वक़्त मांगेगा तो क्या हिसाब दोगे तुम
फिर झूठ को सच का खिताब दोगे तुम
कहकहे लग रहे आज तुम्हारी बात पर
जब हर सवाल का एक जवाब दोगे तुम
यकीन नहीं तुम पर तुम हकीम बुरे हो
जब भी दवा मांगेंगे तो शराब दोगे तुम
कौन से अंधेरे मिटाने की बात कहते हो
क्या सूरज मिटाकर आफताब दोगे तुम
मुल्क खामोश है ये तुम्हारी किस्मत है
आखिर कब तक़ वक़्त खराब दोगे तुम
कभी तो बाजी हमारे हाथ भी आएगी
तब मांगेंगे तुमसे तो किताब दोगे तुम
- हिमांशु "इश्क़"
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें