माँ दरवाजे पर बैठी बैठी इंतज़ार करती है
छोटी बच्ची सी आँखों को बेक़रार करती है
सूरज ढले हुए अब वक़्त काफी हो गया है
घर नहीं आये क्यों सवाल हज़ार करती है
दुआओं का दौर भी अब शुरू होता जाता है
कहती है कि दुनिया माहौल ख़राब करती है
किसी भी तरह से वो घर में आये एक बार
जाने नहीं देना ये वादा बार बार करती है
आजकल शैतान खुले में घूमते हैं शान से
मुसीबत सिर्फ गरीबों का शिकार करती है
बेटा जो जाये बाहर घर से तो सूना सबकुछ
घर लौट आये वो तो ज़िन्दगी बहार करती है
माँ का होना हर जगह एक सा ही तो होता है
हर घर में माँ अपने बच्चों से प्यार करती है
जब तलक़ आ नहीं जाते वापस घरों में अपने
माँ दरवाजे पर बैठी बैठी इंतज़ार करती है
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