शनिवार, 27 मई 2017

यारों

ऐसे रूठ कर मयखाने से तो न जाओ यारों
अभी होश बाकी है मुझे और पिलाओ यारों

हज़ार ज़ख्म खाये हैं यूँ तो नादान दिल पर
अभी जान बाकी है नए ज़ख्म लगाओ यारों

क़तरा क़तरा लौ अभी जल रही चिरागों में
हवा से नहीं बुझेगी कोई तूफान लाओ यारों

ये वो शमा है जहाँ लाखों परवाने फना हुए
कुछ इज़्ज़त करो फूँक से न बुझाओ यारों

मुहब्बत एक जश्न है तेरी मेरी ज़िंदगी का
आज जश्न में खूब हँसो नाचो गाओ यारों

थक कर ज़िन्दगी से यूँ मैं सोने चल पड़ा हूँ
चैन से तो सोने दो मुझको न जगाओ यारों

मेरा क्या आखिर में तो मिट्टी हो जाना है
कूचा ए इश्क़ में ही मेरी मिट्टी बहाओ यारों
                         - हिमांशु "इश्क़"

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