जीवन का आधार
आत्मा का है सार
हमेशा आसपास है
मृत्यु का आभास है
मृत्यु सम्पूर्ण है
जीवन की उत्पत्ति से
प्रेम भाव और भक्ति से
काल्पनिक भय से
या अंतर्मन की शक्ति से
इसका अटूट बंधन है
ये मृत्यु का आलिंगन है
मृत्यु सम्पूर्ण है
अनसुलझा प्रश्न है
क्या होती है मृत्यु
देह का मिटना
साँस का रुकना
हृदय का थमना
स्मृति खत्म होना
या दृश्यता समाप्त होना
अकल्पनीय एहसास है
जिसके बाद
कुछ नहीं होता
कोई नहीं हँसता
कोई नहीं रोता
मृत्यु सम्पूर्ण है
आज आभासी है
मुझको मेरी मृत्यु
आज प्रश्न सुलझाऊँगा
मृत्यु के भेद दिखाऊँगा
घनघोर स्मृति के जंगल में
आज विचर रहा हूँ मैं
मृत्यु के आभास से
सज संवर रहा हूँ मैं
थोड़ी सी घबराहट भी है
जैसे पिय से प्रथम मिलन हो
आत्मा नग्न होने को आतुर
इस ज़िस्म रूपी कपड़े से
अवरूद्ध आज मेरा मन हो
क्या होगा जब मृत्यु
मुझको आलिंगन में भरेगी
क्या होगी अनुभूति वो
जो हृदय बिन बहेगी
क्या उत्तेजना का
आभास कर पाउँगा
अथवा मृत्यु पिय के अधरों
पर बिछ जाऊँगा
ओह्ह
पिय मिलन का समय हुआ
अब अनुमति दे दो मुझको
रोकना भी चाहूँ तो
रोक सकूँगा न खुद को
हृदय स्पन्दन मंद हो रहा
स्मृति में अंतर्द्वंद हो रहा
समाप्त हो रही स्मृति
जैसे रीत रहा हो गागर
प्यास मिलन की बढ़ती जाये
जैसे निकट आता जाये सागर
आँखों के सामने जो दृश्य हैं
अब धुंधले से हो रहे हैं
जाने क्यों लोग आसपास
खड़े खड़े रो रहे हैं
अब सुन नही रहा हूँ मैं कुछ
इक खामोशी चारों ओर है
रोशनी अब नहीं कोई
अंधकार का न कोई छोर है
अब मेरा आभास भी
मिटने लगा है
दृश्य समाप्त
ध्वनि समाप्त
हृदय स्पन्दन और
स्मृति समाप्त
शांति की अनुभूति है
जो मिटने लगी है अब
अब साथ छोड़ रहे
अभ्यास अनुभूति सब
अब बस बात खत्म करूँ
कुछ न कह पाउँगा
दिख नहीं रहा कुछ भी
कुछ नहीं समझ पा रहा
शायद मुक्त हुआ हूँ अब
जीवन मरण के बंधन से
इक नई शुरुआत हुई है
मृत्यु के आलिंगन से
सब कुछ छूट गया है पीछे
न कुछ ऊपर न कुछ नीचे
अब न कुछ आसपास है
मेरा मुझको न आभास है
आज समझ सका हूँ
खुद से अब न दूरी है
मृत्यु बहुत जरूरी है
मृत्यु बहुत जरूरी है
अब मैं नहीं हूँ कहीं
अब जो है वो बस...............
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