ये खौफ के जितने साये हैं
सब गली गली लहराए हैं
नेताओं की क्या कहें अब
आज शर्म बेच कर खाये हैं
गांधी तेरे मुल्क में हमको
बंदूक तलवारें नहीं चाहिए
जाति पात और मजहब की
अब ये दीवारें नहीं चाहिए
किसी लाश पर बनने वाली
कोई मीनारें नहीं चाहिए
कर सको तो इतना कर दो
मुहब्बत उन दिलों में भर दो
जहाँ नफरत भर के आये हैं
हिंदुस्तानी को मार के आप
कैसी देशभक्ति सिखलाये हैं
ये खौफ के जितने साये हैं
सब गली गली लहराए हैं
भीड़ कातिलों की जमा है
गलियों और चौबारों पर
लहू दिख रहा है अब तो
इनके सब हथियारों पर
गांधारी की पट्टी पड़ी हुई
क्या मुल्क की सरकारों पर
जाने कैसी खामोशी उनकी
जैसे जाकर के बैठे गए वो
सूरज चाँद और सितारों पर
धर्म अधर्म की बातें छोड़ो
यहाँ इंसान मरता जाए है
ये खौफ के जितने साये हैं
सब गली गली लहराए हैं
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