झूठ तो इक हत्यारा है
जिसने सच को मारा है
ये नेताओं की बेशर्मी से
सच अक्सर ही हारा है
संसद को वो कहते हैं
अपना मंदिर पावन सा
अपनी हरकतों से बनाते
बड़ी गंदी बिछावन सा
कैसा राज है कैसी नीति
जब सत्ता सुख प्यारा है
ये नेताओं की बेशर्मी से
सच अक्सर ही हारा है
राजनीति में धर्म मिलायें
धर्म में राजनीति चलायें
नीचता की हद पार करते
दंगा करा के जीत जायें
मानवता की लाशों पर ही
पड़ा अब ईमान हमारा है
ये नेताओं की बेशर्मी से
सच अक्सर ही हारा है
लोकतंत्र की हत्या होती
अब सत्ता के गलियारों में
ईमानदारी भी दफन करी
नेताओं ने अब चौबारों में
शर्म आने लगी है हमको
कि नेता बेशर्म हमारा है
ये नेताओं की बेशर्मी से
सच अक्सर ही हारा है
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें