शनिवार, 13 मई 2017

माँ

तेरे आँचल में दुबक जाता हूँ जब अँधेरा होता है
तेरा हाथ जो सर पर आता है तब सबेरा होता है

खौफ से कांप जाता हूँ तो तू बनती है हिम्मत मेरी
तू जहाँ रहती है वहां खुशियों का बसेरा होता है

अपने निवालों से तू भूख मेरी मिटा देती है अक्सर
आज भी यहाँ रोटियों में लिखा नाम तेरा होता है

पिता की नाराज़गी को भी अपने सर ले लेती है तू
कौन सा दोस्त ऐसा ज़माने में अब मेरा होता है

माँ तेरे ही हाथों में तक़दीर मेरी बन जाया करती है
मैं रहता हूँ खुश कहीं भी ना कोई गम घनेरा होता है

ना दुकान ना मकान और ना मुझे कोई दौलत चाहिए
तू जहाँ हंस देती है वो ही आँगन अब से मेरा होता है

माँ तेरे होने से ही मुझपे कोई मुसीबत नहीं आ सकती
मेरी हर आह पर तेरी आयतों का ही तो पहरा होता है

जितना भी कहूँ तेरे लिए वो कम लगता है अब मुझको
माँ मैं जैसा भी हूँ लेकिन मुझमें तेरा ही बसेरा होता है

एक सदके में ले लेती हैं मेरी सारी बलाएँ मुझसे
शायद खुदा ही दूसरा नाम यहाँ सिर्फ तेरा होता है


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