मंगलवार, 30 मई 2017

श्वेत पत्र


यत्र तत्र और सर्वत्र है
ये राजनीति का प्रपत्र है

अघोषित अनुबंध है
भाषाई अपभ्रंश है
जिव्हा चीनी से मीठी
और छुपा विषदंत है
नैतिकता की बात है
और अनैतिक रात है
अहिंसा की राह में
लिए हाथ में शस्त्र है
यत्र तत्र और सर्वत्र है
ये राजनीति का प्रपत्र है

अदभुत संत समागम है
राजनीति का भाषण है
भ्रष्टाचार से चलता देखो
साहब के घर का राशन है
धर्म के नाम पर देखो तो
हो रहा आज अधर्म है
शब्दों की शल्य क्रिया से
होता अर्थ का अनर्थ है
यत्र तत्र और सर्वत्र है
ये राजनीति का प्रपत्र है

जिसके पास धन बाहुबल
उसके पास ही सत्ता है
निर्धन आज ले रिक्त उदर
ऊँचे महलों को तकता है
चुनाव पंच वर्षीय योजना है
प्रश्न पूछना राजनीतिज्ञों से
जनता की राष्ट्र आलोचना है
ऐसा किस्सा कहाँ अन्यत्र है
ये राजनीति का श्वेत पत्र है
यत्र तत्र और सर्वत्र है
ये राजनीति का प्रपत्र है
             - हिमांशु "इश्क़"





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