बुधवार, 28 सितंबर 2016

काली रात

काली काली रातों के
पीछे उजले सबेरे हैं
सारे दर्द ख़्वाबों के
आके यहीं पे ठहरे हैं

सारा दिन ज़ख्मो से
हम परेशान रहते हैं
हँसी चूका के पाए हैं
हमने पल सुनहरे हैं
काली काली रातों के
पीछे उजले सबेरे हैं

कोई बात सुनी नही
इश्क़ की रात बाकी है
मयख़ाने में पूँछें लोग
कितने जाम ठहरे हैं
काली काली रातों के
पीछे उजले सबेरे हैं

हर पल रुसवा होता है
जाने कैसी किस्मत है
कैसे ज़िंदा इश्क़ रहा है
उस पर इतने पहरे हैं
काली काली रातों के
पीछे उजले सबेरे हैं
     


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