ज़िन्दगी बहर सी लड़खड़ा रही है आजकल
रूह भी ज़िस्म में फड़फड़ा रही है आजकल
धड़कन भी अब तो रिहाई को मचल उठी है
शायद दिल में वो भी घबरा रही है आजकल
कोई हसीन ख्वाब भी अब मुझे आता नहीं है
आँख भी जाने क्या बड़बड़ा रही है आजकल
ये काली रात अब तो और भी डराने लगी है
बिजली बादल संग कड़कड़ा रही है आजकल
काफ़िले की मंज़िल कहीं ठिकाना कहीं और है
राह भी दीवानी हो धूल उड़ा रही है आजकल
वो गली जहाँ से आशिक़ों के जनाजे निकले
खुशबू-ए-मुहब्बत बिखरा रही है आजकल
इतना भी आसां नहीं मुहब्बत का मिटना
मौत महज़ ज़िस्म अकड़ा रही है आजकल
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