मैं गीत गाँव से आया हूँ
मैं प्यार संदेसा लाया हूँ
जात पात और मज़हब के
सब धागे तोड़ आया हूँ
मैं गीत गाँव से आया हूँ
भोले भाले इन चेहरों पर
तकलीफों के क्यों पहरे हैं
आँख उनींदी सी हैं इनकी
क्यों अश्क़ यहाँ पे ठहरे हैं
मैं बन के कुछ अपना सा
मुस्कान सजाने आया हूँ
मैं गीत गाँव से आया हूँ
मैं प्यार संदेसा लाया हूँ
लोग बढे खामोश हुए हैं
जाने कैसी ये मजबूरी है
लोगों की लोगों से देखो
बढ़ती जाती क्यों दूरी है
मीलों की इस दूरी को मैं
दिलों से मिटाने आया हूँ
मैं गीत गाँव से आया हूँ
मैं प्यार संदेसा लाया हूँ
मेरा गाँव मुहब्बत का है
फ़र्ज़ वहाँ इबादत का है
हँसते गाते सब रहते हैं
इश्क़ जहाँ आदत सा है
ऐसे ही इक बस्ती के मैं
ख्वाब दिखाने आया हूँ
मैं गीत गाँव से आया हूँ
मैं प्यार संदेसा लाया हूँ
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें