शुक्रवार, 5 अगस्त 2016

"खत"

फिर से इक खत के सहारे
दिल ने यूँ तुझको है पुकारा
सालों की इस दूरी को तू
कर दे कम अब मेरे यारा

चल फिर से हम बचपन को
जी भर कुछ पल तो जी लें
चल फिर से उन खेलों को
दौड़ते भागते फिर से खेलें
चल फिर से कोई कहानी
खत में आज हम सुना दें
तेरे मेरे सारे शिकवे मिलके
आज हम खत में भुला दें
कोई शिकायत कोई हंसी
खत में यूँ आज लिख डालें
फिर से इक खत के सहारे
दिल ने यूँ तुझको है पुकारा

बचपन वाली वो बातें सारी
मुझको अब तक याद रही हैं
जब जब तुझको याद किया
मेरी हमेशा ये आँखें बही हैं
फिर से हम बॉल के कारण
इक दूजे से रूठ भी जाएँ
फिर से थोड़ी देर के बाद
नाराज़गी फिर छूट भी जाये
फिर से तेरी मेरी वो बाँतें
रात तक लंबी चलती जाएँ
ऐसी हसीं यारी में सुन ले
खाना पीना फिर भूल जाएं
फिर से इक खत के सहारे
दिल ने यूँ तुझको है पुकारा

तेरा होमवर्क करना मुझको
बड़ा ही अच्छा लगता था
तेरा मुझको टीचर से बचाना
कितना सच्चा लगता था
बारिश में वो भीग भीग के
स्कूल से घर जो जाते थे
कैसे कैसे ख्वाब हम दोनों
मिल कर के यूँ सजाते थे
जाने कहाँ गए वो दिन अब
जाने ये कैसी मज़बूरी है
खत में लिखता हूँ तू आजा
कि मिलना बहुत ज़रूरी है
कि मिलना बहुत ज़रूरी है
फिर से इक खत के सहारे
दिल ने यूँ तुझको है पुकारा



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