
क्या अब भी देश बचाने को भगत सुभाष को आना है
हमारी अपनी नाकामी का अब कौन सा बचा बहाना है
बेहतर होगा कि देश की खातिर अब हद से गुजर जाएं हम
जियें अब बस देश की खातिर या फिर शर्म से मर जाएं हम
जियें अब बस देश की खातिर या फिर शर्म से मर जाएं हम
                                         

                                                            
                                                                        

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