मानव जीवन बस क्षण भंगुर
सब पाने को क्यों इतना आतुर
बस अंतर्मन की व्याकुलता है
सब माया की चंचलता है
जीवन राह पथिक हैं हम सब
बस्ती दरिया पार है करना
अपने प्रीतम से मिलने को
कई बरसों तक हमको चलना
ये सारी बाधायें मिल कर
जीवन दर्शन समझायेंगी
बैरी दुनिया से लड़ लड़ कर
अपना प्रीतम हमको मिलता है
बस अंतर्मन की व्याकुलता है
सब माया की चंचलता है
कुछ लोग हैं बैठे धूनी रमाये
मोह के धागे मन आप बंधाये
जीवन मरण है किसके हाथ
फिर किससे घृणा कैसी बात
अर्पण तर्पण कर क्या होगा
प्रभु के दर्शन कर क्या होगा
जीवन पथ की प्रेम गली में
हृदय पुष्प बनकर खिलता है
बस अंतर्मन की व्याकुलता है
सब माया की चंचलता है
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