चालें सजा कर शतरंज की यूँ
चौसर का पासा फैंकते हैं हुज़ूर
सारे मोहरे आपस में लड़ा कर
आराम से तमाशा देखते हैं हुज़ूर
भूख उनकी कहाँ मिटा करती है
लाशों पर रोटियाँ सेकते हैं हुज़ूर
सवाल पूछना जैसे गुनाह हुआ
सरकारी फ़रमान भेजते हैं हुज़ूर
उनके लिए मुश्किल है दूर रहना
कुर्सी पाने को ईमान बेचते हैं हुज़ूर
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