रविवार, 21 अगस्त 2016

खामोश किनारा

तू नदी की बहती सी धारा
मैं ठहरा खामोश किनारा

कभी ख़्वाबों में उछलता फिरता
कभी तेरे आँचल में यूँ ढलता
कभी तेरे पहलु में सो जाना
कभी तेरी मोहब्बत में पिघलता
तेरे साथ कभी बहकर देखूँ
छूकर देखूँ ये गली चौबारा
मैं ठहरा खामोश किनारा

तेरे साये में रह रह कर मैं भी
ज़िन्दगी को पहचान गया हूँ
तुझसे जुदा होने का न सोचूँ
ज़िन्दगी तुझे अब मान गया हूँ
तेरे साथ में बहता चलता हूँ
वर्ना रहता मैं बंजर बेचारा
मैं ठहरा खामोश किनारा
तू नदी की बहती सी धारा

रब ने मुझको ऐसा बनाया
तेरे साथ ही मेरा जीवन
तेरे बिना मेरा होना क्या
जैसे कोई टूटा सा दर्पण
तन्हा होना मुश्किल है मेरा
नाम तेरा बार बार पुकारा
मैं ठहरा खामोश किनारा
तू नदी की बहती सी धारा
              






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