शुक्रवार, 12 अगस्त 2016

इश्क़

ना मुसलमान की तरह मुझको दफनाया जाए
और ना ही हिन्दू की तरह मुझे जलाया जाए
इस जमीन में ज़िंदा मुझे बस रखना कुछ ऐसे
कि इश्क़ बनकर दिलों में अब मुझे बसाया जाए

बहुत हो चुका है दौर यहाँ अब तो नफरतों का
फिर से क्यों ना इन सबको इंसान बनाया जाए
करें कोशिश हम सभी अब कुछ इस तरह से
किसी बच्चे को अब कहीं भूखा ना सुलाया जाए

जो अनजान हमको निवाले देता रहा आज तक
उस किसान को अब ऐसे मरने से बचाया जाए
कोई खता जो मैंने की हो गर तुझको बताने में
बेहतर है फिर तेरे तरीके से मुझे समझाया जाए

जो आज खामोश हैं यहाँ सारे फसाद देखकर
उनकी ख़ामोशी को अब कैसे भी मिटाया जाए
लोग भी भूल गए हैं शायद दास्तान ए हिन्द की
चल हिन्द को फिर हिन्द से आज मिलाया जाए

खुश हो रहे हैं जो केसरिया हरे को बांट कर
उनको हर कौम से बस इतना ही सुनाया जाए
ये मुल्क हमारा खून है और मुल्क हमारी जान है
तिरंगा है हर दिल यहाँ चाहे चीर के दिखाया जाए

दर्द जो है मेरा रख ही दिया यूँ आज निकाल कर
और कैसे "इश्क़" का फ़साना तुमको सुनाया जाए



                                                              

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