बुझती साँसे सूनी अँखियाँ कुछ ऐसे ही होते हैं मंज़र
आओ तुमको मैं दिखलाता हूँ मेरे गाँव में इक शहीद का घर
इक माँ दरवाजे पर बैठी है बेटे की राह निहारा करती है
सोते जागते उठते बैठते वो दिन रात पुकारा करती है
इक दिन वापस आएगा वो उसका अब तक विश्वास है
मुर्दा सा जिस्म है जिसका फौलादी उसकी हर सांस है
इंतज़ार में बेटे के कटते हैं उसकी रात दिन आठ पहर
आओ तुमको मैं दिखलाता हूँ मेरे गाँव में इक शहीद का घर
इक बाप है अंदर कमरे में खामोश घड़ी वो तकता है
शायद अपने बेटे की याद लेकर बहुत ही तड़पता है
बेटे की यादों में ही अब वक़्त यूँ गुज़ारा करता है
ख़्वाबों में उससे मिलता है सोते में नाम पुकारा करता है
काश कि वो अब कह सकता बेटा दो पल थोड़ा और ठहर
आओ तुमको मैं दिखलाता हूँ मेरे गाँव में इक शहीद का घर
इक बहन हाथ में राखी ले तस्वीर को देखा करती है
कहाँ गए हो प्यारे भाई मेरे ये अक्सर ही पूछा करती है
रक्षा करने का जो वादा था क्या खूब तूने निभाया है
मातृभूमि की रक्षा में भाई तूने अपना शीश कटाया है
कुछ तो पूण्य किया होगा जो तुझ सा भाई पाया है
तेरे होने से ही तो लगता था मुझको ये मेरा सा घर
आओ तुमको मैं दिखलाता हूँ मेरे गाँव में इक शहीद का घर
बच्चे अब भी पापा को ऐसे घर में तो ढूंढा ही करते हैं
वो मासूम हैं वो क्या जानें शहादत किसको कहते हैं
इक जोड़ी आँखें हैं जिनका पानी भी तो अब सूख गया
उसका जो सबसे अपना था बिन बोले ही वो रूठ गया
वो औरत शहीद की बेवा है उसका कितना बड़ा कलेजा है
खुशियों से वो मिलती नहीं है ज़िंदा सी है पर दिखती नहीं है
इस राष्ट्रभक्त ने भी यौवन पर देश प्रेम का श्रृंगार किया
इक शहीद के बदले में अपने दो बेटों को तैयार किया
शहीद होने का गम नहीं बहुत होता है उसको फकर
आओ तुमको मैं दिखलाता हूँ मेरे गाँव में इक शहीद का घर
आओ तुमको मैं दिखलाता हूँ मेरे गाँव में इक शहीद का घर
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