शुक्रवार, 5 अगस्त 2016

वोट डलने लगे हैं


नफरतों के तीर अब ज़ुबाँ से चलने लगे हैं
यकीं है शायद वोट कहीं पर डलने लगे हैं

गलियों में घूम कुत्ते ढूंढते फिर रहे बोटियाँ
मिल के नेता सेकते अपनी चुनावी रोटियाँ
नोटों के खेल अब सड़कों पर रचने लगे हैं
यकीं है शायद वोट कहीं पर डलने लगे हैं

सारे मजहब ढूंढ़ कर और जात निकाल के
काटने आये हैं सांप जो रखे हमने पाल के
पांच साल बाद फिर गली में दिखने लगे हैं
यकीं है शायद वोट कहीं पर डलने लगे हैं

कहीं पर हो मंदिर और मस्ज़िद की लड़ाई
कहीं गाय के नाम पर इंसान ने जान गँवाई
जात पात मज़हब में लोग अब बँटने लगे हैं
यकीं है शायद वोट कहीं पर डलने लगे हैं

सफ़ेद कपड़ों में दिखे ये नेता देश लूट रहे
क़ातिल भी तो अब जेलों से देखो छूट रहे
बन्दूक और तलवार शहर में चलने लगे हैं
यकीं है शायद वोट कहीं पर डलने लगे हैं

जाग जाये कौम ए हिन्द फिर क्या बात है
ऐसा दिन भी आये जब देश सारा साथ है
तब लगेगा कि अब मौसम बदलने लगे हैं
यकीं है शायद वोट कहीं पर डलने लगे हैं
                       




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