बुधवार, 17 अगस्त 2016

इश्क़नामा

वक़्त के हाथ में इतनी सी कहानी होगी
दर्द की बात अब आँखों से सुनानी होगी

तड़प कभी दिल की कम हो नहीं पाती
मुहब्बत जो है वो ना कभी पुरानी होगी

ज़ख्मों को भरने में बड़ा वक़्त लगता है
उस चोट पर मरहम भी तो लगानी होगी

किसको हाल सुनाएँ कौन सुनेगा हमारी
ज़माने की ज़ुबाँ पर उनकी कहानी होगी

चाहे मुहब्बत को आज मंजूर न करना तुम
इक दौर आएगा जब नफरत मिटानी होगी

जो लोग मशरूफ़ हैं आपस में ही लड़ने में
क्या करेंगे जब ये दुश्मनी दफनानी होगी

मज़हब बना जिसने भी इंसान जुदा किये
इन सबसे उठ के इंसानियत बसानी होगी

दर्द वो होता है जो लगे दिल और रूह पर
बाकी सारी तकलीफें महज़ जिस्मानी होंगी

यूँ आसां नहीं है मेरा तुझसे जुदा हो जाना
मुझे मेरी ज़िन्दगी की लकीर मिटानी होगी

तेरी ख़ुशी के लिए क़ुर्बान होने का वादा था
खुद मिट के ही मुझे मुहब्बत निभानी होगी
                            



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