गुरुवार, 1 सितंबर 2016

सरकार

कैसे भरोसा करें हम साहब के बयानों पर
लोग लाशें उठाये ही चल रहे हैं कांधों पर

जिनके हाथ सौंपी हमने विकास की चाभी
वो तो सत्ता कर रहे हैं अब सिर्फ गायों पर

सारे देश का हाल कुछ लावारिस सा हुआ
अँधेरा जमा हुआ है चारों ओर चिरागों पर

वादे हज़ार थे सब ही जुमले बन गए होंगे
गुस्सा हो जाते हैं अब साहब सवालों पर

आजमा भी लिया है मुल्क़ की सरकार को
अब कैसे यकीन करें विकास के दावों पर

रोक लेते हैं हर खबर हर विरोधी बात को
कैसे ताला लगाएंगे अब हमारे ख़्वाबों पर

चलो इक वादा हम भी उनसे कर लें आज
आगे से यकीं न करना हमारे भी वादों पर

जनाब तुमने रखे हैं जो अँधेरे हमारे लिए
ये तुमको सौंप कर रहेंगे हम उजालों पर

तुम तो बदल जाते हो कुछ वक़्त के बाद
कभी शक़ ना करना तुम हमारे इरादों पर

जनता हैं हम तख़्त ओ ताज बदल देते हैं
उतारते हैं गुस्सा सत्ता के गुनाहगारों पर
                  





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