वक़्त के हाथ में इतनी सी कहानी होगी
दर्द की बात अब आँखों से सुनानी होगी
तड़प कभी दिल की कम हो नहीं पाती
मुहब्बत जो है वो ना कभी पुरानी होगी
ज़ख्मों को भरने में बड़ा वक़्त लगता है
उस चोट पर मरहम भी तो लगानी होगी
किसको हाल सुनाएँ कौन सुनेगा हमारी
ज़माने की ज़ुबाँ पर उनकी कहानी होगी
चाहे मुहब्बत को आज मंजूर न करना तुम
इक दौर आएगा जब नफरत मिटानी होगी
जो लोग मशरूफ़ हैं आपस में ही लड़ने में
क्या करेंगे जब ये दुश्मनी दफनानी होगी
मज़हब बना जिसने भी इंसान जुदा किये
इन सबसे उठ के इंसानियत बसानी होगी
दर्द वो होता है जो लगे दिल और रूह पर
बाकी सारी तकलीफें महज़ जिस्मानी होंगी
यूँ आसां नहीं है मेरा तुझसे जुदा हो जाना
मुझे मेरी ज़िन्दगी की लकीर मिटानी होगी
तेरी ख़ुशी के लिए क़ुर्बान होने का वादा था
खुद मिट के ही मुझे मुहब्बत निभानी होगी
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें